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अमेरिका को ग्रीनलैंड पर कब्जा करने से रोक पाएगा यूरोप: हमला हुआ तो नाटो का क्या होगा, डेनमार्क की तैयारी कैसी?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 19 Jan 2026 06:28 PM IST
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सार

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका किस तरह की तैयारियां कर रहा है? ग्रीनलैंड के बचाव के लिए यूरोप ने किस तरह से कमर कसी है, उसकी ताकत कितनी है? अगर ग्रीनलैंड को लेकर टकराव की स्थिति पैदा होती है तो नाटो का क्या भविष्य हो सकता है? इसके अलावा विशेषज्ञ इस मुद्दे पर क्या कहते हैं? आइये जानते हैं...

US European Union over Greenland Crisis Europe EU France Germany UK Donald Trump Occupation readiness explain
यूरोपीय संघ ने ग्रीनलैंड को अमेरिकी कब्जे से बचाने के लिए कसी कमर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अमेरिका की तरफ से ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामकता लगातार बढ़ती जा रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को एलान किया कि ग्रीनलैंड पर कब्जे को लेकर उनके फैसले का समर्थन न करने वाले यूरोपीय देशों पर अमेरिका 1 फरवरी से 10 फीसदी टैरिफ लगाएगा। अगर यूरोपीय देश आगे भी ग्रीनलैंड को लेकर उनके निर्णय को नहीं मानते तो 1 जून से यह टैरिफ बढ़कर 25 फीसदी तक पहुंच सकता है। 
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रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका आने वाले समय में व्यापार और सैन्य ताकत का इस्तेमाल कर ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोशिशों को और तेज कर सकता है। अगर ट्रंप डेनमार्क शासित ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई की कोशिश करते हैं तो पश्चिमी देशों के सैन्य गठबंधन नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) में ही फूट पड़ सकती है।  
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका किस तरह की तैयारियां कर रहा है? ग्रीनलैंड के बचाव के लिए यूरोप ने किस तरह से कमर कसी है, उसकी ताकत कितनी है? अगर ग्रीनलैंड को लेकर टकराव की स्थिति पैदा होती है तो नाटो का क्या भविष्य हो सकता है? इसके अलावा विशेषज्ञ इस मुद्दे पर क्या कहते हैं? आइये जानते हैं...

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की तैयारियां क्या?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ग्रीनलैंड पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करने के लिए सैन्य, आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर तैयारी कर रहा है। हालिया दिनों में इसके कुछ संकेत भी मिले हैं। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो इस क्षेत्र को खरीदने की संभावनाओं पर यूरोपीय अधिकारियों के साथ चर्चा कर रहे हैं।

 ...और अब आर्थिक दबाव और टैरिफ
अमेरिकी राष्ट्रपति ने यूरोपीय संघ और नाटो से जुड़े सहयोगियों पर 10% से 25% तक टैरिफ लगाने की घोषणा की है। इसके जरिए वे सहयोगियों पर दबाव बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, ताकि वे अमेरिका के ग्रीनलैंड अधिग्रहण के दावों का विरोध न करें और शांतिपूर्ण ढंग से ग्रीनलैंड को अमेरिका को बेचने के लिए तैयार हो जाएं।
 

ग्रीनलैंड में अमेरिका कितना मजबूत?

ग्रीनलैंड में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी पहले से ही है। हालांकि, इसके बावजूद अमेरिका के किसी भी राष्ट्रपति ने ग्रीनलैंड पर सैन्य ताकत का इस्तेमाल करके अधिग्रहण की कोशिश नहीं की है।

1. सैन्य विकल्प और रणनीतिक बदलाव
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलीन लीविट ने साफ किया है कि ग्रीनलैंड पर सैन्य कब्जे का विचार अब भी विकल्पों में शामिल है। पेंटागन ने ग्रीनलैंड की जिम्मेदारी को अमेरिकी यूरोपीय कमान से हटाकर अमेरिकी उत्तरी कमान को सौंप दी है, जिसका मकसद अमेरिका और पश्चिमी गोलार्ध की रक्षा क्षमता को मजबूत करना है। 

