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Child Care : बच्चों के डॉक्टर बोले- नियोनेटल ICU में रखने से नवजात-मां पर असर; क्या करें प्रसूति रोग विशेषज्ञ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
Published by: आशुतोष प्रताप सिंह
Updated Sun, 08 Feb 2026 11:45 AM IST
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सार
पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (PMCH) के शिशु रोग विभाग में एडवांस नियोनेटल रिससिटेशन ट्रेनिंग का आयोजन हुआ, जिसमें पीएमसीएच, बिहटा और भागलपुर के 33 नवजात एवं शिशु रोग विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।
PMCH में एडवांस नियोनेटल रिससिटेशन ट्रेनिंग
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (PMCH) के शिशु रोग विभाग में शनिवार को एडवांस नियोनेटल रिससिटेशन ट्रेनिंग वर्कशॉप का आयोजन किया गया। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में पीएमसीएच, बिहटा और भागलपुर के कुल 33 नवजात एवं शिशु रोग विशेषज्ञों को नवजात शिशुओं के पुनर्जीवन की विशेष ट्रेनिंग दी गई।
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कही ये बात
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए पीएमसीएच के प्राचार्य डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि नवजात शिशुओं के मानसिक स्वास्थ्य की चिंता करना आज के समय की बड़ी जरूरत है। उन्होंने कहा कि नवजात शिशु को NICU में मां से दूर रखने से मां और बच्चे—दोनों में मानसिक तनाव पैदा होता है। इससे बचने के लिए स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों और नवजात शिशु रोग विशेषज्ञों को मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जहां तक संभव हो, बिना कारण सिजेरियन डिलीवरी से बचना चाहिए और समय पूर्व प्रसव को रोकने के हर संभव प्रयास किए जाने चाहिए।
पढ़ें: पूर्णिया के लाइन बाजार में दबंगई: बिरयानी दुकान में जमकर तोड़फोड़ और मारपीट, सीसीटीवी कैमरे में कैद
डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए पूर्व में किए गए अपने प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम नवजात शिशुओं के इंटेक्ट सर्वाइवल में महत्वपूर्ण योगदान देगा और भविष्य में उनके बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। उन्होंने कहा कि प्राचार्य के रूप में विद्यार्थियों का स्किल डेवलपमेंट उनकी पहली प्राथमिकता है और इस तरह की ट्रेनिंग आयोजित करने के लिए विभागाध्यक्ष डॉ. हेमंत कुमार एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. रूपेश कुमार की सराहना की।
'नवजात मृत्यु दर में बड़ी कमी लाई जा सकती है'
मुख्य अतिथि आईएपी बिहार के अध्यक्ष एवं पीएमसीएच के पूर्व शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. निगम प्रकाश नारायण ने कहा कि नवजात शिशु पुनर्जीवन में दक्षता एक ऐसी आवश्यक स्किल है, जिससे नवजात मृत्यु दर में बड़ी कमी लाई जा सकती है। वहीं, आईएपी प्रेसिडेंट इलेक्ट एवं एम्स पटना के शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. चंद्र मोहन ने कहा कि प्रवासी शिशु रोग चिकित्सकों ने इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है और इसके लिए उन्होंने विशेष रूप से डॉ. विद्यासागर का नाम लिया।
पीएमसीएच के पूर्व शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. भूपेंद्र नारायण ने कहा कि नवजात शिशु पुनर्जीवन की आवश्यकता को सही समय पर पहचानना और उसे दक्षता के साथ लागू करना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। कार्यक्रम के लीड इंस्ट्रक्टर डॉ. ओम प्रकाश ने कहा कि भारत में अधिक शिशु जन्म दर को देखते हुए नवजात मृत्यु दर को नियंत्रित करने में इस तरह की ट्रेनिंग की अहम भूमिका है।
