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2026 में दुनिया में कहां-कब चुनाव?: बांग्लादेश से लेकर नेपाल-US तक, 2026 में भारत की नजर में रहेंगे ये देश

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 01 Jan 2026 10:04 AM IST
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सार

दुनिया भर में 2026 में कहां-कहां चुनाव हैं? भारत के लिए इस साल कौन से कौन-कौन से देशों में होने वाले चुनाव अहम रहने वाले हैं? इन देशों में मौजूदा समय में सरकारें किसकी हैं? फिलहाल वहां मुद्दे क्या हैं? इसके अलावा इन अहम चुनावों में क्या दांव पर रहेगा? आइये जानते हैं...

New Year 2026 know Election Schedule World and Important Polls India perspective Bangladesh Nepal US Midterms
2026 में दुनिया के 10 बड़े चुनाव। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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साल 2025 अपने अंतिम दिनों में है। अगर इस साल का ब्योरा निकाला जाए तो सामने आता है कि 70 देशों में लोगों ने अपने घरों से निकलकर नेतृत्व चुनने के लिए मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लिया। इनमें कई चुनावों के नतीजे उम्मीद के तहत ही रहे। जैसे जर्मनी में क्रिश्चियन डेमोक्रेट पार्टी (सीडीपी) के नेता फ्रेडरिक मेर्ज की जीत हो या ट्रंप के प्रभाव से बदले हालात के बीच ग्रीनलैंड में डेमोक्रेटिक पार्टी की विजय। हालांकि, कुछ चुनावों ने दुनिया को चौंकाया। इनमें कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के चुनाव प्रमुख रहे। कनाडा में तो डोनाल्ड ट्रंप के धमकाने वाले रवैये का असर ऐसा रहा कि अमेरिका से करीबी रिश्ते रखने की समर्थक दक्षिणपंथी कंजर्वेटिव पार्टी को हार मिली। वहीं, ऑस्ट्रेलिया में एंथनी अल्बनीज के नेतृत्व में लेबर पार्टी को चौंकाने वाली जीत दिलाई। 
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माना जा रहा है कि अब 2026 के चुनाव भी कुछ इसी तरह चौंकाने वाले रह सकते हैं। खासकर ट्रंप के आने के बाद से जिस तरह स्थितियां बदली हैं, उन्हें देखते हुए भारत में भी अब वैश्विक चुनावों को लेकर दिलचस्पी बढ़ी है। 2026 वह साल है, जब भारत के पड़ोस में भी कुछ अहम चुनाव तय हैं। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर दुनिया भर में 2026 में कहां-कहां चुनाव हैं? भारत के लिए इस साल कौन से कौन-कौन से देशों में होने वाले चुनाव अहम रहने वाले हैं? इन देशों में मौजूदा समय में सरकारें किसकी हैं? फिलहाल वहां मुद्दे क्या हैं? इसके अलावा इन अहम चुनावों में क्या दांव पर रहेगा? आइये जानते हैं...

2026 में किन-किन देशों में अहम चुनाव?


भारत के लिए इस साल से कौन से देशों के चुनाव अहम?

वैश्विक राजनीति में भारत के लगातार बढ़ते कद और दखल की वजह से पश्चिम से लेकर पूर्व तक के देशों में होने वाले चुनाव अहम हैं। हालांकि, कुछ चुनावों पर भारत की खास नजर रहेगी। इनमें तीन पड़ोसी मुल्कों- बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार के चुनाव भारत पर सीधा प्रभाव डालेंगे। इसके अलावा इस्राइल, थाईलैंड के अलावा अमेरिका में इस साल के अंत में होने वाले मध्यावधि चुनाव भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। 

1. बांग्लादेश के चुनाव

मौजूदा हालात: बांग्लादेश में 2024 में छात्रों के प्रदर्शन के बाद शेख हसीना को देश छोड़कर जाना पड़ा था। इसके बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। हालांकि, स्थितियां संभलने के बजाय और बिगड़ी हैं। अल्पसंख्यकों, राजनीतिक दल के नेताओं और छात्र नेताओं के खिलाफ हिंसा का दौर जारी है। इस स्थिति के चलते बांग्लादेश उच्च जोखिम वाला और अशांत क्षेत्र बना हुआ है।

मुख्य मुद्दे: अंतरिम सरकार ने बांग्लादेश की सबसे बड़ी पार्टी अवामी लीग की सभी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को भी उनकी गैरमौजूदगी में मौत की सजा सुनाई गई। ऐसे में चुनावों की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पर ही सवाल उठने लगे।

