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Explainer: क्या चीन किम की परमाणु योजना के साथ? सात साल बाद उत्तर कोरिया पहुंचे जिनपिंग, ट्रंप को क्या संदेश?

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, प्योंगयांग Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Mon, 08 Jun 2026 01:40 PM IST
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सार

Jinping Visit North Korea: चीन के राष्ट्रपति सात साल बाद उत्तर कोरिया पहुंचे। यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब ट्रंप हाल ही में चीन गए थे और उत्तर कोरिया लगातार अपने परमाणु कार्यक्रम को मजबूत कर रहा है।  ऐसे में आइए, विस्तार से जानते हैं जिनपिंग के इस दौरे के क्या मायने हैं। ये अमेरिका को चुनौती है या फिर जिनपिंग ट्रंप का ही कोई संदेश लेकर उत्तर कोरिया पहुंचे हैं... साथ ही ये भी समझेंगे कि उत्तर कोरिया के परमाणु शक्ति बनने पर अमेरिका को क्या नुकसान हो सकते हैं वहीं, चीन इस कार्यक्रम को जारी रखने पर चीन को क्या फायदा मिलेगा?

Xi Jinping visits North Korea after seven years worlds eyes on meeting will China back Kims nuclear plan
सात साल बाद चीन के दौरे पर जिनपिंग - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

ट्रंप का संदेश लेकर गए या ट्रंप को चुनौती देने गए... दरअसल कुछ हफ्ते पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप चीन के दौरे पर गए थे। इसके तीन हफ्ते बाद ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सीधे उत्तर कोरिया पहुंच गए। अब दुनिया भर में यही सवाल उठ रहा है कि क्या जिनपिंग, ट्रंप का कोई संदेश लेकर किम जोंग उन के पास पहुंचे हैं या फिर चीन और उत्तर कोरिया मिलकर अमेरिका को परमाणु ताकत के मुद्दे पर खुली चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं।


प्योंगयांग में हुई यह मुलाकात सिर्फ दो देशों की दोस्ती नहीं, बल्कि दुनिया की बदलती ताकतों का बड़ा संकेत मानी जा रही है। ऐसे में आइए, विस्तार से जानते हैं जिनपिंग के इस दौरे के क्या मायने हैं। साथ ही ये भी समझेंगे की आखिर रूस, चीन और उत्तर कोरिया के मिलने से अमेरिका की टेंशन क्यों बढ़ेंगी। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सोमवार को दो दिन के दौरे पर उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग पहुंचे। एयरपोर्ट पर उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन और उनकी पत्नी री सोल जू ने उनका स्वागत किया। दोनों नेताओं ने हाथ मिलाया और पुराने रिश्तों को और मजबूत करने का भरोसा दिया।
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उत्तर कोरिया लगातार अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है। वहीं, चीन और अमेरिका के बीच भी तनाव लगातार बढ़ रहा है। ट्रंप के दौरा करने के बाद भी रिश्तों में कुछ खास सुधार नहीं हुआ। इतना ही नहीं, ट्रंप की मौजूदगी में चीन ने तो यह भी कह दिया था कि वो ताइवान पर वो किसी का दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हाल ही में ट्रंप के अलावा रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी चीन पहुंचे थे। इसके बाद जिनपिंग का उत्तर कोरिया जाना वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत दे रहा है।
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आखिर उत्तर कोरिया चीन के लिए इतना अहम क्यों?

  • उत्तर कोरिया लंबे समय से चीन का करीबी सहयोगी रहा है। चीन उसकी सबसे बड़ी आर्थिक मदद करता है। खाने-पीने का सामान, ईंधन और व्यापार का बड़ा हिस्सा चीन से ही आता है। माना जाता है कि चीन नहीं चाहता कि उत्तर कोरिया पूरी तरह रूस के प्रभाव में चला जाए। इसलिए जिनपिंग का यह दौरा बेहद अहम माना जा रहा।
  • शी जिनपिंग ने उत्तर कोरिया के सरकारी अखबार में लिखे लेख में कहा कि दोनों देशों को रणनीतिक सहयोग बढ़ाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दुनिया में दबाव की राजनीति और ताकत के इस्तेमाल का विरोध जरूरी है। चीन और उत्तर कोरिया को मिलकर बहुध्रुवीय दुनिया बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। इसे अमेरिका के खिलाफ साझा संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

उत्तर कोरिया के परमाणु  शक्ति बनने पर चीन का क्या फायदा?

