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Lalu Yadav : लालू यादव के हर मकान पर विवाद क्यों? तब बिहार के सबसे आलीशान 'हाउस' का मालिक नहीं आया था सामने

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सार

Bihar News : लालू प्रसाद यादव क्या गोपालगंज जाकर पूर्वजों के मकान में रहेंगे? या, महुआबाग ही ठिकाना होगा? कौटिल्यनगर का क्या होगा? समझिए हर पहलू, क्योंकि जब सीएम थे तो बिहार का सबसे आलीशान 'व्हाइट हाउस' बेनामी रह गया था।

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कभी व्हाइट हाउस कहा जाता था यह। बेनामी रह गया तो विधिक प्राधिकार का कार्यलय बनाया गया। - फोटो : अमर उजाला डिजिटल
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विस्तार

पटना का 10 सर्कुलर रोड आवास बिहार विधान परिषद् सदस्य और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के पास था। इसी में वह अपने पति और राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के साथ रहती थीं। बिहार सरकार ने इस बार जब विधानसभा और विधान परिषद् के सभी सदस्यों को नए आवास आवंटित किए तो राबड़ी देवी का भी नाम था। आवास नहीं बदलने की जिद और खाली करने की औपचारिकता के बीच लालू प्रसाद यादव के दो निर्माणाधीन भवनों को लेकर भी हंगामा मचा। हंगाम अभी चल ही रहा है। हंगामा तो ऐसा कि कहीं लालू प्रसाद यादव को गोपालगंज जाकर पूर्वजों के मकान में न भेज दें सत्ताधारी दल के नेता। खैर, बात निकली है तो यह भी जान लें कि यह पहला मौका नहीं है। एक समय जब मुख्यमंत्री के रूप में लालू प्रसाद का जलवा था, तब बिहार के सबसे आलीशान 'व्हाइट हाउस' का उनका ही आशियाना कहा जाता था। लेकिन, चारा घोटाले की फाइलें खुलीं और जांच शुरू हुई तो उसका कोई मालिक ही नहीं सामने आया।

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कहां है यह व्हाइट हाउस, किसके कब्जे में था और है?
जिन लोगों ने लालू प्रसाद यादव की मेकिंग देखी है और उस समय के पटना आते-जाते रहे हों, वह व्हाइट हाउस का नाम जानते होंगे। शुरू से पटना की सबसे खास जगह रहा है डाकबंगला चौराहा। अंग्रेजों के जमाने से। उससे जितनी दूरी पर पटना जंक्शन है, लगभग उससे डेढ़ गुना दूरी पर दूसरी तरफ पटना संग्रहालय है। 100 से ज्यादा साल पुराना पटना संग्रहालय। इसके ठीक सामने पिछली सदी के अंतिम कुछ वर्षों में एक आलीशान बिल्डिंग उभरी थी। अमेरिकी राष्ट्रपति के व्हाइट हाउस की प्रतिकृति तो नहीं, लेकिन उस जमाने में इसका वैभव बिहार में कुछ वैसा ही था। सो, नाम चर्चित था- व्हाइट हाउस। वह जनता दल और उससे निकले राष्ट्रीय जनता दल का जमाना था। कहा जाता है कि नक्सली हिंसा और अपहरण उद्योग के उस दौर में पटना म्यूजियम के सामने करीब 10 हजार वर्गफीट सरकारी जमीन पर यह बिल्डिंग दो महीने में बना दी गई थी। चारा घोटाले का पैसा लगने की बात थी। राजद के दिग्गजों का आना-जाना था। लालू प्रसाद यादव इस बिल्डिंग के मालिक बताए जाते थे। लेकिन, जब चारा घोटाला सामने आया और जांच के दायरे में यह बिल्डिंग भी आई तो इसपर किसी ने मालिकाना हक ही नहीं जताया। मतलब, बेनामी संपत्ति रह गई। बाद में हाईकोर्ट के आदेश से सरकारी संपत्ति घोषित करते हुए इसे बिहार राज्य विधिक प्राधिकार का मुख्यालय के लिए आवंटित कर दिया गया।
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अणे मार्ग से निकलीं राबड़ी तो सर्कुलर रोड से पहचान
मुख्यमंत्री के रूप में लालू प्रसाद यादव पर चारा घोटाले का बड़ा आरोप लगा था तो जेल जाने की स्थिति में उन्होंने अपनी कुर्सी अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सौंप दी थी। नीतीश कुमार के सीएम बनने से पहले 2005 तक राबड़ी देवी का मुख्यमंत्री के रूप में अणे मार्ग ही आशियाना था। जब वह 'पूर्व मुख्यमंत्री' हो गईं तो नया सरकारी आवास- 10 सर्कुलर रोड ही लालू परिवार की पहचान हो गया। लालू इस बीच राज्यसभा होकर केंद्र में मंत्री भी रहे थे। राबड़ी ने बिहार की राजनीति की थी, इसलिए बंगला उन्हें ही विधानमंडल के सदस्य के रूप में आवंटित रहा। लालू जब-जब जेल से लौटे, इसी 10 सर्कुलर रोड राबड़ी आवास में रहे। इस बार भी जेल से जमानत पर निकले तो वहीं आए। वहीं से दिल्ली में बेटी मीसा भारती के घर होकर रोहिणी आचार्य के पास सिंगापुर गए और किडनी ट्रांसप्लांट के बाद फिर उसी तरह दिल्ली होकर पटना स्थित 10 सर्कुलर रोड आवास लौटे। यह आवास लालू प्रसाद यादव और फिर तेजस्वी यादव की राजनीतिक पहचान रहा। तेजस्वी यादव को अलग आवास आवंटित है, लेकिन परिवार और पार्टी के मुखिया लालू के कारण 10 सर्कुलर रोड ही पहचान रहा है। तेज प्रताप यादव की पत्नी इसी घर में बहू बनकर आईं और निकाली गईं। बेटी रोहिणी आचार्य के साथ भला-बुरा भी यहीं हुआ।