इसके अलावा बांग्लादेश के आम चुनाव के साथ प्रस्तावित राजनीतिक और संस्थागत सुधारों पर जनमत संग्रह भी तय किया गया है। इसके जरिए संविधान को फिर से बनाने का प्रस्ताव है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह प्रस्ताव किसी पूर्ण चुनी हुई सरकार नहीं, बल्कि अंतरिम सरकार लाई है। 

इस साल चुनाव में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी भी बड़ा मुद्दा बा हुआ है। 2024 के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में बांग्लादेश 151वें स्थान पर है। इसके अलावा शेख हसीना का नेतृत्व हटने के बाद से ही बांग्लादेश में औद्योगिक सुधार भी धीमे हुए हैं, जिससे यहां नौकरियों का भीषण संकट पैदा हुआ है। 

भारत के लिए क्या दांव पर: बांग्लादेश का चुनाव भारत के लिए प्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण है। यह चुनाव भारत और बांग्लादेश के बीच भविष्य के संबंधों को तय करने में निर्णायक होगा। खासकर ऐसे समय में जब मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के रवैये से दोनों देशों के रिश्ते प्रभावित हुए हैं। 

इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए उनकी अनुपस्थिति में मौत की सजा सुनाई गई है, और वह भारत में निर्वासन में रह रही हैं। ऐसे में उनका भारत में होना एक अहम कूटनीतिक और सुरक्षा हित को दर्शाता है। ढाका में सत्ता परिवर्तन और अस्थिरता का खतरा भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक हितों को प्रभावित करता है।

2. नेपाल के चुनाव

मौजूदा हालात: बांग्लादेश की तरह ही नेपाल में 2025 में राजनीतिक अस्थिरता देखी गई। यहां जेन-जी के प्रदर्शन के चलते सितंबर में पीएम केपी शर्मा ओली की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। बाद में एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ, जिसका नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की कर रही हैं। अब नेपाल में चुनाव की तैयारियां जारी हैं। इस बीच काठमांडू महानगरपालिका के मेयर बालेंद्र शाह, जिन्हें लोकप्रिय रूप से बालेन के नाम से जाना जाता है, को  प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नामित किया गया। उन्होंने और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने 5 मार्च को होने वाले नेपाल चुनावों में संयुक्त रूप से चुनाव लड़ने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।

मुख्य मुद्दे: नेपाल में होने वाले चुनावों में भी बांग्लादेश की तरह ही भ्रष्टाचार और बेरोजगारी बड़ा मुद्दा रहेगा। इसके अलावा राजनीति में युवाओं की भागीदारी और वंशवाद की राजनीति को लेकर माहौल गर्म है। युवाओं के गुस्से की मुख्य वजह सरकारी तंत्र का भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और नेताओं के परिजनों की आलीशान जिंदगी से जुड़े खुलासे थे। जिसके चलते युवा सड़कों पर जुटे थे।

भारत के लिए क्या दांव पर: भारत और नेपाल के रिश्ते भी ऐतिहासिक तौर पर बेहद नजदीकी रहे हैं। हालांकि, केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए हैं, जिनसे रिश्तों में कुछ खटास आई। उनके मुकाबले शेर बहादुर देउबा और पुष्प कमल दहल प्रचंड के नेतृत्व में भारत-नेपाल के रिश्ते बेहतर रहे हैं। अब ओली के पद से हटने और युवाओं के नेतृत्व से जुड़ने की इच्छा के चलते भारत लगातार नेपाल की मदद करने की बात कह रहा है। 

3. अमेरिका के मध्यावधि चुनाव

मौजूदा स्थिति: अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बड़े बदलाव और हलचल देखने को मिली है। 2025 में राष्ट्रपति चुनाव और उसके साथ ही संसदीय चुनाव में जबरदस्त बढ़त हासिल करने की वजह से रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से भी उन्हें हर मुद्दे पर समर्थन मिला है। इससे अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी शासित राज्यों में संघीय दखल बढ़ा है। इसके अलावा कनाडा, ब्राजील, मैक्सिको, भारत के साथ दर्जनभर देशों के साथ अमेरिका के दोस्ताना रिश्ते प्रभावित हुए हैं।

