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खबर लिखी या खोला राज?: एयरफोर्स वन की खबर छापनी पड़ी भारी; अब रिपोर्टरों से ग्रैंड जूरी में होगी पूछताछ

Sun, 12 Jul 2026 08:34 AM IST
प्रशांत तिवारी वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: प्रशांत तिवारी Updated Sun, 12 Jul 2026 08:34 AM IST
सार

एयर फोर्स वन की सुरक्षा से जुड़ी खबर प्रकाशित करने के बाद अमेरिकी न्याय विभाग ने न्यूयॉर्क टाइम्स के चार पत्रकारों को ग्रैंड जूरी के सामने पेश होने के लिए समन जारी किया है। इस कदम को प्रेस की स्वतंत्रता पर बड़ा हमला माना जा रहा है, जबकि ट्रंप प्रशासन का कहना है कि निशाने पर पत्रकार नहीं बल्कि गोपनीय जानकारी लीक करने वाले लोग हैं।

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Reporting story or revealing secret Publishing Air Force One story reporters face Grand Jury questioning
नया एयरफोर्स वन - फोटो : एक्स/रैपिड रेस्पॉन्स 47 /अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कतर की ओर से उपहार में मिले विमान को एयर फोर्स वन के बेड़े में शामिल किए जाने और उससे जुड़ी सुरक्षा संबंधी खबरें प्रकाशित करने के बाद अमेरिकी न्याय विभाग ने न्यूयॉर्क टाइम्स के कई पत्रकारों को समन जारी किया है। इस कार्रवाई को ट्रंप प्रशासन की मीडिया के खिलाफ चल रही मुहिम का अब तक का सबसे आक्रामक कदम माना जा रहा है। प्रेस की स्वतंत्रता के समर्थकों ने इसकी कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि यह अमेरिकी लोकतंत्र की सबसे बुनियादी आजादियों में से एक, प्रेस की स्वतंत्रता, पर सीधा प्रहार है।

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क्या नए एयर फोर्स वन को लेकर विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
अमेरिका के सहयोगी देश कतर की ओर से उपहार में मिले इस नए विमान को ट्रंप प्रशासन ने करीब 40 करोड डॉलर खर्च कर आधुनिक तकनीक से लैस किया और इसमें कई जरूरी बदलाव किए। यह विमान पिछले सप्ताह ही सेवा में शामिल हुआ था। हालांकि, ट्रंप ने तुर्किये में नाटो सम्मेलन से लौटते समय पुराने एयर फोर्स वन का इस्तेमाल किया। बाद में उन्होंने ईरान की ओर से खुद को मिलने वाली धमकियों का भी जिक्र किया।
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किन पत्रकारों को समन भेजा गया और क्यों?
समन के जरिए पत्रकारों को अगले सप्ताह मैनहैटन की संघीय ग्रैंड जूरी के सामने गवाही देने के लिए बुलाया गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, संघीय एजेंट कुछ पत्रकारों के घर तक समन पहुंचाने गए। बताया गया कि यह कार्रवाई एफबीआई निदेशक काश पटेल और न्याय विभाग के अन्य अधिकारियों की व्हाइट हाउस में हुई बैठक के बाद की गई। इस मामले की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति ने, नाम गोपनीय रखने की शर्त पर, यह जानकारी दी। समन पाने वाले पत्रकारों में जूलियन ई. बार्न्स, एरिक लिप्टन, टायलर पेजर और एरिक श्मिट शामिल हैं।
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क्या एफबीआई ने खबर रोकने और सूत्र बताने की मांग की थी?
न्यूयॉर्क टाइम्स ने बताया कि पहली खबर प्रकाशित होने से पहले एफबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अखबार के एक रिपोर्टर और संपादक से संपर्क कर खबर रोकने का अनुरोध किया था। अधिकारी ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया, लेकिन यह नहीं बताया कि सुरक्षा को किस तरह का खतरा है। साथ ही उन्होंने खबर के सूत्रों की जानकारी भी मांगी, जिसे अखबार ने देने से इनकार कर दिया। न्यूयॉर्क टाइम्स के वकील डेविड मैक्राउ ने कहा कि अगर संघीय कानून प्रवर्तन एजेंट पत्रकारों के घर के दरवाजे पर पहुंच रहे हैं, तो यह हर उस अमेरिकी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए जो संविधान और प्रेस की स्वतंत्रता में विश्वास रखता है। इस मामले में व्हाइट हाउस ने समन को लेकर भेजे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया।

