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ट्रंप के लिए महंगी साबित होगी जंग: अमेरिका ने अब तक 20 अरब डॉलर फूंके, 17% फीसदी तक बढ़ गईं तेल की कीमतें
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: Kirtivardhan Mishra
Updated Thu, 12 Mar 2026 08:31 PM IST
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सार
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पश्चिम एशिया युद्ध से अमेरिका का लगातार बढ़ रहा 'खर्च'।
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अमर उजाला
विस्तार
अमेरिका और इस्राइल की तरफ से ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध का फिलहाल कोई अंत नजर नहीं आ रहा है। दोनों ही पक्षों में कोई भी फिलहाल झुकने को तैयार नहीं है। जहां अमेरिका-इस्राइल ने इस युद्ध में ईरान की सैन्य क्षमता को पूरी तरह नेस्तनाबूत करने की बात कही है, वहीं ईरान ने भी अब होर्मुज जलडमरूमध्य बंद कर के ऊर्जा संकट पैदा कर दिया है। इसका असर सिर्फ पूरी दुनिया पर दिखने लगा है। वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की कीमतें बढ़ गई हैं। पहले माना जा रहा था कि इस संघर्ष से अमेरिका को कोई खास नुकसान नहीं होगा। हालांकि, युद्ध के लंबा खिंचने के साथ अब अमेरिका के लिए भी मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आलम यह है कि व्हाइट हाउस इस संघर्ष से बाहर निकलने के लिए अब मौका ढूंढ रहा है।ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से दुनिया में तेल-गैस की कीमतें किस हद तक बढ़ गई हैं? कौन से देश इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं? अमेरिका कैसे इस संघर्ष में जीत हासिल करने का सपना देखते-देखते नुकसान की स्थिति में आ रहा है? इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की क्या भूमिका है? आइये जानते हैं...
कौन से देश इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं?
पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बाधित कर दिया है। इसका सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर पड़ा है, क्योंकि वे इस मार्ग से होने वाले तेल और गैस आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं। हालांकि, भारत ने अपनी स्थिति को काफी हद तक संभाला है और रूस से कच्चे तेल की खरीद को तत्काल बढ़ाते हुए पेट्रोल-डीजल की कीमतों को बढ़ने से रोका है।दक्षिण एशियाई देश: सीमित वित्तीय बफर और कम रणनीतिक भंडार के कारण ये देश बहुत बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। ईंधन की खपत को कम करने के लिए इन देशों को स्कूल और विश्वविद्यालय बंद करने पड़े हैं। पाकिस्तान ने सरकारी कार्यालयों में चार-दिवसीय कार्य सप्ताह और 50% कर्मचारियों के लिए वर्क-फ्रॉम-होम नीति भी लागू की है।
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जापान और दक्षिण कोरिया: ये दोनों देश संकट के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं, क्योंकि जापान अपने तेल का 95% और दक्षिण कोरिया 70% खाड़ी देशों से आयात करता है। इसके जवाब में दक्षिण कोरिया ने 30 वर्षों में पहली बार पेट्रोल और डीजल पर अधिकतम मूल्य सीमा लागू की है और जापान ने अपने रणनीतिक भंडार का उपयोग करने की तैयारी की है।