मुख्य मुद्दे: अमेरिका के अलग-अलग देशों के साथ रिश्तों में इस वक्त सबसे बड़ा मुद्दा टैरिफ यानी आयात शुल्क का है। ट्रंप की तरफ से एकतरफा तौर पर लगाए गए इन टैरिफ के चलते उनका अमेरिका से व्यापार प्रभावित हुआ है। इतना ही नहीं ट्रंप ने कुछ और देशों को अपनी बात न मानने के लिए टैरिफ लगाने की सिर्फ धमकी ही नहीं दी, बल्कि इसे लागू भी किया। इससे अमेरिकी आयातकों को भारी नुकसान उठाने पड़े हैं और आयात के लिए ज्यादा राशि चुकाने की वजह से अमेरिका में उत्पादों की कीमत भी बढ़ी। इस स्थिति ने सीधे तौर पर अमेरिका में महंगाई को बढ़ाया है। अमेरिकी कंपनियों ने अपने नुकसान के मार्जिन कम करने के लिए नौकरियों में कटौती की है, जिससे वहां बेरोजगारी भी बढ़ी है।

इसके अलावा विदेश से प्रवास रोकने की कोशिशें, एच-1बी वीजा और ग्रीन कार्ड के नियम बदलने से अमेरिका में बड़ी कंपनियों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति भी इन कंपनियों को प्रतिभाओं को लाने से रोक रही है, जिसका असर यह हुआ है कि कंपनियां ऑफशोर हायरिंग पर जोर दे रही हैं और अमेरिका में बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभर रहा है। 

ट्रंप ने बीते कुछ महीनों में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के शासन वाले राज्यों में संघीय दखल को बढ़ाया है और वहां सेना या नेशनल गार्ड्स की तैनाती की, जिससे स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। साथ ही हार्वर्ड, येल जैसे कुछ शिक्षण संस्थानों के बजट में कटौती की गई, जिससे युवाओं में नाराजगी है। यह सभी मुद्दे अमेरिका में मध्यावधि चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं।

भारत के लिए क्या दांव पर: यह चुनाव भारत के आर्थिक हितों के लिहाज से काफी अहम हैं। खासकर 2025 में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से दोनों देशों के रिश्ते तनावपूर्ण हुए हैं। ट्रंप प्रशासन ने अगस्त में भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया था, जिसे लेकर भारत ने नाराजगी जाहिर की। इसके अलावा ट्रंप की तरफ से दूसरे कार्यकाल में पाकिस्तान से करीबी भी बढ़ाई गई है, जिसे लेकर भारत समय-समय पर चिंताएं जाहिर करता रहा है। ट्रंप ने भारत की तेल खरीद और रूस-चीन से रिश्तों पर भी अप्रिय टिप्पणियां की हैं, जिनसे दोनों देशों के रिश्तों में तनाव उभरा। ऐसे में मध्यावधि चुनाव ट्रंप की इन नीतियों को लेकर एक जनमत संग्रह की तरह काम कर सकता है।
 
अगर डेमोक्रेटिक पार्टी इस चुनाव में अपनी गति बनाए रखती है और जीत हासिल करती है, तो यह हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स पर ट्रम्प प्रशासन के नियंत्रण को तोड़ सकती है, जिससे कार्यकारी प्राधिकरण के प्रयोग पर विधायी रोक लग सकती है।

4. रूस के चुनाव

मौजूदा स्थिति: रूस 2022 से ही यूक्रेन के साथ संघर्ष में उलझा है। इस बीच 2026 में रूस अपने दूसरे सबसे अहम- आम चुनावों का आयोजन करने वाला है। इन आम चुनावों के जरिए रूस की संसद- डूमा के लिए सांसदों का चुनाव होगा। इसी के साथ देश में क्षेत्रीय गवर्नरों का चुनाव भी होगा। इसके अलावा रूस के 39 प्रांतों में स्थानीय चुनाव और शहरों में निकाय चुनाव का आयोजन होना है। यूक्रेन से जंग के बावजूद रूस में इन चुनावों की तैयारियां जारी हैं। स्वतंत्र वेबसाइट रशियन इलेक्शन मॉनिटर के मुताबिक, रूस की सरकार पुतिन के लिए समर्थन के लिहाज से इन चुनावों को अहमियत दे रही है। ऐसे में विपक्ष की वो पार्टियां जो अब तक युद्ध के खिलाफ रही हैं, वह भी पुतिन के फैसलों को चुनौती देने के लिए इन चुनावों में गंभीरता से उतरने की तैयारी कर रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि पुतिन समर्थित पार्टी को पिछले डूमा चुनाव में 321 सीटें मिली थीं। यह बाकी विपक्षी पार्टियों की कुल सीटों- 124 से काफी ज्यादा थीं। 

