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Explainer: क्या ईरान-अमेरिका के बीच युद्ध फिर शुरू, एक हेलीकॉप्टर गिरने से कैसे शुरू हुआ संकट, अब आगे क्या?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 11 Jun 2026 12:27 PM IST
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सार

पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच हालात और गंभीर हो गए हैं। कुवैत, बहरीन और जॉर्डन ने सुरक्षा अलर्ट जारी किए हैं। इस बीच अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने दावा किया कि उसने ईरान के सैन्य निगरानी तंत्र, संचार नेटवर्क और वायु रक्षा ठिकानों पर आत्मरक्षा के तहत हमले किए हैं।

US Iran War Ceasefire in Limbo as Jordan Kuwait and Bahrain attacked amid Donald Trump anger Apache Helicopter
अमेरिका ईरान के बीच वार-पलटवार का नया दौर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर युद्ध की आहट से पूरी दुनिया में डर का माहौल है। 28 फरवरी को अमेरिका की तरफ से शुरू हुए युद्ध में 8 अप्रैल के बाद से ही युद्ध विराम लागू था। जून की शुरुआत में इस्राइल और ईरान के बीच लेबनान को लेकर संघर्ष छिड़ा था। हालांकि, इस पर भी डोनाल्ड ट्रंप के दखल के बाद रोक लग गई। लेकिन अब यह एक बार फिर अमेरिका और ईरान के बीच जंग शुरू होती दिख रही है। वह भी अमेरिका के एक निगरानी हेलीकॉप्टर- अपाचे को मार गिराए जाने के बाद।


ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका और ईरान के बीच आखिर स्थितियां इतनी तेजी से क्यों बिगड़ गई हैं? एक अपाचे हेलीकॉप्टर का गिरना कैसे दोनों देशों के बीच जारी युद्ध विराम को खतरे में डाल गया? बीते 24 घंटे के दौरान दोनों देशों ने कैसे वार-पलटवार किए और एक-दूसरे को कितना नुकसान पहुंचाया है? इन हमलों के बाद अब संघर्ष की आगे की क्या दिशा होगी? आइये जानते हैं...
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अमेरिका-ईरान के बीच स्थिति तेजी से क्यों बिगड़ीं?

अमेरिका और ईरान के बीच स्थिति तेजी से बिगड़ने की मुख्य वजह होर्मुज जलडमरूमध्य के करीब एक सैन्य घटना रही, जिसके बाद हुई जवाबी कार्रवाइयों से दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव और भड़क गया।

1. अमेरिकी हेलीकॉप्टर को ईरान ने मार गिराया

तनाव की शुरुआत तब हुई जब होर्मुज जलडमरूमध्य के पास गश्त कर रहा अमेरिकी सेना का एक एएच-64 अपाचे लड़ाकू हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। अमेरिकी अधिकारियों की जांच के मुताबिक, एक ईरानी ड्रोन हेलीकॉप्टर से टकराया था, जिसके कारण यह क्रैश हुआ। हालांकि यह स्पष्ट नहीं हो सका कि ईरान ने यह जानबूझकर किया था या नहीं। अमेरिका ने तुरंत ही अपने पायलटों को निकालने का अभियान शुरू कर दिया और उन्हें सफलतापूर्वक बाहर भी निकाल लिया। 
 

2. अमेरिका की जवाबी सैन्य कार्रवाई

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हेलीकॉप्टर को मार गिराने का आरोप लगाया और इसके जवाब में सैन्य हमलों का आदेश दिया। अमेरिकी सैन्य कमांड (सेंटकॉम) ने इसे आत्मरक्षा और आनुपातिक प्रतिक्रिया बताते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य के पास कई शहरों में बुनियादी और सैन्य ढांचों को नुकसान पहुंचाया।

3. और फिर ईरान का बड़ा पलटवार

अमेरिका के हमलों के कुछ ही घंटों बाद, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने आक्रामक प्रतिक्रिया दी। ईरान ने बहरीन और जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों से निशाना बनाया। 


दोनों देशों ने कैसे वार-पलटवार किए और एक-दूसरे को कितना नुकसान पहुंचाया?