सर्कुलर रोड से निकलने की औपचारिकता; जाना कहां है?
25 नवंबर को भवन निर्माण विभाग ने 10 सर्कुलर रोड खाली कर नव-आवंटित आवास में राबड़ी देवी को जाने का नोटिस दिया तो उन्होंने विरोध किया। विरोध तो तेजस्वी यादव ने भी किया। लेकिन, फिर लालू को लेकर राबड़ी दिल्ली चली गईं, हालांकि बीच में आईं भी। उधर, तेजस्वी यादव पूरे दिसंबर विदेश यात्रा पर रहे। अब भी पटना नहीं लौटे हैं, हालांकि भारत आने की बात सामने आ रही है। वह संभवत: एक पारिवारिक कार्यक्रम में दिल्ली में एक-दो दिन के अंदर दिखेंगे। फिर 10 को पटना आकर खरमास के बाद राजनीति के मैदान में उतरेंगे। यानी, इस बार चूड़ा-दही भोज की संभावना कम है। इस बीच 25 दिसंबर की रात 10 सर्कुलर रोड से कुछ सामान निकालने की औपचारिकता की गई। औपचारिकता की वजह जानने के लिए यहां क्लिक करें। यह आवास छूटने के बाद जाना कहां है, यह बड़ा सवाल है।

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सत्ताधारी दलों का आरोप- रेलवे में नौकरी के बदले ली गई जमीन पर बन रहा यह आलीशान भवन। - फोटो : अमर उजाला डिजिटल
भवन के दो विकल्प, दोनों पर विवादों का गहरा साया