  • अमेरिका पर दबाव बनाने का हथियार... उत्तर कोरिया, अमेरिका का बड़ा विरोधी है। जब किम जोंग उन मिसाइल परीक्षण करते हैं या परमाणु ताकत दिखाते हैं, तो अमेरिका का ध्यान एशिया में बंट जाता है। इससे चीन को ताइवान, दक्षिण चीन सागर और व्यापार जैसे मुद्दों पर रणनीतिक फायदा मिलता है।
  • चीन के लिए बफर स्टेट... उत्तर कोरिया, चीन और अमेरिका समर्थित दक्षिण कोरिया के बीच एक दीवार की तरह काम करता है। अगर उत्तर कोरिया कमजोर पड़ जाए या खत्म हो जाए, तो अमेरिकी सेना सीधे चीन की सीमा तक पहुंच सकती है। इसलिए चीन चाहता है कि उत्तर कोरिया मजबूत बना रहे।
  • एशिया में अमेरिका की ताकत को चुनौती... उत्तर कोरिया की परमाणु ताकत अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया के लिए खतरा बनती है। इससे चीन को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में फायदा मिलता है। चीन चाहता है कि अमेरिका एशिया में पूरी तरह हावी न हो पाए।
  • रूस-चीन-उत्तर कोरिया धुरी मजबूत होती है... यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और उत्तर कोरिया करीब आए हैं। चीन भी इस गठजोड़ का हिस्सा बनकर पश्चिमी देशों के खिलाफ मजबूत मोर्चा तैयार कर सकता है। इससे अमेरिका पर सामूहिक दबाव बढ़ता है।
  • चीन को कूटनीतिक ताकत मिलती है... जब भी उत्तर कोरिया संकट पैदा करता है, दुनिया चीन की तरफ देखती है क्योंकि चीन ही ऐसा देश है जो किम जोंग उन पर कुछ असर रखता है। इससे चीन खुद को समस्या सुलझाने वाली शक्ति के रूप में पेश करता है।
  • चीन को आर्थिक फायदा भी मिलता है।
  • उत्तर कोरियी का मजबूरी... उत्तर कोरिया काफी हद तक चीन पर निर्भर है। व्यापार, खाद्यान्न, ईंधन और जरूरी सामान चीन से जाता है। इससे चीन को आर्थिक पकड़ और राजनीतिक प्रभाव दोनों मिलते हैं।
  • जापान और दक्षिण कोरिया पर मनोवैज्ञानिक दबाव... उत्तर कोरिया की मिसाइलें जापान और दक्षिण कोरिया को लगातार डर में रखती हैं। इससे ये देश रक्षा खर्च बढ़ाते हैं और क्षेत्र में तनाव बना रहता है। चीन इस तनाव का इस्तेमाल अपनी रणनीतिक चालों में करता है।
  • परमाणु मुद्दे पर अमेरिका से सौदेबाजी... चीन कई बार उत्तर कोरिया के मुद्दे का इस्तेमाल अमेरिका से बातचीत में करता है। यानी अगर अमेरिका चीन पर दबाव डाले, तो चीन उत्तर कोरिया कार्ड खेल सकता है।
हालांकि चीन यह भी नहीं चाहता कि उत्तर कोरिया पूरी तरह बेकाबू हो जाए या बड़ा युद्ध छेड़ दे। इसलिए चीन की नीति होती है कि 'उत्तर कोरिया मजबूत रहे, लेकिन नियंत्रण में रहे।'

उत्तर कोरिया के परमाणु शक्ति बनने पर अमेरिका को क्या नुकसान?