1. अमेरिका के हमले और ईरान के नुकसान

- अमेरिका ने अपने अपाचे हेलीकॉप्टर को निशाना बनाए जाने के बाद ईरान पर हमले को अपनी आत्मरक्षा और प्रतिक्रिया का अधिकार बताया। इसके बाद अमेरिका ने अपनी वायुसेना और नौसेना के लड़ाकू विमानों के जरिए सटीक हथियारों से ईरान पर हमले किए।
- अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित जस्क, सिरिक, मिनाब, केशम द्वीप और बंदर अब्बास में ईरानी वायु रक्षा प्रणालियों, ग्राउंड कंट्रोल स्टेशनों, सर्विलांस रडार केंद्रों और संचार सुविधाओं को निशाना बनाया। 
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क्या हुआ नुकसान?: ईरानी अधिकारियों और ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन हमलों में सिरिक में एक टेलीकम्युनिकेशन टावर क्षतिग्रस्त हो गया और बेमानी जिले में पानी के दो टैंक नष्ट हो गए। ईरान ने यह भी बताया कि इन हमलों में पानी की सुविधाओं सहित नागरिक बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचा है।

2. ईरान का पलटवार और अमेरिका का नुकसान

  • अमेरिकी हमलों के कुछ ही घंटों बाद, ईरान की आईआरजीसी ने ड्रोन और लंबी दूरी की ठोस-ईंधन वाली मिसाइलों का इस्तेमाल करते हुए बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई की।
  • ईरान ने दावा किया कि उसने इस अभियान के तहत पूरे क्षेत्र में कुल 21 अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इनमें बहरीन में स्थित अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े (फिफ्थ फ्लीट) का नौसेना मुख्यालय और जॉर्डन में एक अमेरिकी वायुसेना बेस शामिल थे। कुवैत की ओर भी हवाई हमले किए गए।

क्या हुआ नुकसान: आईआरजीसी ने दावा किया कि उसने जॉर्डन के सैन्य बेस पर एफ-35 फाइटर जेट के हैंगर और एक कमांड-एंड-कंट्रोल सेंटर सहित चार अहम ठिकानों पर सफलतापूर्वक हमला बोला। इसके साथ ही, ईरान ने एक अमेरिकी एमक्यू-9 रीपर ड्रोन को भी मार गिराने का दावा किया। हालांकि, ईरान के इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी। रक्षात्मक कार्रवाई करते हुए जॉर्डन की सेना ने ईरान की तरफ से दागी गई पांच मिसाइलों को बीच में ही नष्ट कर दिया और कुवैत के सशस्त्र बलों ने भी शत्रुतापूर्ण हवाई लक्ष्यों को रोकने की जानकारी दी। 

इन हमलों के बाद अब संघर्ष की आगे की क्या दिशा होगी?

1. बिना पूर्ण युद्ध के कूटनीतिक दबाव 

विशेषज्ञों का मानना है कि इन हमलों के बावजूद, दोनों में से कोई भी पक्ष पूर्ण पैमाने पर युद्ध की ओर नहीं लौटना चाहता है। इसके बजाय, अमेरिका और ईरान दोनों ही अप्रैल में हुए कमजोर युद्धविराम की सीमाओं को परख रहे हैं। दोनों देश भविष्य की शांति वार्ता में अपना पलड़ा भारी करने के लिए निरोधक के रूप में सीमित सैन्य बल का उपयोग कर रहे हैं। 

सेवानिवृत्त अमेरिकी जनरल और पूर्व सहायक विदेश मंत्री मार्क किमिट के मुताबिक, अमेरिका को यह दिखाना जरूरी था कि अमेरिकी हेलीकॉप्टर को गिराए जाने की घटना स्वीकार नहीं की जाएगी और इसलिए जवाबी कार्रवाई जरूरी थी। भविष्य की संभावनाओं पर उन्होंने कहा, "मुझे इस बिंदु पर बहुत हैरानी होगी यदि यह स्थिति और बिगड़ती है, और मैं निश्चित रूप से उम्मीद कर रहा हूं कि यह तनाव कम होने का संकेत दे रहा है, ताकि हम कूटनीति की ओर वापस लौट सकें।"