2. मौजूदा बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल
अमेरिका के पास मौजूदा समय में ग्रीनलैंड में पिटुफिक स्पेस बेस है, जो मिसाइल चेतावनी और अंतरिक्ष निगरानी के लिए उपयोग किया जाता है। इसके अलावा अमेरिका के पास ग्रीनलैंड में 16 पुराने सैन्य बेस हैं, जिन्हें किसी भी समय फिर से सक्रिय किया जा सकता है। यानी ग्रीनलैंड में अमेरिका पहले से ही काफी ताकतवर है।


यह भी पढ़ें: Greenland: क्या ग्रीनलैंड विवाद के बीच ट्रंप की टैरिफ नीति से यूरोप-अमेरिका टकराव और गहराएगा? जानें पूरा मामला

ग्रीनलैंड को बचाने के लिए यूरोप की क्या तैयारी?

हालिया दिनों में ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दावों और सैन्य अधिग्रहण की धमकियों के जवाब में यूरोप ने सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक स्तरों पर तैयारी की है। नीदरलैंड के विदेश मंत्री डेविड वैन वील ने ट्रंप की रणनीति को सीधे तौर पर ब्लैकमेल करार दिया और कहा कि यह न तो नाटो गठबंधन के लिए अच्छा है और न ही ग्रीनलैंड के लिए। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीएर स्टार्मर ने स्पष्ट किया है कि सहयोगियों पर टैरिफ लगाना पूरी तरह गलत है और ग्रीनलैंड का भविष्य केवल वहां के निवासियों और डेनमार्क का आंतरिक विषय है। 

1. सैन्य तैनाती और प्रतीकात्मक प्रतिरोध: डेनमार्क की तरफ से अमेरिका के रवैये पर चिंता जताए जाने के बाद फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे और स्वीडन जैसे नाटो सहयोगी देशों ने ग्रीनलैंड में अपने सैनिक भेजना शुरू कर दिए हैं। फ्रांस ने अपनी पर्वतीय सैन्य टुकड़ी के 15 सैनिक और जर्मनी ने 13 सदस्यीय टोही दल को ग्रीनलैंड भेजा है। इस मिशन के जरिए ग्रीनलैंड में यूरोपीय संघ (ईयू) का झंडा फहराकर यूरोप यह दिखाने की कोशिश में है कि यूरोपीय सेनाएं जरूरत पड़ने पर अमेरिका से मुकाबले के लिए तैयार हैं।

दूसरी तरफ खुद डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने का एलान किया है, ताकि अमेरिका को यह साबित किया जा सके कि वह आर्कटिक की रक्षा करने के काबिल है। 2026 तक वहां नाटो की एक बड़ी और स्थायी मौजूदगी की योजना बनाई गई है। डेनमार्क के रक्षा मंत्री ट्रोल्स लुंड पॉल्सन ने कहा कि यह कदम यह साबित करने के लिए अनिवार्य है कि आर्कटिक की सुरक्षा केवल डेनमार्क की नहीं, बल्कि पूरे नाटो की जिम्मेदारी है।

वहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि यह मिशन यह दिखाने का एक तरीका है कि यूरोपीय सेनाएं जरूरत पड़ने पर तेजी से तैनात हो सकती हैं। 

2. ट्रंप के टैरिफ के जवाब में कार्यवाही: यूरोपीय संघ अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए अमेरिकी सामानों पर जवाबी आयात शुल्क लगाने की तैयारी कर रहा है। इसके अलावा अमेरिका के निर्यात का अहम हिस्सा बन चुके लॉबस्टर पर शून्य आयात शुल्क की सुविधा खत्म करने पर विचार कर रहा है।

