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कुछ तो होने वाला है: ईरान में शांतिवार्ता के बीच पश्चिम एशिया में US बढ़ा रहा ताकत, ट्रंप का क्या है प्लान?

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: Riya Dubey Updated Sat, 11 Apr 2026 10:49 AM IST
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सार

इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान शांति वार्ता से पहले अमेरिका पश्चिम एशिया में तेजी से सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। 50,000 से ज्यादा सैनिक, फाइटर जेट्स और युद्धपोत तैनात किए जा रहे हैं। वहीं ईरान बातचीत को तैयार है, लेकिन उसने लेबनान में युद्धविराम की शर्त रखी है। 

What does Trump want?: Is America playing tricks under the guise of a ceasefire? Thousands of troops have been
क्या पश्चिम एशिया में बढ़ सकता है तनाव - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली अहम शांति वार्ता से पहले वैश्विक तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। इस्लामाबाद में प्रस्तावित इन बातचीतों से पहले अमेरिका एक तरफ कूटनीतिक प्रयासों को तेज कर रहा है, तो दूसरी ओर पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी भी तेजी से बढ़ा रहा है।

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अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पाकिस्तान की यात्रा पर जा रहे हैं, जहां वे ईरान के साथ महत्वपूर्ण वार्ता में हिस्सा लेंगे। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब क्षेत्र में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और किसी भी छोटे घटनाक्रम से बड़ा संघर्ष भड़कने की आशंका बनी हुई है।

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पश्चिम एशिया में बढ़ रहा अमेरिकी सैन्य जमावड़ा 

वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी फाइटर जेट्स और अटैक एयरक्राफ्ट पहले ही क्षेत्र में पहुंच चुके हैं। इसके अलावा अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के 1,500 से 2,000 सैनिकों की तैनाती आने वाले दिनों में की जाएगी।


समुद्री मोर्चे पर भी बड़े स्तर पर हलचल देखी जा रही है। यूएसएस जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश कैरियर स्ट्राइक ग्रुप अटलांटिक महासागर पार कर रहा है, जबकि यूएसएस बॉक्सर एम्फीबियस ग्रुप और 11वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट प्रशांत क्षेत्र से खाड़ी की ओर बढ़ रहे हैं। इन सभी के एक हफ्ते से अधिक समय में पहुंचने की संभावना है।

अमेरिकी सैनिकों की संख्या कितनी बढ़ी?

इन तैनातियों के साथ पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़कर 50,000 के पार पहुंच गई है, जो सामान्यतः करीब 40,000 रहती है। इसके अलावा पहले से ही करीब 2,500 मरीन और 2,500 नौसैनिक क्षेत्र में मौजूद हैं। इन बलों का इस्तेमाल जमीनी अभियानों में भी किया जा सकता है, जिसमें ईरान के रणनीतिक ठिकानों जैसे उसके प्रमुख तेल निर्यात केंद्र खार्ग द्वीप को निशाना बनाने की संभावना भी शामिल है।

दबाव में शुरू हो रही वार्ता

दूसरी ओर ईरान ने भी वार्ता के लिए अपनी तैयारी दिखा दी है। संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची के नेतृत्व में एक वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच चुका है। हालांकि, तेहरान ने बातचीत के लिए शर्तें भी रखी हैं।

ईरान का कहना है कि औपचारिक वार्ता से पहले लेबनान में युद्धविराम लागू होना चाहिए। गालिबाफ ने कहा कि ईरान सद्भावना के साथ बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन उसे अमेरिका पर भरोसा नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह वार्ता धोखे का दिखावा साबित होती है, तो तेहरान जवाबी कदम उठाएगा।

ट्रंप का सख्त संकेत- बात नहीं बनी तो कार्रवाई

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी साफ कर दिया है कि अगर कूटनीति विफल होती है तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प खुला है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी युद्धपोत तैयार हैं और जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल किया जा सकता है। ट्रंप के मुताबिक, 24 घंटे के भीतर बातचीत की दिशा स्पष्ट हो सकती है।

दोहरी रणनीति- बातचीत भी, तैयारी भी

पूरे घटनाक्रम से यह साफ है कि अमेरिका एक दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है, एक ओर वार्ता के जरिए समाधान की कोशिश, और दूसरी ओर सैन्य ताकत के जरिए दबाव बनाना। यह रणनीति जहां अमेरिका की बातचीत की स्थिति को मजबूत कर सकती है, वहीं यह संकेत भी देती है कि वार्ता विफल होने की स्थिति में टकराव की पूरी तैयारी है।

होरमुज जलडमरूमध्य पर बड़ी चिंता

इस पूरे संकट के बीच होरमुज जलडमरूमध्य सबसे अहम बिंदु बना हुआ है। दुनिया की करीब 20% तेल आपूर्ति इसी रास्ते से गुजरती है, जो मौजूदा हमलों और तनाव के कारण प्रभावित हो रही है। करीब छह हफ्तों से जारी इस संघर्ष ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को झटका दिया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ईंधन कीमतों पर भी असर डाला है। हालांकि, सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि 50,000 सैनिक किसी बड़े जमीनी युद्ध के लिए पर्याप्त नहीं हैं। ईरान का विशाल भूभाग और बड़ी आबादी किसी भी संभावित सैन्य अभियान को बेहद जटिल बना देती है।

अब सबकी नजर इस्लामाबाद में शुरू होने वाली वार्ता पर टिकी है। यह बातचीत तय करेगी कि पश्चिम एशिया कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ेगा या फिर एक बड़े संघर्ष की ओर।


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