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Bihar: बिहार से जुड़ी है नेताजी की कई यादें; जानिए पटना, दरभंगा, भागलपुर की कहानी, बांकीपुर में क्या कहा था?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: आदित्य आनंद Updated Fri, 23 Jan 2026 04:13 PM IST
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सार

Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti: 1919 से 1941 के बीच नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कई बार बिहार का दौरा किया। जहां भी नेताजी की जनसभा होती, वहां हजारों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से अंग्रेजी हुकूमत इतनी आशंकित थी कि हर सभा में ब्रिटिश गुप्तचर और सैकड़ों सैनिक तैनात रहते थे।

Parakram Diwas Netaji Subhas Chandra Bose has many memories associated with Bihar Patna Bhagalpur Darbhanga
नेताजी सुभाष चंद्र बोस। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आज देश महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती मना रहा है, जिसे अब पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है। आजादी की लड़ाई के दौरान नेताजी का बिहार से गहरा और भावनात्मक रिश्ता रहा। वह न केवल स्वतंत्रता आंदोलन के सिलसिले में बल्कि पारिवारिक कारणों से भी कई बार बिहार आए। नेताजी की बिहार यात्राओं ने यहां के युवाओं और क्रांतिवीरों में आजादी की अलख जगाने का काम किया।इतिहासकारों के अनुसार नेताजी सुभाष चंद्र बोस पहली बार कब बिहार आए, इसकी पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन 1919 में उनकी बिहार यात्रा का उल्लेख इतिहास के पन्नों में दर्ज है। 

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पटना में उमड़ा था जनसैलाब
इतिहासकार बताते हैं कि 27 अगस्त 1939 को नेताजी पटना पहुंचे थे। उन्होंने बांकीपुर और दानापुर के कच्ची तलब इलाके में विशाल जनसभा को संबोधित किया। उस समय बांकीपुर लॉन में हुई सभा में करीब 17 से 20 हजार लोग नेताजी को सुनने पहुंचे थे। अंग्रेजी हुकूमत को उनके भाषणों से इतना डर था कि तत्कालीन जिलाधिकारी ने भाषण की लिखित प्रति पहले ही मंगवा ली थी और इसकी जानकारी मुख्य सचिव को दी गई थी। बांकीपुर लॉन में जब नेताजी ने जनसभा को संबोधित किया, जहां बिहार के दूर-दराज गांवों से लोग उन्हें सुनने पहुंचे थे। इस विशाल सभा की अध्यक्षता स्वामी सहजानंद सरस्वती ने की थी। इसमें साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी शामिल हुए थे। सुभाष बाबू की लोकप्रियता इतनी थी कि हजार पुरुष महिला उन्हें सुनने के लिए आए थे। उनके समर्थकों उनपर फूलों की बारिश कर रहे थे। लोग उनके समर्थन में नारेबाजी कर रहे थे। बांकीपुर लॉन से ही उन्होंने अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ बिगूल फूंका था। समर्थकों का उत्साह देख उन्होंने कहा था कि मुझे मालूम नहीं था कि बांकीपुर में इतना बड़ा आयोजन होगा। 
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सहजानंद सरस्वती के बारे में ऐसा कहा था
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सहजानंद सरस्वती की भी खूब तारीफ की थी। कहा था कि भारत का सच्चा सिपाही मुझे बिहटा के सीताराम आश्रम में मिला। नेताजी पटना के बांकीपुर इलाके में ही शांति निकेतन में रात्रि विश्राम करते थे। उस वक्त वह रात भर अपने करीबियों के साथ बैठकर योजनाओं पर चर्चा करते थे। एक बार जब यह खबर फैली कि नेताजी ट्रेन से आ रहे हैं, तो पटनावासियों ने मोकामा स्टेशन पर ही जमा हो गए। नेताजी का भव्य स्वागत किया गया।

दरभंगा के इस गांव में दिया था भाषण
नेताजी 1939 और 1941 में दरभंगा आए। 24 दिसंबर 1939 को उन्होंने हजपुरा में जनसभा को संबोधित किया, जिसमें करीब 3000 लोग मौजूद थे। इसके बाद समस्तीपुर, मुंगेर और लखीसराय में भी उन्होंने सभाएं कीं। दो साल बाद 1941 में नेताजी फिर दरभंगा पहुंचे और मनीगाढ़ी प्रखंड के मकरंदा गांव में ऐतिहासिक भाषण दिया। इस कार्यक्रम की रूपरेखा स्वतंत्रता सेनानी स्व. कंटीर झा ने तैयार की थी। नेताजी स्व. रामनंद मिश्र के आवास पर ठहरे और बाद में दरभंगा महाराज से मिलने नरगौना पैलेस गए, जहां महाराजा कामेश्वर सिंह ने उन्हें सोने की मुहरें भेंट कीं।

गुप्त मिशन पर भी आए थे दरभंगा
इतिहासकार बताते हैं कि अप्रैल 1942 में नेताजी गुप्त मिशन पर दरभंगा आए थे। मिशन इतना गोपनीय था कि स्वयं महाराजा कामेश्वर सिंह अपनी कार चलाकर उनसे मिलने गए थे। कुछ घंटे महल में रुकने के बाद नेताजी वहां से रवाना हो गए।

भागलपुर में भाई का ससुराल था
नेताजी 1941 में भागलपुर आए थे, जहां वह अपने भाई सुरेश चंद्र बोस के ससुराल में रुके। उन्होंने लाजपत पार्क में जनसभा को संबोधित किया, जिससे प्रेरित होकर हजारों युवा स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गए। इसके अलावा नेताजी जहानाबाद के ठाकुरबाड़ी, आरा और मुजफ्फरपुर में भी जनसभाओं को संबोधित कर चुके थे।

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