क्या प्रेस संगठनों ने इस कार्रवाई का विरोध किया?
रिपोर्टर्स कमेटी फॉर फ्रीडम ऑफ द प्रेस के अध्यक्ष ब्रूस डी. ब्राउन ने कहा कि ट्रंप की 'मीडिया के खिलाफ जंग अब एक और शिकार तलाश रही है।' उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई न्याय विभाग की उस लंबे समय से चली आ रही परंपरा के खिलाफ है, जिसके तहत पत्रकारों से जानकारी तभी मांगी जाती थी जब जांच के बाकी सभी रास्ते पूरी तरह खत्म हो जाते थे।

न्याय विभाग ने अपनी कार्रवाई का क्या बचाव किया?
अमेरिकी न्याय विभाग ने स्पष्ट किया कि पत्रकार जांच के निशाने पर नहीं हैं, बल्कि वे लोग हैं जिन्होंने गोपनीय सरकारी जानकारी लीक की है। विभाग ने कहा कि हम इस देश में प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका का सम्मान करते हैं, लेकिन न्याय विभाग की जिम्मेदारी यह भी है कि जिन लोगों को देश के गोपनीय दस्तावेज सौंपे गए हैं, वे उन्हें सार्वजनिक न करें।' विभाग ने माना कि प्रेस और सरकार के बीच स्वाभाविक तनाव हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी लीक करने वालों के खिलाफ जांच रोक दी जाए।

क्या यह मीडिया के खिलाफ ट्रंप की बड़ी मुहिम का हिस्सा है?
पत्रकारों को समन भेजना ट्रंप प्रशासन की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें संघीय सरकार की ताकत का इस्तेमाल कर स्वतंत्र मीडिया संस्थानों पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। आलोचकों का कहना है कि इसका उद्देश्य नकारात्मक खबरों से बचना और प्रेस की स्वतंत्रता को कमजोर करना है। इसी साल न्याय विभाग ने द वाशिंगटन पोस्ट और द वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकारों को भी गवाही के लिए समन भेजा था, हालांकि बाद में वे समन वापस ले लिए गए। जनवरी में एफबीआई ने वाशिंगटन पोस्ट की पत्रकार हैना नैटानसन के घर की भी तलाशी ली थी। वह ट्रंप प्रशासन के दौरान संघीय सरकार में हुए बदलावों पर रिपोर्टिंग कर रही थीं। यह कार्रवाई एक ऐसे मामले में की गई थी जिसमें पेंटागन के एक ठेकेदार पर गोपनीय दस्तावेज घर ले जाने का आरोप था।

विशेषज्ञों ने इस कदम को कितना गंभीर बताया?
फाउंडेशन फॉर इंडिविजुअल राइट्स एंड एक्सप्रेशन के वरिष्ठ वकील एडम स्टाइनबॉ ने कहा कि पत्रकारों को ग्रैंड जूरी के सामने पेश होने के लिए मजबूर करना पत्रकारों और व्हिसलब्लोअर दोनों के लिए डर का माहौल पैदा करता है। उन्होंने कहा, 'इन तरीकों का इस्तेमाल अब पहले से ज्यादा होने लगा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इन्हें सामान्य मान लिया जाए।' 

क्या ट्रंप पहले भी मीडिया पर निशाना साधते रहे हैं?
अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप मीडिया को अमेरिकी जनता का 'दुश्मन' बता चुके हैं। व्हाइट हाउस लौटने के बाद उन्होंने मीडिया संस्थानों के खिलाफ पहले से कहीं अधिक आक्रामक रुख अपनाया है। उनकी ओर से कई समाचार संस्थानों पर मुकदमे दायर किए गए, कुछ टीवी चैनलों के प्रसारण लाइसेंस रद्द करने की धमकी दी गई और मीडिया संस्थानों तथा सोशल मीडिया कंपनियों पर दबाव बनाने की भी कोशिश की गई।