एडवांस्ड नियोनेटल रिससिटेशन प्रोग्राम के बिहार राज्य प्रबंधक एवं एम्स पटना के नवजात शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. भावेश कांत चौधरी ने सभी नवजात शिशु रोग विशेषज्ञों से इस तरह की ट्रेनिंग लेने की अपील की। कार्यक्रम में IGIMS के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. अमित कुमार, पीएमसीएच के डॉ. राकेश कुमार और डॉ. रूपेश कुमार ने ट्रेनर के रूप में, जबकि डॉ. अर्नव गौरी ने ऑब्जर्वर के रूप में भाग लिया। पूरे दिन चले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल प्रतिभागियों ने इसे अपने करियर के लिए बेहद उपयोगी बताया और कहा कि वे इस ज्ञान को अपनी प्रैक्टिस में जरूर लागू करेंगे।
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मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कही ये बात
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए पीएमसीएच के प्राचार्य डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि नवजात शिशुओं के मानसिक स्वास्थ्य की चिंता करना आज के समय की बड़ी जरूरत है। उन्होंने कहा कि नवजात शिशु को NICU में मां से दूर रखने से मां और बच्चे—दोनों में मानसिक तनाव पैदा होता है। इससे बचने के लिए स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों और नवजात शिशु रोग विशेषज्ञों को मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जहां तक संभव हो, बिना कारण सिजेरियन डिलीवरी से बचना चाहिए और समय पूर्व प्रसव को रोकने के हर संभव प्रयास किए जाने चाहिए।
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डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए पूर्व में किए गए अपने प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम नवजात शिशुओं के इंटेक्ट सर्वाइवल में महत्वपूर्ण योगदान देगा और भविष्य में उनके बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। उन्होंने कहा कि प्राचार्य के रूप में विद्यार्थियों का स्किल डेवलपमेंट उनकी पहली प्राथमिकता है और इस तरह की ट्रेनिंग आयोजित करने के लिए विभागाध्यक्ष डॉ. हेमंत कुमार एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ. रूपेश कुमार की सराहना की।
'नवजात मृत्यु दर में बड़ी कमी लाई जा सकती है'
मुख्य अतिथि आईएपी बिहार के अध्यक्ष एवं पीएमसीएच के पूर्व शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. निगम प्रकाश नारायण ने कहा कि नवजात शिशु पुनर्जीवन में दक्षता एक ऐसी आवश्यक स्किल है, जिससे नवजात मृत्यु दर में बड़ी कमी लाई जा सकती है। वहीं, आईएपी प्रेसिडेंट इलेक्ट एवं एम्स पटना के शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. चंद्र मोहन ने कहा कि प्रवासी शिशु रोग चिकित्सकों ने इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है और इसके लिए उन्होंने विशेष रूप से डॉ. विद्यासागर का नाम लिया।
पीएमसीएच के पूर्व शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. भूपेंद्र नारायण ने कहा कि नवजात शिशु पुनर्जीवन की आवश्यकता को सही समय पर पहचानना और उसे दक्षता के साथ लागू करना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। कार्यक्रम के लीड इंस्ट्रक्टर डॉ. ओम प्रकाश ने कहा कि भारत में अधिक शिशु जन्म दर को देखते हुए नवजात मृत्यु दर को नियंत्रित करने में इस तरह की ट्रेनिंग की अहम भूमिका है।
एडवांस्ड नियोनेटल रिससिटेशन प्रोग्राम के बिहार राज्य प्रबंधक एवं एम्स पटना के नवजात शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. भावेश कांत चौधरी ने सभी नवजात शिशु रोग विशेषज्ञों से इस तरह की ट्रेनिंग लेने की अपील की। कार्यक्रम में IGIMS के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. अमित कुमार, पीएमसीएच के डॉ. राकेश कुमार और डॉ. रूपेश कुमार ने ट्रेनर के रूप में, जबकि डॉ. अर्नव गौरी ने ऑब्जर्वर के रूप में भाग लिया। पूरे दिन चले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल प्रतिभागियों ने इसे अपने करियर के लिए बेहद उपयोगी बताया और कहा कि वे इस ज्ञान को अपनी प्रैक्टिस में जरूर लागू करेंगे।