  • अमेरिका की सुरक्षा को सीधा खतरा... पहले उत्तर कोरिया की मिसाइलें सिर्फ दक्षिण कोरिया और जापान तक पहुंचती थीं। लेकिन अब उसके पास ऐसी लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें हैं जो अमेरिका तक मार कर सकती हैं। इससे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा पर सीधा खतरा बढ़ गया है।
  • एशिया में अमेरिका की पकड़ कमजोर पड़ती है... अमेरिका एशिया में खुद को सबसे बड़ी ताकत मानता है। लेकिन उत्तर कोरिया की परमाणु ताकत अमेरिका की सैन्य ताकत को चुनौती देती है। इससे अमेरिका के सहयोगी देशों का भरोसा भी प्रभावित हो सकता है।
  • दक्षिण कोरिया और जापान में डर का माहौल... उत्तर कोरिया की मिसाइलें जापान और दक्षिण कोरिया के ऊपर से गुजर चुकी हैं। इससे अमेरिका पर दबाव बढ़ता है कि वह अपने सहयोगियों की रक्षा करे। अगर अमेरिका ऐसा नहीं कर पाया, तो उसकी वैश्विक छवि कमजोर पड़ सकती है।
  • परमाणु युद्ध का खतरा बढ़ता है... उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच कई बार इतनी तनावपूर्ण स्थिति बनी कि परमाणु युद्ध की आशंका तक पैदा हो गई। छोटी सी गलती या गलतफहमी भी बड़े युद्ध में बदल सकती है।
  • अमेरिका का सैन्य खर्च बढ़ता है... उत्तर कोरिया को रोकने के लिए अमेरिका को जापान, दक्षिण कोरिया और प्रशांत क्षेत्र में भारी सैन्य तैनाती करनी पड़ती है। मिसाइल डिफेंस सिस्टम, युद्धपोत और सैनिकों पर अरबों डॉलर खर्च होते हैं।
  • चीन और रूस को रणनीतिक फायदा मिलता है... उत्तर कोरिया का संकट अमेरिका का ध्यान एशिया में बांधे रखता है। इसका फायदा चीन और रूस उठाते हैं। अमेरिका एक साथ यूक्रेन, ताइवान और उत्तर कोरिया जैसे मोर्चों पर दबाव महसूस करता है।
  • परमाणु प्रसार का खतरा... अगर उत्तर कोरिया खुलेआम परमाणु शक्ति बना रहता है, तो दूसरे देश भी परमाणु हथियार बनाने की सोच सकते हैं। इससे दुनिया में परमाणु हथियारों की दौड़ तेज हो सकती है, जो अमेरिका के लिए बड़ा खतरा है।
  • अमेरिका की वैश्विक छवि पर असर... अमेरिका खुद को दुनिया का सबसे ताकतवर देश मानता है। लेकिन छोटा और आर्थिक रूप से कमजोर उत्तर कोरिया लगातार अमेरिका को चुनौती देता रहा है। इससे अमेरिका की ताकत और प्रभाव पर सवाल उठते हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध कमजोर पड़ते हैं... अमेरिका ने उत्तर कोरिया पर कई प्रतिबंध लगाए। लेकिन चीन और रूस के समर्थन की वजह से ये पूरी तरह असरदार नहीं हो पाए। इससे अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय रणनीति को नुकसान पहुंचता है।

क्या किम जोंग उन परमाणु मुद्दे पर पीछे हटेंगे?

  • उत्तर कोरिया ने साफ कर दिया है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम से पीछे नहीं हटेगा। किम जोंग उन की बहन किम यो जोंग ने हाल ही में कहा कि उत्तर कोरिया खुद को परमाणु शक्ति मानता है और यह फैसला अब बदला नहीं जा सकता। उन्होंने अमेरिका के उस दावे को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि उत्तर कोरिया को परमाणु निरस्त्रीकरण पर राजी किया जा सकता है।
  • पिछले दिनों उत्तर कोरिया ने नए मिसाइल सिस्टम और क्रूज मिसाइलों का परीक्षण भी किया। किम जोंग उन ने हाल ही में परमाणु सामग्री बनाने वाले नए प्लांट का उद्घाटन किया और सेना की ताकत कई गुना बढ़ाने की बात कही। ऐसे में माना जा रहा है कि जिनपिंग इस दौरे में किम को आर्थिक मदद और राजनीतिक समर्थन का भरोसा दे सकते हैं।

आखिर अमेरिका-उत्तर कोरिया में इतनी दुश्मनी क्यों?