बताया गया है कि यूरोपीय संघ अपने 2023 के 'एंटी-कोअर्जन इंस्ट्रूमेंट' के इस्तेमाल पर भी चर्चा कर रहा है। इसके तहत ईयू अपने ऊपर आर्थिक दबाव डालने वाले देशों पर टैरिफ, व्यापार प्रतिबंध और निवेश पर रोक लगा सकता है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने साझा बयान जारी कर डेनमार्क के साथ पूर्ण एकजुटता व्यक्त की है और चेतावनी दी कि टैरिफ से संबंधों में खतरनाक गिरावट आएगी। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ट्रेड बजूका को सक्रिय करने का आह्वान किया है, जिससे ईयू अमेरिका पर जवाबी टैरिफ और व्यापार प्रतिबंध लगा सके।

ये भी पढ़ें: Greenland: डेनमार्क के साथ यूरोपीय देशों ने एकजुटता जताई, जारी किया साझा बयान, ट्रंप की धमकियों पर क्या कहा?

3. अमेरिकी टेक कंपनियों पर नकेल: एक अन्य विकल्प के तौर पर यूरोपीय संघ गूगल, मेटा और एक्स जैसी अमेरिकी तकनीकी कंपनियों के यूरोपीय संचालन पर भारी जुर्माना या प्रतिबंध लगा सकता है और यूरोपीय बाजार पर अमेरिकी कंपनियों की पकड़ को खत्म करने जैसे कदम की तरफ बढ़ सकता है। 

4. कूटनीतिक और रणनीतिक तैयारी: डेनमार्क ने साफ किया है कि उसके शासन वाला ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है और अगर अमेरिका इसकी क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करता है, तो वह नाटो की धारा 5 को लागू कर सकता है, जो सामूहिक रक्षा की गारंटी देती है।

इस टकराव से नाटो पर कैसे पैदा हो सकता है खतरा?

विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को लेकर सैन्य स्तर पर कोई कदम उठाता है तो यह पश्चिमी देशों के रक्षा गठबंधन- नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) में फूट डालने वाला कदम साबित हो सकता है। दरअसल, अमेरिका का यह कदम नाटो के मूल संविधान के अनुच्छेद पांच का ही उल्लंघन होगा, जिसके तहत नाटो के किसी एक सदस्य देश पर हमला सभी देशों पर हमला माना जाएगा। ऐसे में अमेरिका की नाटो से जुड़े देश की जमीन पर कार्रवाई न सिर्फ यूरोप के खिलाफ कार्रवाई के तौर पर देखा जाएगा, बल्कि यह नाटो के चार्टर का भी उल्लंघन होगा। 



ग्रीनलैंड के सुरक्षा विशेषज्ञ प्रोफेसर ओस्थागेन ने एक मीडिया चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा, "हो सकता है आने वाले समय में अन्य देश इस स्थिति को देखते हुए अपने देश में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हटाने पर विचार करें, जिससे अमेरिका की वैश्विक सैन्य पहुंच कमजोर होगी। यह सीधे तौर पर रूस और चीन के लिए फायदेमंद होगा।"

ईयू की विदेश नीति प्रमुख काजा कल्लास ने चेतावनी दी कि सहयोगियों के बीच इस तरह की दरार से सिर्फ रूस और चीन को फायदा होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय नेताओं की ये प्रतिक्रियाएं अमेरिका के लिए सिर्फ एक सलाह के तौर पर हैं। 

अमेरिका की ओर से सहयोगी देशों को लेकर जो नीति बनाई जा रही है, उसका असर अब अमेरिका के पड़ोस में दिखने लगा है। हाल ही में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी जब चीन के दौरे पर गए तो उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अहम समझौतों का एलान किया। इनमें एक समझौता चीन की इलेक्ट्रिक कारों पर आयात शुल्क को कम करने का है। यानी बाकी पश्चिमी देश अमेरिका के रुख को देखते हुए अब चीन की ओर जा रहे हैं।
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