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Delhi Pollution: दिल्ली प्रदूषण पर नई रिपोर्ट का बड़ा खुलासा, पराली नहीं, वाहन उत्सर्जन बना PM2.5 का बड़ा कारण
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमर शर्मा
Updated Thu, 01 Jan 2026 10:17 PM IST
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सार
दिल्ली की खतरनाक एयर क्वालिटी के लिए जो उंगलियां खेतों में आग लगाने और पराली जलाने की ओर इशारा कर रही थीं, उन्हें अब अपनी दिशा बदलनी पड़ सकती है।
Delhi Traffic
- फोटो : PTI
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विस्तार
दिल्ली की खतरनाक वायु गुणवत्ता के लिए अब तक जिस पराली जलाने को सबसे बड़ा दोषी माना जाता रहा है, उस धारणा पर एक नई रिपोर्ट ने सवाल खड़े कर दिए हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की एक ताजा स्टडी के मुताबिक, पराली जलाने का दौर खत्म होने के बाद भी दिल्ली में PM2.5 (पीएम 2.5) का स्तर कम नहीं हुआ, बल्कि दिसंबर महीने में यह और ज्यादा गंभीर हो गया।
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पराली के बाद भी क्यों बढ़ा प्रदूषण
अध्ययन में अक्तूबर और नवंबर को "अर्ली विंटर" अवधि के रूप में देखा गया है, जब खेतों में आग का प्रभाव सबसे ज्यादा रहता है। इसके मुकाबले दिसंबर को "पोस्ट-फार्म फायर" चरण माना गया, जब पराली जलाने का असर लगभग नगण्य हो जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर में पूरे एनसीआर में फैला स्मॉग न सिर्फ व्यापक था, बल्कि पराली जलाने वाले महीनों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर रहा।
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दिल्ली अकेली जिम्मेदार नहीं
रिपोर्ट यह भी बताती है कि दिल्ली की हवा में मौजूद पीएम 2.5 का पूरा बोझ सिर्फ राजधानी से नहीं आ रहा। 1 से 15 दिसंबर के बीच दिल्ली का योगदान कुल पीएम 2.5 में सिर्फ 35 प्रतिशत रहा, जबकि 65 प्रतिशत प्रदूषण आसपास के एनसीआर जिलों और उससे भी दूर के इलाकों से आया। यह आंकड़ा साफ करता है कि समस्या केवल स्थानीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर की है।
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अध्ययन में अक्तूबर और नवंबर को "अर्ली विंटर" अवधि के रूप में देखा गया है, जब खेतों में आग का प्रभाव सबसे ज्यादा रहता है। इसके मुकाबले दिसंबर को "पोस्ट-फार्म फायर" चरण माना गया, जब पराली जलाने का असर लगभग नगण्य हो जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर में पूरे एनसीआर में फैला स्मॉग न सिर्फ व्यापक था, बल्कि पराली जलाने वाले महीनों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर रहा।
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दिल्ली अकेली जिम्मेदार नहीं
रिपोर्ट यह भी बताती है कि दिल्ली की हवा में मौजूद पीएम 2.5 का पूरा बोझ सिर्फ राजधानी से नहीं आ रहा। 1 से 15 दिसंबर के बीच दिल्ली का योगदान कुल पीएम 2.5 में सिर्फ 35 प्रतिशत रहा, जबकि 65 प्रतिशत प्रदूषण आसपास के एनसीआर जिलों और उससे भी दूर के इलाकों से आया। यह आंकड़ा साफ करता है कि समस्या केवल स्थानीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर की है।
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स्मॉग की जटिल तस्वीर
सीएसई के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर में बना स्मॉग कई कारणों का नतीजा है। इसमें स्थानीय उत्सर्जन, आसपास के क्षेत्रों से आने वाला प्रदूषण और सेकेंडरी एरोसोल्स का निर्माण शामिल है। रिपोर्ट का कहना है कि सिर्फ एक स्रोत को नियंत्रित करने से समाधान संभव नहीं है, बल्कि पूरे एयरशेड स्तर पर समन्वित कार्रवाई के साथ-साथ स्थानीय स्रोतों पर सख्त नियंत्रण जरूरी है।
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एनसीआर में तेजी से बिगड़ी हवा
दिसंबर में पीएम 2.5 के स्तर में सबसे तेज बढ़ोतरी नोएडा में दर्ज की गई, जहां इसमें 38 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसके बाद बल्लभगढ़ में 32 प्रतिशत, बागपत में 31 प्रतिशत और दिल्ली में 29 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई। यह दिखाता है कि एनसीआर के कई हिस्सों में हवा की गुणवत्ता एक साथ बिगड़ी है।
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सीएसई के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर में बना स्मॉग कई कारणों का नतीजा है। इसमें स्थानीय उत्सर्जन, आसपास के क्षेत्रों से आने वाला प्रदूषण और सेकेंडरी एरोसोल्स का निर्माण शामिल है। रिपोर्ट का कहना है कि सिर्फ एक स्रोत को नियंत्रित करने से समाधान संभव नहीं है, बल्कि पूरे एयरशेड स्तर पर समन्वित कार्रवाई के साथ-साथ स्थानीय स्रोतों पर सख्त नियंत्रण जरूरी है।
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एनसीआर में तेजी से बिगड़ी हवा
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असली वजह: वाहन प्रदूषण
रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि दिल्ली में पीएम 2.5 के ऊंचे स्तर की सबसे बड़ी वजह वाहन उत्सर्जन है। एनसीआर में मौजूद एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशनों से मिले रियल-टाइम डेटा के आधार पर किए गए विश्लेषण में सामने आया कि दिल्ली के स्थानीय प्रदूषण में लगभग आधा योगदान सिर्फ वाहनों से आता है। यानी राजधानी की सड़कों पर बढ़ते वाहन अब सबसे बड़ा प्रदूषण स्रोत बन चुके हैं।
यह भी पढ़ें - Lokpal Car: लोकपाल ने विवादों के बीच सात बीएमडब्ल्यू लग्जरी कारों का टेंडर किया रद्द, जानें फैसले की वजह
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पराली के असर का आकलन कैसे हुआ
पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण के योगदान का आकलन करने के लिए सीएसई ने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फॉरकास्टिंग एंड रिसर्च (SAFAR) से प्राप्त अनुमानों का इस्तेमाल किया। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ कि पराली का असर सीमित समय तक रहता है। जबकि सर्दियों में वाहन और अन्य स्थानीय स्रोत लंबे समय तक प्रदूषण को बनाए रखते हैं।
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नीति के लिए अहम संकेत
यह रिपोर्ट दिल्ली की वायु गुणवत्ता को लेकर एक अहम चेतावनी देती है। अगर प्रदूषण से स्थायी राहत चाहिए, तो ध्यान केवल पराली जलाने तक सीमित रखने के बजाय वाहनों के उत्सर्जन, क्षेत्रीय समन्वय और व्यापक नीति उपायों पर देना होगा।
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