मुख्य मुद्दे: रूस में फिलहाल यूक्रेन से संघर्ष का मुद्दा सबसे बड़ा है। बीते करीब चार साल से लगातार जंग में जुटे इस देश में सैनिकों की शहादत बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। फ्रंटलाइन पर लंबे समय से जुटे सैनिक, दूसरे कामों में जुटे लोगों को सैनिक के तौर पर भर्ती करना लोगों के बीच असंतोष पैदा करने वाला है। 

दूसरी तरफ पश्चिमी देशों की तरफ से लगाए जा रहे प्रतिबंधों के चलते रूस को आर्थिक दिक्कतों का भी सामना करना पड़ा है। रूस में मौजूदा समय में बढ़ती महंगाई और करेंसी रूबल की गिरती स्थिति चिंता का विषय बनी है, जिससे युवाओं में नाराजगी बढ़ी है। 

हालांकि, रूस में पश्चिमी देशों की इस एकजुटता से राष्ट्रवाद को भी बढ़ावा मिला है और इस स्थिति के चलते पुतिन अब भी मजबूत हैं। रूस में यूक्रेन के खिलाफ युद्ध का विरोध तो होता है, लेकिन यह छिटपुट दायरों तक ही सीमित है। 

भारत के लिए क्या मायने: रूस और भारत के रिश्ते कई दशकों पुराने हैं। ऐसे में रूस के आंतरिक डूमा चुनावों का भारत पर सीधा कोई असर पड़ने की संभावना काफी कम है। खासकर तब जब पुतिन के राष्ट्रपति पद पर फर्क नहीं पड़ेगा। हालांकि, रूस में डूमा के नतीजों में कोई अप्रत्याशित बदलाव पुतिन के लिए अहम मुद्दा हो सकता है, क्योंकि यह जनता के मूड को दर्शाने वाली बात होगी। भारत भी रूस-यूक्रेन संघर्ष की प्रगति के लिहाज से इन चुनावों पर नजर रखेगा।

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5. इस्राइल के चुनाव

मौजूदा हालात: इस्राइल में होने वाले चुनाव वैश्विक भू-राजनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से अहम हैं। तेल अवीव में अक्तूबर 2026 तक संसदीय चुनाव (Knesset Election) होने हैं, जो 7 अक्तूबर 2023 को हमास के हमले के बाद होने वाले पहले चुनाव होंगे। मजेदार बात यह है कि इस्राइल में मार्च 2026 तक नया बजर पारित होना है। अगर यह बजट पारित कराने के लिए प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू जरूरी समर्थन नहीं जुटा पाते तो उनकी सरकार अल्पमत में मानी जाएगी और चुनाव की प्रक्रिया खुद-ब-खुद शुरू हो जाएगी। ऐसे में चुनाव इस साल के मध्य तक भी कराए जा सकते हैं। 

गौरतलब है कि 2018 और 2022 के बीच इस्राइल में पांच चुनाव हुए, लेकिन एक स्थिर गठबंधन नहीं बन पाया, जिसके चलते लगातार प्रधानमंत्री बदलने का सिलसिला चलता रहा। हालांकि, हमास की ओर से 2023 में किए गए हमले के बाद देश में आपातकाल लगा दिया गया। कई विपक्षी दलों ने इस दौरान सरकार को मजबूती से चलाने के लिए नेतन्याहू को समर्थन दे दिया, ताकि इस्राइल अपने खतरों से निपट सके। अब इस्राइल-हमास में चल रहे अस्थायी संघर्षविराम के बीच इस्राइल में चुनाव की संभावना प्रबल हैं।

मुख्य मुद्दे: इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जिन्हें बीबी के नाम से भी जाना जाता है, इस चुनाव के केंद्र में हैं। नेतन्याहू लंबे समय से भ्रष्टाचार के कई मामलों से जूझ रहे हैं, जिसने देश में राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा किया है। उन पर 2019 में रिश्वत लेने और धोखाधड़ी के आरोप दर्ज किए गए थे और उनका मुकदमा अभी भी चल रहा है। अगर वह सत्ता से बाहर होते हैं, तो उन्हें जेल की सजा का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, पीएम रहते हुए उन्हें कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा मिली है। 