भारत: गैस और कच्चे तेल के लिए पश्चिम एशिया पर काफी निर्भर है। हालांकि, सरकारी नियंत्रण के कारण भारत में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें काफी हद तक स्थिर रही हैं, हालांकि तेल कंपनियां इस स्थिति से निपटने के लिए रूस से तेल की खरीद बढ़ा रही हैं । इसके अलावा, भारत में घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) और कमर्शियल सिलिंडरों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है, जिससे घबराहट में मांग बढ़ने के कारण सिलिंडरों की कमी और डिलीवरी में तीन से पांच दिन तक की देरी की समस्या पैदा हो गई है।
भारत: गैस और कच्चे तेल के लिए पश्चिम एशिया पर काफी निर्भर है। हालांकि, सरकारी नियंत्रण के कारण भारत में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें काफी हद तक स्थिर रही हैं, हालांकि तेल कंपनियां इस स्थिति से निपटने के लिए रूस से तेल की खरीद बढ़ा रही हैं । इसके अलावा, भारत में घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) और कमर्शियल सिलिंडरों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है, जिससे घबराहट में मांग बढ़ने के कारण सिलिंडरों की कमी और डिलीवरी में तीन से पांच दिन तक की देरी की समस्या पैदा हो गई है।
चीन: होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कच्चे तेल का दुनिया में सबसे बड़ा खरीदार चीन है। लेकिन, अपने विशाल रणनीतिक तेल भंडार (लगभग 1.2 अरब बैरल या 3 से 4 महीने के रिजर्व) के कारण वह इस ऊर्जा संकट का सामना करने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में है।
अन्य देश: पश्चिमी देशों में भी होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने का असर दिखा है। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में 17 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और यूरोपीय देश (जैसे जर्मनी, ब्रिटेन) भारी करों के कारण दुनिया में सबसे अधिक खुदरा महंगाई का सामना कर रहे हैं।
अन्य देश: पश्चिमी देशों में भी होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने का असर दिखा है। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में 17 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और यूरोपीय देश (जैसे जर्मनी, ब्रिटेन) भारी करों के कारण दुनिया में सबसे अधिक खुदरा महंगाई का सामना कर रहे हैं।
तो इस संघर्ष से अमेरिका को कैसे नुकसान हो रहा?
पश्चिम एशिया में चल रहे इस संघर्ष के कारण अमेरिका को सैन्य, आर्थिक और औद्योगिक मोर्चों पर कई बड़े नुकसान झेलने पड़ रहे हैं।
1. भारी सैन्य खर्च, जवानों का नुकसान
युद्ध के पहले सप्ताह में ही अमेरिका को सैन्य अभियानों पर लगभग 11.3 अरब डॉलर (करीब 1.04 लाख करोड़ रुपये) का भारी-भरकम खर्च उठाना पड़ा है। इसके साथ ही, मिसाइल और ड्रोन हमलों का लगातार बचाव करने के कारण अमेरिकी नौसेना के जहाजों और उनके कर्मियों को भारी मानसिक और शारीरिक थकान का सामना करना पड़ रहा है।दूसरी तरफ ईरान हमले के दौरान सात अमेरिकी सैनिकों की मौत की अब तक पुष्टि हो चुकी है, जबकि ईरान का दावा है कि उसने 500 से ज्यादा अमेरिकी सैनिकों को मार गिराया है। खुद अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से रॉयटर्स ने दावा किया है कि ईरान की ओर से अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमले में 150 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक गंभीर रूप से घायल हुए हैं। हालांकि, अमेरिकी सरकार इससे जुड़े आंकड़े जारी करने से लगातार बच रही है।
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2. पेट्रोल की कीमतों में भारी उछाल
अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में लगभग 21 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। तेल का राष्ट्रीय औसत जो फरवरी में 2.94 डॉलर प्रति गैलन था, वह अब बढ़कर 3.58 डॉलर हो गया है। कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में यह कीमत पांच डॉलर प्रति गैलन को भी पार कर गई है। इससे प्रति लीटर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़ा असर आया है।3. रणनीतिक तेल भंडार में कमी
तेल बाजार को स्थिर करने की मजबूरी में अमेरिका को अपने आपातकालीन 'स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व' यानी रणनीतिक तेल भंडार से 17.2 करोड़ बैरल तेल निकालने के आदेश देने पड़े हैं।4. कृषि और खाद्य महंगाई का खतरा
होर्मुज जलडमरूमध्य से उर्वरक (फर्टिलाइजर) का व्यापार बाधित होने से अमेरिका के न्यू ऑरलियन्स हब में यूरिया की कीमत 475 डॉलर से बढ़कर 680 डॉलर प्रति मीट्रिक टन हो गई है। इसका सीधा असर पश्चिम एशिया में सोयाबीन और मकई की बुवाई पर पड़ सकता है, जिससे आने वाले समय में देश में खाद्य महंगाई की समस्या पैदा होने का गंभीर खतरा है।5. विनिर्माण सेक्टर पर प्रभाव
पश्चिम एशिया से एल्यूमीनियम जैसी धातुओं की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण इनकी कीमतें बढ़ रही हैं। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका के ऑटोमोटिव (वाहन निर्माण), एयरोस्पेस (विमानन) और कंस्ट्रक्शन (निर्माण) उद्योगों के लिए कच्चे माल की लागत बढ़ने की आशंका है।6. प्राकृतिक गैस की कीमतों में वृद्धि
भले ही अमेरिका ने अपना घरेलू प्राकृतिक गैस उत्पादन काफी बढाया है, इसके बावजूद संघर्ष के असर से अमेरिकी गैस बेंचमार्क- हेनरी हब की कीमतों में महीने भर में 13% की बढ़ोतरी (लगभग 3.26 डॉलर प्रति MMBtu) दर्ज हुई है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि ऊर्जा संकट की वजह से अमेरिकी गैस की खरीदारी बढ़ी है और मांग और आपूर्ति में गहरा अंतर पैदा हो गया है। इसके चलते गैस की कीमतें अमेरिकी जनता के लिए भी उच्च स्तर पर पहुंच चुकी हैं।...और अब होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने का भी दिखने लगा असर
अमेरिका की तरफ से ईरान से तेल या गैस का आयात नहीं किया जाता है, इसके बावजूद क्षेत्र में अमेरिकी हितों को खासा नुकसान पहुंचा है। दरअसल, ईरान की तरफ से होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने की वजह से यहां से तेल टैंकरों के गुजरने की संख्या में भी काफी गिरावट आई है। इसका सबसे बुरा असर अमेरिका के सहयोगी देशों पर पड़ा है। जिन देशों को होर्मुज बंद होने से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, उनमें दक्षिण कोरिया से लेकर थाईलैंड और सिंगापुर से कंबोडिया तक के नाम शामिल हैं। यहां तक कि यूरोपीय देशों और ब्रिटेन की तेल-गैस की सप्लाई में भी जबरदस्त गिरावट आई है।
ब्लूमबर्ग के शिप ट्रैकिंग डाटा के मुताबिक, 10 मार्च को होर्मुज से महज आठ वाणिज्यिक जहाजों का ही आना-जाना हुआ, जबकि बुधवार को यह संख्या गिरकर चार पर आ गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरानी हमलों के डर को देखते हुए अधिकतर जहाज अपना ट्रांसपॉन्डर बंद कर लेते हैं, ताकि सैटेलाइट और रेडियो सिग्नल पर उनकी उपस्थिति दर्ज न हो और वे बच निकलें। ऐसे में होर्मुज आने-जाने वाले जहाजों का सही डाटा मिलना मुश्किल है। हालांकि, अब तक जितने जहाज होर्मुज से निकल रहे हैं उनमें अधिकतर चीनी मूल के हैं।
होर्मुज के बंद होने और ईरान के हमलों से अमेरिका पर क्या असर?
