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UNSC Reforms: 'निहित स्वार्थों के कारण सुरक्षा परिषद में नहीं हो रहे सुधार'; वैश्विक मंच पर भारत की दो-टूक

आईएएनएस, संयुक्त राष्ट्र Published by: Asmita Tripathi Updated Wed, 27 May 2026 11:04 AM IST
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सार

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग की। भारतीय प्रतिनिधि ने  कहा कि 1945 की पुरानी व्यवस्था आज की चुनौतियों से निपटने में सक्षम नहीं है। भारत ने  परिषद की स्थायी सदस्यता बढ़ाने की जरूरत बताई। 

UNSC Reforms Security Council reforms are stalled due to vested interests India blunt statement on the global
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी हरीश - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

भारत ने मंगलवार को कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद 1945 की व्यवस्था में काम कर रही है। यह विश्वसनीयता के संकट का सामना कर रही है। भारत ने आगे कहा कि 'निहित स्वार्थ' उन सुधारों को रोक रहे हैं, जिनकी आवश्यकता इसे समकालीन चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाने के लिए है।



भारत के प्रतिनिधि ने क्या कहा?
भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने मंगलवार को कहा, 'परिषद सुधारों पर अंतर-सरकारी वार्ता (आईएन) में प्रगति की कमी कई सदस्य देशों के यथास्थिति बनाए रखने और आठ दशक पुरानी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद संरचना को बरकरार रखने के निहित स्वार्थों का संकेत है।' सुधारों में मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र के कुछ सदस्य देशों का एक छोटा समूह बाधा डाल रहा है, जो स्वयं को यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस (यूएफसी) कहते हैं। इस समूह का नेतृत्व इटली कर रहा है। इसमें पाकिस्तान भी शामिल है। यह समूह बातचीत को आगे बढ़ने से रोकने के लिए प्रक्रियात्मक दांव-पेच का इस्तेमाल करता है।
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स्थायी श्रेणी मेंं विस्तार करना चाहिए
हरीश परिषद में 'संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों को बनाए रखना और संयुक्त राष्ट्र-केंद्रित अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली को मजबूत करना' विषय पर हो रही बहस में बोल रहे थे। भारत के सुधार प्रस्तावों का मुख्य बिंदु परिषद की स्थायी सदस्यता का विस्तार करना है। उन्होंंने  ने कहा, 'हमें सदस्यता की स्थायी श्रेणी पर ध्यान देना चाहिए और उसका विस्तार करना चाहिए, जिससे इस परिषद की निर्णय लेने की प्रक्रिया में बदलाव आएगा।'


महासचिव गुटेरेस ने क्या कहा?
उन्होंने आगे कहा, 'बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार न ढलने से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अधिकार, विश्वसनीयता, वैधता और प्रभावशीलता और भी कम हो जाएगी।' महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी परिषद के विश्वसनीयता संकट की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा, 'एक सुरक्षा परिषद जो आज की दुनिया की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती है। वह अपनी जिम्मेदारियों को पूरी तरह से नहीं निभा सकती है।'

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सुधार का अर्थ क्या?
उन्होंने कहा, टवैश्विक संस्थानों को आज की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करना चाहिए, न कि 1945 की वास्तविकताओं को। इस परिषद में यह बात सबसे अधिक जरूरी है।' अफ्रीका के साथ हुए अन्याय का खास रूप से  जिक्र करते हुए (जिसे स्थायी सदस्यता से बाहर रखा गया है), गुटेरेस ने कहा, 'सुधार का अर्थ है विश्वसनीयता बहाल करना और यह सुनिश्चित करना कि यह परिषद चार्टर को बनाए रखने के लिए निर्णायक और समावेशी रूप से काम कर सके।'

'1940 के दशक में अटकी हुई है'
वही भारत के हरीश स्थायी प्रतिनिधि ने कहा, 'संयुक्त राष्ट्र के सामने आज की चुनौतियों का मूल कारण एक ऐसी संरचना है, जो 1940 के दशक में अटकी हुई है। यह कुछ ऐसा ही है जैसे उन्नत एआई तकनीकों को 1945 के इलेक्ट्रॉनिक न्यूमेरिकल इंटीग्रेटर एंड कंप्यूटर (ENIAC) नामक कंप्यूटर के संस्करण पर चलाना।' मानव जाति के अनुकूलनशीलता के माध्यम से जीवित रहने और फलने-फूलने के लिए जिम्मेदार विकासवादी सिद्धांतों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, 'संयुक्त राष्ट्र इस मूलभूत विकासवादी सिद्धांत के प्रति उदासीन नहीं रह सकता। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों और उद्देश्यों को सार्थक रूप से पूरा करने के लिए इसे लचीला और अनुकूलनीय होना चाहिए।'

पुनर्गठित परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारत की ओर से तर्क देते हुए हरीश ने संयुक्त राष्ट्र की स्थापना से पहले के समय से लेकर वैश्विक शांति में भारत के योगदान की ओर इशारा किया। परिषद के पांच स्थायी सदस्य द्वितीय विश्व युद्ध के विजेता हैं। उनके दावे युद्ध में उनकी भूमिकाओं पर आधारित हैं। वहीं, हरीश ने भारतीयों की ओर से किए गए समान बलिदानों को याद करते हुए भारत को भी इसी तरह का दावा करने का आधार दिया।

'यह युद्ध हमारा नहीं था'
उन्होंने बताया कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 25 लाख से अधिक भारतीय सैनिकों ने मित्र देशों के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी और 87,000 से अधिक सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया, जिसके कारण संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ। उन्होंने कहा, 'यह युद्ध हमारा नहीं था, लेकिन हमने इसकी भारी कीमत चुकाई। इसलिए, हमारे लिए संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य बनना स्वाभाविक था।' उन्होंने आगे कहा, 'यह शांति के लिए हमारी तड़प का प्रतीक था।'

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