इस्राइल के आंतरिक चुनावी सर्वेक्षणों से पता चलता है कि नेतन्याहू की अप्रूवल रेटिंग 30 फीसदी पर पहुंच गई है। यानी हर 100 में से सिर्फ 30 लोग ही उनके पूर्ण समर्थन में हैं। अमेरिकी संस्थान- काउंसिल फॉर फॉरेन रिलेशन (सीएफआर) के मुताबिक, नेतन्याहू की न्यायिक निरीक्षण पर अंकुश लगाने की कोशिशें, 7 अक्तूबर के हमले में खुफिया विभाग की नाकामी और देश में लगातार बढ़ती महंगाई बड़ा मुद्दा बना है। यह मुद्दे चुनाव में बड़ा असर डाल सकते हैं। 

हालांकि, विपक्ष के बंटे होने की वजह से नेतन्याहू के प्रधानमंत्री बने रहने की संभावना फिर पैदा हो गई है। उनकी लिकुड पार्टी को नेसेट (इस्राइली संसद) में धुर-दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी गुट के समर्थन से बढ़त मिल सकती है। दूसरी ओर नेतन्याहू ने 7 अक्तूबर के हमास के हमलों के बाद गाजा से लेकर लेबनान और सीरिया से लेकर ईरान तक से पैदा हो रहे खतरों को कम करने में अहम भूमिका निभाई है। ऐसे में जनता का समर्थन उनके साथ जा सकता है। 

भारत के लिए क्या मायने: इस्राइल में एक स्थिर सरकार भारत के लिहाज से काफी अहम है। 2014 के बाद से भारत और इस्राइल के रिश्ते काफी बेहतर हुए हैं। खासकर प्रधानमंत्री मोदी और पीएम नेतन्याहू के नेतृत्व में दोनों देश करीब आए हैं। लिकुड पार्टी का शासन भारत के लिए काफी फायदेमंद भी रहा है और दोनों देशों के बीच न कूटनीतिक रिश्तों से लेकर रक्षा क्षेत्र तक में सहयोग बढ़ा है। हालांकि, यह सहयोग तब भी जारी रहा, जब इस्राइल में नेतन्याहू के हटने के बाद एक दक्षिणपंथी गठबंधन अस्तित्व में आया था। 

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6. हंगरी के चुनाव

मौजूदा हालात: हंगरी में संसदीय चुनाव अप्रैल 2026 में होने वाले हैं। प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान, जो 2010 से सत्ता में हैं, लंबे समय से लोकप्रियता प्रधानमंत्री रहे। ओरबान और उनकी फिडेज पार्टी पर अदालतों, नियामक निकायों और सांस्कृतिक संस्थानों पर नियंत्रण मजबूत करने के आरोप लगते हैं। हालांकि, अब उन्हें तिस्जा पार्टी के रूप में अपनी सबसे कठिन चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इसका नेतृत्व पीटर मैग्यार कर रहे हैं। मैग्यार ने एक भ्रष्टाचार घोटाले के बाद ओरबान की फिडेज पार्टी से संबंध तोड़ लिए थे।

चुनावी सर्वेक्षणों के मुताबिक, ओरबान की फिडेज पार्टी वर्तमान में तिस्जा पार्टी से पिछड़ रही है। तिस्जा ने 2024 के यूरोपीय संसद चुनाव में लगभग 30% वोट हासिल किए थे। हालांकि, ओरबान ने इस नई चुनावी चुनौती का जवाब देने के लिए एक पुनर्गठन कानून पारित किया है, जिसके जरिए कुछ जिलों और प्रांतों की संरचना को बदला जाना है। इससे तिस्जा पार्टी के लिए संसदीय बहुमत हासिल करना कठिन हो जाएगा।

मुख्य मुद्दे: हंगरी में ओरबान के लिए चुनाव जीतना काफी टेढ़ी खीर साबित हो सकता है। दरअसल, फिडेज सरकार पर कई भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोप लगे हैं। इसके चलते उसका समर्थन घटा है। साथ ही पश्चिमी देशों ने ओरबान के अंतर्गत हंगरी के लोकतांत्रिक रास्ते से भटकने और सत्तावादी शासन की ओर झुकाव की बात भी की है। हालांकि, पश्चिम के अधिकतर आरोप इस बात से प्रेरित हैं कि ओरबान की रूस से करीबी है और वे यूक्रेन से जुड़े मामलों में अकसर यूरोप को अलग रहने की सलाह देते रहे हैं। खुद ओरबान भी अलग-अलग मौकों पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की तारीफ करते रहे हैं। 