गौरतलब है कि होर्मुज जलडमरूमध्य तेल सप्लाई के लिए एक बड़ा चोक पॉइंट है। दरअसल, खाड़ी देशों की लगभग पूरी तेल सप्लाई इसी क्षेत्र से होती है। हालांकि, जब टैंकर यहां एक संकरे मुहाने से निकलते हैं तो वे ईरान की सीमा के काफी करीब होते हैं। यह क्षेत्र महज 24 मील (करीब 39 किलोमीटर) ही चौड़ा है और ईरान के खतरनाक हथियारों की जद में आता है।हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एलान किया था कि अगर जरूरत पड़ी तो अमेरिकी सेना होर्मुज क्षेत्र से जहाजों के गुजरने में मदद करेगी। हालांकि, अमेरिकी नौसैन्य अधिकारियों और विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका को इस क्षेत्र में बड़ा खतरा हो सकता है। एक अमेरिकी सैन्य अधिकारी ने चेतावनी दी है कि अगर जहाज इस जलमार्ग से गुजरने की कोशिश करते हैं, तो यह संकरा क्षेत्र ईरान के लिए एक किल बॉक्स बन सकता है। वहीं, एक पूर्व फ्रांसीसी नौसेना अधिकारी ने मौजूदा हालात में वहां युद्धपोत भेजने को आत्मघाती करार दिया है।
1. समुद्री खदानों का खतरा
ईरान के पास समुद्री विस्फोटक खदानों का भारी भंडार है। समुद्री तट के बहुत करीब होने के कारण ईरान के लिए पानी में खदानें बिछाना बेहद आसान है, जो अमेरिकी युद्धपोतों के लिए एक अदृश्य और सबसे खतरनाक खतरा है। बीते कुछ दिनों में अमेरिका ने ऐसी समुद्री खदानें बिछाने वाले कुछ ईरानी जहाजों को मार गिराने का दावा किया है। हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि ईरान यह काम छोटी नावों के जरिए भी कर सकता है।2. छोटे बेड़ों से अचानक हमलों का जोखिम
ईरान के पास छोटी और तेज हमलावर नावों का एक बेड़ा है। हालांकि, अमेरिका ने कुछ को नष्ट कर दिया है, लेकिन अभी भी कई नावें बची हैं जो अचानक कहीं से भी आकर रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड (आरपीजी), बम और मिसाइलों से बड़े जहाजों पर खतरनाक हमला कर सकती हैं।3. कानूनी और रणनीतिक जोखिम
समुद्री कानून के जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिकी युद्धपोत वाणिज्यिक जहाजों को एस्कॉर्ट (सुरक्षा) करते हुए ले जाते हैं, तो वे वाणिज्यिक जहाज भी ईरान के लिए वैध सैन्य लक्ष्य बन जाएंगे। इसके अलावा होर्मुज में एक टैंकर को सुरक्षित निकालने के लिए कम से कम दो अमेरिकी युद्धपोतों की आवश्यकता होगी। इतनी बड़ी संख्या में जहाजों को एस्कॉर्ट करने के लिए अमेरिका को अपने उन युद्धपोतों को वहां लगाना पड़ेगा जो वर्तमान में मिसाइल रक्षा और आक्रामक अभियानों में व्यस्त हैं। यह अमेरिका के युद्धपोतों और क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी खतरनाक होगा।विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज में अमेरिकी एस्कॉर्ट ऑपरेशन लाल सागर में यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ किए गए ऑपरेशन की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। उनका मानना है कि ईरान की सैन्य क्षमता हूतियों से कहीं बेहतर है। हूतियों ने ही अमेरिकी बलों पर इतना भारी दबाव डाल दिया था कि भ्रम की स्थिति में एक अमेरिकी विध्वंसक ने अपने ही एक जेट को मार गिराया था।
4. अमेरिकी युद्धक बेड़े की तेल सप्लाई पर खतरा