करीब 70 साल पहले तक उत्तर और दक्षिण कोरिया एक ही देश थे। लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के बाद कोरिया दो हिस्सों में बंट गया। उत्तर कोरिया को सोवियत संघ और चीन का समर्थन मिला, जबकि दक्षिण कोरिया अमेरिका के साथ खड़ा हो गया। 1950 में कोरियाई युद्ध शुरू हुआ। उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर हमला कर दिया।

इस युद्ध में अमेरिका दक्षिण कोरिया के साथ उतरा, जबकि चीन और सोवियत संघ ने उत्तर कोरिया का साथ दिया। तीन साल तक चले युद्ध में लाखों लोग मारे गए। 1953 में युद्धविराम तो हुआ, लेकिन आज तक दोनों देशों के बीच आधिकारिक शांति समझौता नहीं हो सका। यही वजह है कि उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच की सीमा आज भी दुनिया की सबसे खतरनाक सीमाओं में गिनी जाती है।

ट्रंप और किम की दोस्ती आखिर क्यों टूट गई?

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल में दुनिया ने एक ऐतिहासिक पल देखा था। ट्रंप उत्तर कोरिया की जमीन पर कदम रखने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने थे। दोनों नेताओं के बीच कई बैठकें हुईं। ट्रंप ने किम जोंग उन को व्हाइट हाउस आने का न्योता भी दिया था।

उस समय उम्मीद जगी थी कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु हथियार कम कर सकता है। लेकिन बाद में बातचीत टूट गई। अमेरिका चाहता था कि उत्तर कोरिया पहले परमाणु कार्यक्रम खत्म करे, जबकि किम जोंग उन प्रतिबंध हटाने और सुरक्षा गारंटी की मांग कर रहे थे। इसके बाद रिश्ते फिर खराब हो गए। अब चीन की सक्रियता ने अमेरिका की चिंता और बढ़ा दी है।

क्या रूस-चीन-उत्तर कोरिया नया गठबंधन बना रहे?

रूस और उत्तर कोरिया के बीच हाल के वर्षों में रिश्ते तेजी से मजबूत हुए हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान उत्तर कोरिया पर रूस को हथियार और सैनिक मदद देने के आरोप लगे। बदले में रूस ने उसे आर्थिक और सैन्य मदद दी।

अब चीन भी खुलकर उत्तर कोरिया के साथ दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन, रूस और उत्तर कोरिया मिलकर एशिया में अमेरिका के प्रभाव को चुनौती देना चाहते हैं। जापान और दक्षिण कोरिया भी इस बढ़ती नजदीकी को लेकर चिंतित हैं।

क्या एशिया में फिर बढ़ सकता है परमाणु तनाव?

उत्तर कोरिया लगातार मिसाइल परीक्षण कर रहा है। अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानते हैं। दूसरी तरफ चीन और रूस अमेरिका की सैन्य मौजूदगी का विरोध करते हैं। ऐसे में जिनपिंग और किम जोंग उन की यह मुलाकात आने वाले समय में एशिया की राजनीति को नई दिशा दे सकती है।

यह दौरा सिर्फ दोस्ती का कार्यक्रम नहीं, बल्कि वैश्विक ताकतों की नई रणनीति का संकेत माना जा रहा है। अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या चीन उत्तर कोरिया को शांत करेगा या फिर अमेरिका के खिलाफ एक और मजबूत मोर्चा तैयार होगा।

क्या दुनिया फिर शीत युद्ध जैसे दौर की तरफ बढ़ रही है?

दुनिया धीरे-धीरे दो बड़े खेमों में बंटती दिखाई दे रही है। एक तरफ अमेरिका और उसके सहयोगी देश हैं, जबकि दूसरी तरफ चीन, रूस और उत्तर कोरिया जैसे देश करीब आते दिख रहे हैं। प्योंगयांग में हुई यह मुलाकात आने वाले समय में सिर्फ एशिया ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति पर असर डाल सकती है। अगर उत्तर कोरिया ने परमाणु कार्यक्रम और तेज किया और चीन ने खुला समर्थन दिया, तो अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के साथ तनाव और बढ़ सकता है।
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