भारत पर प्रभाव: हंगरी और भारत के दोस्ताना रिश्ते 1948 में ही स्थापित हो गए थे। मौजूदा समय में यहां करीब नौ हजार भारतीय रहते हैं, जो कि आईटी और उत्पादन सेक्टर से जुड़े हैं। दोनों देशों के बीच बीते वित्त वर्ष में द्विपक्षीय व्यापार 1.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। हंगरी कई मुद्दों पर रूस और पश्चिमी देशों के बीच संतुलन बनाने वाले देश के तौर पर देखा जाता है। ऐसे में भारत यूरोप के इस देश के बदलते रुख पर खास नजर रखता है। 

7. म्यांमार के चुनाव

मौजूदा हालात: म्यांमार में सैन्य-नेतृत्व वाले प्रशासन ने दिसंबर 2025 से शुरू होकर जनवरी 2026 तक तीन चरणों में आम चुनाव तय किए हैं। ये चुनाव फरवरी 2021 में सैन्य जनरल मिन आंग ह्लैंग की ओर से किए गए सैन्य तख्तापलट के वर्षों बाद हो रहे हैं। यह चुनाव ऐसे समय में हो रहे हैं जब भारत के इस पड़ोसी मुल्क में गृह युद्ध, मुद्रास्फीति और लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था का संकट मंडरा रहा है। 

पिछले चार वर्षों में म्यांमार की सेना नागरिक राष्ट्रीय एकता सरकार (एनयूजी) के नेतृत्व वाली पीपुल्स डिफेंस फोर्स (पीडीएफ) और विभिन्न जातीय सशस्त्र संगठनों के खिलाफ गृह युद्ध लड़ रही है। हालांकि, पिछले एक साल में सैन्य शासन ने अपने नियंत्रण को मजबूत करने और विद्रोही संगठनों द्वारा छीनी गई कुछ जमीनों को वापस पाने में सक्षम रहा है। खासकर चीन की सीमा से लगे क्षेत्रों में। ऐसे में म्यांमार के एक बड़े इलाके में चुनाव कराए जा रहे हैं। म्यांमार के संविधान के तहत उच्च और निचले सदन की एक-चौथाई सीटें सेवारत सैन्य कर्मियों के लिए आरक्षित की गई हैं।

मुख्य मुद्दे: म्यांमार का चुनाव कई आंतरिक और भू-राजनीतिक समस्याओं के बीच हो रहा है। सैन्य शासन इन चुनावों के जरिए देश पर अपनी सत्ता स्थापित करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैधता हासिल करने की कोशिश में जुटा है। दूसरी ओर कई प्रमुख विपक्षी दल जिनमें नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी)  शामिल हैं, जिसका नेतृत्व नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की कर रही थीं। यह गठबंधन इन चुनावों का बहिष्कार कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि ये ढोंग है। सिर्फ कुछ छोटी पार्टियां ही चुनाव में शामिल हो रही हैं। 
दूसरी तरफ 2021 में गृह युद्ध शुरू होने के बाद से लगभग 36 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं, और 1.6 करोड़ से अधिक लोगों को सहायता की जरूरत है। 

भारत के लिए क्या मायने: म्यांमार में चुनाव या इसके बाद की कोई हिंसा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर मिजोरम में शरणार्थी स्थिति और तनाव बढ़ सकती है। यहां लगभग 80,000 शरणार्थी पहले से रह रहे हैं। चूंकि म्यांमार भारत के लिए दक्षिण पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार है। ऐसे में म्यांमार में शांति भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी'और कनेक्टिविटी परियोजनाओं (जैसे भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग और कलादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट) की सफलता के लिए अहम है। भारत इस बात को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है कि कहीं चीन गलत तरीकों से म्यांमार को भारत से अलग-थलग करने की कोशिश न करे।

दूसरी ओर जब दुनिया की कई वैश्विक शक्तियां म्यांमार की वर्तमान स्थिति को नजरअंदाज कर रही हैं, वहीं भारत, चीन और थाईलैंड सक्रिय रूप से यहां के शासन से जुड़े हुए हैं। भारत, चीन और रूस ने निष्पक्ष चुनावों की मांग की है और इसका समर्थन किया है।

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