2. ईरान का नया समीकरण

विश्लेषकों के मुताबिक, ईरान का नया नेतृत्व अब रणनीतिक धैर्य की अपनी पुरानी नीति को छोड़कर ज्यादा जोखिम उठाने को तैयार है। ईरान यह स्पष्ट करना चाहता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य या उसकी सीमाओं के पास किसी भी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का जवाब केवल उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैले अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमलों के रूप में दिया जाएगा। इसका मकसद भविष्य में अमेरिकी गश्त या सैन्य कार्रवाइयों की कीमत को इतना बढ़ा देना है कि अमेरिका ऐसा करने से बचे। 

वहीं, क्विंसी इंस्टीट्यूट फॉर रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ्ट के कार्यकारी उपाध्यक्ष त्रिता पारसी ने ईरान के आक्रामक रुख को स्पष्ट करते हुए कहा, "ईरानी यह स्पष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं कि उन पर किसी भी हमले का जवाब दिया जाएगा, चाहे उसका आकार और दायरा कुछ भी हो।" इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा, "दशकों में यह पहली बार है जब किसी क्षेत्रीय शक्ति के पास इस्राइली सैन्य युद्धाभ्यास या किसी तीसरे पक्ष के खिलाफ आक्रामकता के विरुद्ध हार्ड पावर का इस्तेमाल करने के साधन, क्षमता और इच्छाशक्ति है।"


3. कई और देशों-क्षेत्रों तक फैल सकता है संघर्ष

अगर कूटनीति नाकाम होती है, तो ईरान ने चेतावनी दी है कि वह युद्ध को फारस की खाड़ी से आगे बढ़ा सकता है। इसमें हिंद महासागर से लेकर लाल सागर और भूमध्य सागर तक फैले अहम शिपिंग मार्गों को खतरे में डालना शामिल हो सकता है।

इस्राइली सैन्य खुफिया विभाग में ईरान शाखा के पूर्व प्रमुख डैनी सिट्रिनोविट्ज ने अपने विश्लेषण में कहा, "तेहरान एक नया समीकरण बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसका मकसद इस्राइल को न सिर्फ ईरान, बल्कि क्षेत्र में उसके प्रॉक्सी नेटवर्क के खिलाफ भी कार्रवाई करने से रोक सके।"

4. कूटनीतिक गतिरोध और धमकियों का दौर

दोनों देशों के बीच बयानबाजी और तीखी हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि ईरान ने समझौता करने में बहुत देर कर दी है और अब उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। दूसरी ओर, ईरान ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि वह अपने विरोधाभासी संदेशों और युद्धविराम के बार-बार उल्लंघन से कूटनीतिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा रहा है।

5. अमेरिका-इस्राइल गठबंधन की परीक्षा

ईरान इस संघर्ष का इस्तेमाल अमेरिका और इस्राइल के बीच उभरते मतभेदों का फायदा उठाने के लिए कर रहा है। ईरान ने हाल ही में इस्राइल पर जो हमले किए, उनका एक मकसद यह भी था कि अमेरिका को इस्राइल की सैन्य कार्रवाइयों का समर्थन करने या ईरान के साथ कूटनीतिक रास्ता खुला रखने में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर किया जा सके। ट्रंप ने तनाव कम करने के लिए इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू को जवाबी कार्रवाई न करने तक के लिए कहा है। इसे ईरान के लिए एक नई कूटनीतिक बढ़त माना जा रहा है।

अमेरिका के पश्चिम एशिया मामलों की पूर्व शांति वार्ताकार एरॉन डेविड मिलर के मुताबिक, ईरानियों ने अब इस्राइल और अमेरिका दोनों को मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। वे जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं। उन्हें लगता है कि वे जीत रहे हैं। उन्हें नहीं लगता कि युद्धविराम उनके हितों की पूर्ति कर रहा है।" उन्होंने कहा कि ट्रंप का नेतन्याहू पर जवाबी हमला न करने का दबाव बनाना, ईरान के लिए एक नए कूटनीतिक लाभ के रूप में काम कर रहा है जो एक नए मानदंड का निर्माण करेगा।
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