पत्रकारों से जुड़ी जांच को लेकर नियमों में क्या बदलाव हुए?
अमेरिकी न्याय विभाग समय-समय पर यह तय करता रहा है कि मीडिया लीक के मामलों में पत्रकारों के साथ किस तरह की जांच प्रक्रिया अपनाई जाएगी। हालांकि अलग-अलग सरकारों के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जांच में पत्रकारों के फोन रिकॉर्ड जब्त किए जाने की घटनाएं हुई हैं, लेकिन पत्रकारों को ग्रैंड जूरी के सामने अपने सूत्र बताने के लिए मजबूर करना बेहद दुर्लभ माना जाता है। अप्रैल 2025 में तत्कालीन अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी ने जो बाइडेन प्रशासन के उस नियम को खत्म कर दिया था, जिसके तहत लीक मामलों की जांच में पत्रकारों के फोन रिकॉर्ड गुप्त रूप से हासिल करने पर रोक थी। मीडिया संगठनों और प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े समूह लंबे समय से इस तरह की कार्रवाई का विरोध करते रहे हैं। इस बदलाव के बाद अभियोजकों को समन, अदालत के आदेश और सर्च वारंट के जरिए उन सरकारी अधिकारियों तक पहुंचने का अधिकार मिल गया जो पत्रकारों को बिना अनुमति गोपनीय जानकारी उपलब्ध कराते हैं। पाम बॉन्डी के ज्ञापन में यह भी कहा गया था कि पत्रकारों को सामान्य तौर पर ऐसी जांच की पहले से सूचना दी जाएगी और समन का दायरा सीमित रखा जाएगा। साथ ही सर्च वारंट में ऐसे प्रावधान होंगे जो पत्रकारिता से जुड़ी संरक्षित सामग्री और समाचार जुटाने की प्रक्रिया में अनावश्यक दखल को सीमित करें।

तुर्किये से लौटते समय ट्रंप ने विमान क्यों बदला?
इस सप्ताह तुर्किये यात्रा के दौरान ट्रंप नए एयर फोर्स वन से गए थे। लेकिन बुधवार को वहां से इंग्लैंड के सफोक स्थित रॉयल एयर फोर्स बेस मिल्डेनहॉल के लिए उन्होंने पुराने एयर फोर्स वन से उड़ान भरी। दिलचस्प बात यह रही कि नया विमान भी मिल्डेनहॉल पहुंचा। वहां ट्रंप ने विमान बदला और फिर नए एयर फोर्स वन से संयुक्त राज्य अमेरिका के जॉइंट बेस एंड्रूज के लिए रवाना हुए।


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क्या सुरक्षा कारणों से विमान बदला गया था?
यह बदलाव ऐसे समय हुआ जब ईरान के साथ संघर्ष विराम टूट चुका था। अमेरिका ने ईरान पर हवाई हमले किए थे और जवाब में तेहरान ने खाड़ी के तीन अरब देशों पर हमला किया था। चूंकि ईरान और तुर्किये की सीमा आपस में मिलती है, इसलिए अटकलें लगाई जाने लगीं कि नए विमान में पुराने एयर फोर्स वन जैसी उन्नत सुरक्षा और मिसाइल रोधी प्रणाली मौजूद नहीं है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने गुमनाम सूत्रों के हवाले से बताया कि सीक्रेट सर्विस की सलाह पर विमान बदला गया था और नए विमान में पुराने एयर फोर्स वन जैसी कुछ अत्याधुनिक सुरक्षा सुविधाएं, विशेष रूप से एंटी मिसाइल प्रणाली, उपलब्ध नहीं थीं। हालांकि ट्रंप ने इन दावों को खारिज करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि मिल्डेनहॉल में रुकने का उद्देश्य वहां तैनात अमेरिकी सैनिकों को नया विमान दिखाना था। उड़ान के दौरान पत्रकारों से बातचीत में भी ट्रंप ने कहा कि ईरान से किसी सुरक्षा खतरे के कारण दो विमानों का इस्तेमाल नहीं किया गया। फिर भी जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें ईरान की ओर से एयर फोर्स वन पर किसी विश्वसनीय खतरे की जानकारी है, तो उन्होंने जवाब दिया, 'मुझे हर समय खतरा रहता है। उनकी सूची में मैं पहले नंबर पर हूं।' 

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