किम जोंग की और बढ़ी ताकत: फिर बने उत्तर कोरिया के स्टेट अफेयर्स कमीशन के प्रमुख, बहन को लगा झटका; समझिए कैसे?
उत्तर कोरिया की सत्ता में एक बार फिर बड़ा संदेश देते हुए किम जोंग को स्टेट अफेयर्स कमीशन का अध्यक्ष बना दिया गया है। संसद के नए सत्र में यह फैसला हुआ, जहां उनके करीबी जो योंग-वोन को अहम जिम्मेदारी मिली। हालांकि सबसे चौंकाने वाला फैसला उनकी बहन किम यो-जोंग को आयोग से हटाना रहा।
विस्तार
उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन को एक बार फिर देश की सबसे बड़ी सत्ता वाली संस्था स्टेट अफेयर्स कमीशन का अध्यक्ष चुन लिया गया है। यह फैसला देश की संसद सुप्रीम पीपुल्स असेंबली (एसपीए) के नए सत्र की पहली बैठक में लिया गया। यह बैठक हाल ही में हुए सत्ताधारी पार्टी के सम्मेलन के बाद बुलाई गई थी। उत्तर कोरिया में आम तौर पर पार्टी कांग्रेस के बाद संसद की बैठक होती है, ताकि वहां लिए गए फैसलों को कानून का रूप दिया जा सके।
क्या-क्या बड़े फैसले हुए?
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किम जोंग को फिर से स्टेट अफेयर्स कमीशन का अध्यक्ष बनाया गया।
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उनके करीबी सहयोगी जो योंग-वोन को संसद की सबसे ऊंची पोस्ट एसपीए स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन के रूप में चुना गया।
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पहले इस पद पर चोए रयोंग-हे थे, जिन्हें अब हटा दिया गया।
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देश के प्रधानमंत्री पाक थे-सोंग अपने पद पर बने रहेंगे।
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पूर्व प्रधानमंत्री किम टोक-हुन को नया पद फर्स्ट वाइस प्रीमियर दिया गया है।
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किम जोंग की बहन को झटका कैसे, समझिए
बता दें कि इस फेरबदल में एक अहम बात यह रही कि किम जोंग-उन की बहन किम यो-जोंग को स्टेट अफेयर्स कमीशन से हटा दिया गया है। वह 2021 से इस संस्था की सदस्य थीं और उन्हें काफी ताकतवर नेता माना जाता है।
अब संविधान में बदलाव पर रहेगा फोकस
हालांकि दूसरी ओर विशेषज्ञों का मानना है कि इस बैठक में संविधान में बदलाव पर भी चर्चा हो सकती है। ऐसे में संभव है कि उत्तर और दक्षिण कोरिया के रिश्तों को आधिकारिक रूप से दो दुश्मन देशों के रूप में परिभाषित किया जाए।
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उत्तर कोरिया में कैसे होता है चुनाव?
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि उत्तर कोरिया की संसद में कुल 687 सदस्य चुने गए हैं। उत्तर कोरिया में चुनाव की प्रक्रिया दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों से बहुत अलग है। यहां के चुनाव में मतदाताओं को केवल एक उम्मीदवार का नाम वाला मतपत्र दिया जाता है। इसके बाद अगर कोई व्यक्ति उम्मीदवार का विरोध करना चाहता है, तो उसे अलग बूथ में जाकर नाम काटना पड़ता है। यह प्रक्रिया गुप्त नहीं होती और इसे कभी-कभी राजद्रोह जैसा माना जा सकता है।
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