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चिंताजनक: अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम 47 फीसदी अधिक, विशेषज्ञों ने चेताया
अमर उजाला नेटवर्क, वाशिंगटन/नई दिल्ली
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Fri, 13 Feb 2026 04:48 AM IST
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सार
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड कम करना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए उतना ही अहम हो सकता है, जितना पिछली सदी में तंबाकू छोड़ना था।
अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
अमेरिका में रोजमर्रा की डाइट का बड़ा हिस्सा बन चुके अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स अब सीधे तौर पर दिल की बीमारियों से जुड़े पाए गए हैं। फ्लोरिडा अटलांटिक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर पाया है कि जो वयस्क सबसे ज्यादा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ खाते हैं, उनमें हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा 47% तक अधिक है। उम्र, धूम्रपान और आय जैसे कारकों को समायोजित करने के बाद भी यह जोखिम बना रहा।
क्या होते हैं अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स?
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स ऐसे औद्योगिक उत्पाद होते हैं जिनमें अतिरिक्त वसा, चीनी, स्टार्च, नमक और इमल्सीफायर जैसे रासायनिक एडिटिव्स मिलाए जाते हैं। सोडा, पैकेज्ड स्नैक्स और प्रोसेस्ड मीट इसके आम उदाहरण हैं। निर्माण के दौरान इनमें कई प्राकृतिक पोषक तत्व हटा दिए जाते हैं, जिससे ये अपने मूल स्वरूप से काफी अलग हो जाते हैं। इनमें ऐसे तत्व भी शामिल होते हैं जिनका मानव शरीर को ऐतिहासिक रूप से अनुभव नहीं रहा है।
आज स्थिति यह है कि अमेरिका में औसतन वयस्कों की लगभग 60% कैलोरी और बच्चों की करीब 70% कैलोरी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन से आती है। अमेरिका ही नहीं दुनिया के तमाम देशों में अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ती जा रही है। पिछले अध्ययनों में यह दिखाया जा चुका है कि ज्यादा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने वालों में मेटाबॉलिक सिंड्रोम का खतरा बढ़ जाता है, जिसमें मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, असामान्य कोलेस्ट्रॉल स्तर और इंसुलिन रेजिस्टेंस शामिल हैं।
तंबाकू जैसी चुनौती बन सकता है आधुनिक भोजन
शोधकर्ताओं का कहना है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से जुड़े स्वास्थ्य खतरों की पहचान उसी तरह समय ले सकती है, जैसे पिछली सदी में तंबाकू के नुकसान समझने में लगा था। इसका एक कारण बड़े बहुराष्ट्रीय खाद्य निगमों का प्रभाव भी है, जो वैश्विक फूड मार्केट पर हावी हैं। साथ ही, कई समुदायों में स्वस्थ भोजन तक सीमित पहुंच भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है।हेनेकन्स के अनुसार, अल्ट्रा- प्रोसेस्ड फूड से निपटना सिर्फ व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं है। यह ऐसे वातावरण बनाने की बात है जहां स्वस्थ विकल्प सबसे आसान विकल्प हों। क्लिनिकल गाइडेंस और सार्वजनिक स्वास्थ्य शिक्षा जरूरी है ताकि पौष्टिक भोजन हर किसी के लिए सुलभ और किफायती हो सके।
कोलोरेक्टल कैंसर और अन्य बीमारियां भी संभव
शोधकर्ताओं ने कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामलों की ओर भी ध्यान दिलाया है, खासकर युवा वयस्कों में। इस कैंसर के कई जोखिम कारक कार्डियोवैस्कुलर डिजीज से मेल खाते हैं, जिनमें डाइट पैटर्न प्रमुख है। एफएयू श्मिट कॉलेज ऑफ मेडिसिन के प्रोफेसर और चेयर एलिसन एच. फेरिस ने कहा, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बढ़ती खपत इसके लिए एक योगदानकर्ता हो सकती है, साथ ही अन्य आहार और जीवनशैली कारक भी भूमिका निभाते हैं जो कई गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल बीमारियों को प्रभावित करते हैं।
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अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स ऐसे औद्योगिक उत्पाद होते हैं जिनमें अतिरिक्त वसा, चीनी, स्टार्च, नमक और इमल्सीफायर जैसे रासायनिक एडिटिव्स मिलाए जाते हैं। सोडा, पैकेज्ड स्नैक्स और प्रोसेस्ड मीट इसके आम उदाहरण हैं। निर्माण के दौरान इनमें कई प्राकृतिक पोषक तत्व हटा दिए जाते हैं, जिससे ये अपने मूल स्वरूप से काफी अलग हो जाते हैं। इनमें ऐसे तत्व भी शामिल होते हैं जिनका मानव शरीर को ऐतिहासिक रूप से अनुभव नहीं रहा है।
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आज स्थिति यह है कि अमेरिका में औसतन वयस्कों की लगभग 60% कैलोरी और बच्चों की करीब 70% कैलोरी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन से आती है। अमेरिका ही नहीं दुनिया के तमाम देशों में अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ती जा रही है। पिछले अध्ययनों में यह दिखाया जा चुका है कि ज्यादा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने वालों में मेटाबॉलिक सिंड्रोम का खतरा बढ़ जाता है, जिसमें मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, असामान्य कोलेस्ट्रॉल स्तर और इंसुलिन रेजिस्टेंस शामिल हैं।
तंबाकू जैसी चुनौती बन सकता है आधुनिक भोजन
शोधकर्ताओं का कहना है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से जुड़े स्वास्थ्य खतरों की पहचान उसी तरह समय ले सकती है, जैसे पिछली सदी में तंबाकू के नुकसान समझने में लगा था। इसका एक कारण बड़े बहुराष्ट्रीय खाद्य निगमों का प्रभाव भी है, जो वैश्विक फूड मार्केट पर हावी हैं। साथ ही, कई समुदायों में स्वस्थ भोजन तक सीमित पहुंच भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है।हेनेकन्स के अनुसार, अल्ट्रा- प्रोसेस्ड फूड से निपटना सिर्फ व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं है। यह ऐसे वातावरण बनाने की बात है जहां स्वस्थ विकल्प सबसे आसान विकल्प हों। क्लिनिकल गाइडेंस और सार्वजनिक स्वास्थ्य शिक्षा जरूरी है ताकि पौष्टिक भोजन हर किसी के लिए सुलभ और किफायती हो सके।
कोलोरेक्टल कैंसर और अन्य बीमारियां भी संभव
शोधकर्ताओं ने कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामलों की ओर भी ध्यान दिलाया है, खासकर युवा वयस्कों में। इस कैंसर के कई जोखिम कारक कार्डियोवैस्कुलर डिजीज से मेल खाते हैं, जिनमें डाइट पैटर्न प्रमुख है। एफएयू श्मिट कॉलेज ऑफ मेडिसिन के प्रोफेसर और चेयर एलिसन एच. फेरिस ने कहा, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बढ़ती खपत इसके लिए एक योगदानकर्ता हो सकती है, साथ ही अन्य आहार और जीवनशैली कारक भी भूमिका निभाते हैं जो कई गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल बीमारियों को प्रभावित करते हैं।
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