अमेरिका का एक बड़ा युद्ध बेड़ा इस वक्त ईरान के पास ही तैनात है। इस युद्धक बेड़े में एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन और कई युद्धपोत शामिल हैं। चूंकि यूएसएस अब्राहम लिंकन एक परमाणु ऊर्जा आधारित एयरक्राफ्ट कैरियर है, इसलिए इसे क्षेत्र में तैनाती के लिए तेल की जरूरत नहीं पड़ती, हालांकि अमेरिका के कुछ अन्य पोत जिनमें बड़े युद्धपोत भी शामिल हैं, उन्हें लगातार काम करने के लिए तेल की जरूरत पड़ती है।अमेरिकी युद्धपोत आमतौर पर अपनी इन जरूरतों को अपने साथ चलने वाले लॉजिस्टिक्स बेड़े के जरिए पूरा करते हैं। इसे मिलिट्री सीलिफ्ट कमांड (एमएससी) कहा जाता है। यूएसएनएस जैसे विशेष रिफ्यूलर और ऑयलर जहाज समुद्र के बीच में ही युद्धपोतों को ईंधन (प्रोपल्शन और जेट फ्यूल) की सप्लाई करते हैं। इससे युद्धपोतों को बिना किसी बंदरगाह पर रुके हफ्तों तक तैनात रहने की सुविधा मिलती है। यह रिफ्यूलर-ऑयलर दर्जनों की संख्या में रहते हैं और इन्हें रोटेशन के आधार पर भी बेड़े के साथ लगाया जा सकता है। ऐसे में मौजूदा समय में अमेरिकी युद्धक बेड़े के लिए तेल सप्लाई का बड़ा खतरा पैदा नहीं हुआ है।
हालांकि, इस क्षेत्र में शांति के दौर में जब भी अमेरिकी सेना को तेल या गैस की जरूरत पड़ी है तो उसके लिए आपूर्ति का जरिया बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेडे़ का हेडक्वार्टर, कुवैत का कैंप आरिफजान, कतर का अल उदैद और यूएई का अल धफरा एयरबेस रहा है। चूंकि इन सभी देशों से तेल की सप्लाई का एकमात्र जरिया होर्मुज जलडमरूमध्य है, इसलिए अमेरिका के लिए युद्ध शांत होने के बाद भी इन ठिकानों से भी युद्धपोतों के लिए तेल-गैस जुटाना आसान नहीं होगा।
ईरान ने समुद्री मार्गों पर कितने हमले किए?
ईरान की ओर से अब तक होर्मुज जलडमरूमध्य में किए गए हमलों की कोई एक निश्चित कुल संख्या नहीं सामने आई है, लेकिन हाल के दिनों में कुछ खास जहाजों और टैंकरों पर हमले की बात सामने आई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, बुधवार (11 मार्च) को इस क्षेत्र में कम से कम पांच कार्गो जहाजों को निशाना बनाया गया।- ओमान के उत्तर में एक फंसे हुए कंटेनर जहाज की मदद करने की कोशिश कर रही यूएई के झंडे वाली एक टगबोट पर दो मिसाइलें दागी गईं, जिससे कम से कम 4 नाविकों की मौत हो गई। हालांकि, खुद ईरान ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है।
- ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने दावा किया है कि उसने 'लुईस पी' नाम के एक मार्शल द्वीप के झंडे वाले टैंकर पर हमला किया है, जिसे वह अमेरिका से जुड़ा हुआ मानता है। यानी क्षेत्र में अमेरिकी तेल टैंकरों को भी निशाना बनाया जा रहा है।
- 'स्काईलाइट' नाम के तेल टैंकर पर एक प्रोजेक्टाइल से हमला किया गया, जिसमें चालक दल के दो सदस्यों की जान चली गई। ईरान ने इस पर भी हमले की बात खुले तौर पर नहीं स्वीकारी है।
बुधवार देर रात खबरें आईं कि ईरान की तरफ से इराक और यूएई तट के पास हमले किए गए हैं। यूके मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (यूकेएमटीओ) के मुताबिक, हाल ही में इराक के तट पर दो टैंकरों को अज्ञात प्रोजेक्टाइल से मारा गया। इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात के तट पर भी एक कंटेनर जहाज पर हमला हुआ। इन लगातार हमलों और इस मार्ग का उपयोग करने वाले किसी भी जहाज को आग लगाने की ईरान की धमकियों के कारण, सैकड़ों टैंकर जहां-तहां फंसे हैं।
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