पटना के 10 सर्कुलर रोड को छोड़ने की नोटिस के समय ही यह सामने आया कि लालू प्रसाद का परिवार महुआबाग में बन रहे अपने निज आवास में जाएगा। लेकिन, जब कुछ सामान को वेटनरी कैंपस की ओर भेजे जाने की बात सामने आई तो कौटिल्य नगर में निर्माणाधीन भवन की बात भी खुली। सत्तापक्ष के नेताओं का आरोप है कि महुआबाग की जमीन रेलवे में नौकरी हासिल करने वाले किसी शख्स से ली गई है। उसकी जांच की मांग तेज होने से पहले कौटिल्य नगर के भवन की जानकारी सामने आई। यह जमीन पहले से विवादों में है। राजनीति में चमकने से पहले वेटनरी कॉलेज के एक जर्जर हिस्से में लालू रहते थे। उसी के पीछे यह इलाका है। इसे जमीन घोटाला बताते हुए दस्तावेजों के साथ कोर्ट में लड़ाई लड़ने वाले आरटीआई कार्यकर्ता विकास चंद्र उर्फ गुड्डू बाबा इस मामले में सामने उतर आए, जब उप मुख्यमंत्री और राज्य के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने पत्रकारों के सवाल के जवाब में कहा कि अगर कोई शिकायत आई तो वह इस जमीन की जांच कराएंगे।


 

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विश्वविद्यालय से कॉलेज को मिली जमीन, जिसपर साेसायटी बना बंदरबांट किया गया। इसलिए, यहां भी सवाल उठा। - फोटो : अमर उजाला डिजिटल

लालू ही नहीं, हर पार्टी के नेताओं के पास यह जमीन
लालू प्रसाद यादव के कौटिल्य नगर आवास को लेकर भले हंगामा हो रहा है, लेकिन सीधे तौर पर किसी बड़े चेहरे को उतर कर लड़ते नहीं देखा जा रहा है। वजह यह है कि यह जमीन कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्रा के समय 1986 में 'सांसद-विधायक को-ऑपरेटिव सोसायटी' गठित कर उसे दी गई थी। पूरे 20 एकड़ जमीन है। दस्तावेज बताते हैं कि यह जमीन 1916 में पटना विश्वविद्यालय को मिली थी। बाद में इसे वेटनरी कॉलेज को दिया गया। वेटनरी कॉलेज की जमीन किसी को-ऑपरेटिव सोसायटी को देने का मामला कोर्ट में ले जाने वाले विकास चंद्र उर्फ गुड्डू बाबा कहते हैं कि "जनोपयोगी नहीं, बंदरबांट के लिए जनता की जमीन इस सोसायटी को दी गई। पहले तो विश्वविद्यालय-कॉलेज की यह जमीन सोसायटी को नहीं दी जानी चाहिए थी। दूसरी बात यह कि 1086 में लीज किया गया और उसकी अवधि अप्रैल 2016 तक ही थी। एक्सटेंशन नहीं हो रहा था, लेकिन चुनाव के पहले अचानक कर दिया गया। वजह यह है कि इसमें उस समय के तमाम दलों के नेताओं के नाम जमीन बांटी गई थी। तीसरी बात यह कि लीज की शर्तों में स्पष्ट था कि पटना में जिनके पास जमीन-मकान है, उन्हें यहां जमीन नहीं मिलेगी या जो यहां जमीन लेंगे, उन्हें सरकार सरकारी आवास नहीं देगी। इसके साथ ही इसकी जमीन बेचने या हस्तांतरित करने पर भी रोक है। लेकिन, यहां सब खेल चला है।"
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सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इसपर भी भारी लड़ाई
सत्ताधारी जदयू और भाजपा ने इन भवनों को लेकर लालू परिवार पर हमला जारी रखा है। जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने महुआबाग की जमीन को रेलवे में नौकरी के बदले लिए जाने की बात कर ईडी की जांच के दायरे में बताया था। नीरज ने कौटिल्य नगर में लगभग तैयार आलीशान भवन के निर्माण खर्च पर भी सवाल उठाया। इसके जवाब में राष्ट्रीय जनता दल के विधायक भाई वीरेंद्र मुखर होकर सामने आए और कहा कि महुआबाग की जमीन बहुत पहले लालू परिवार ने खरीदी थी और अब मकान बन रहा है तो सत्ता पक्ष के लोग अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं। जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने 'अमर उजाला' से बातचीत में कहा कि लगे हाथ व्हाइट हाउस बनवाने वाले की भी जांच कर दी जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। इधर, भाजपा प्रवक्ता नीरज कुमार ने साफ तौर पर कहा- "लालू यादव, राबड़ी देवी या तेजस्वी यादव को विधायक, विधान पार्षद या सांसद के रूप में ही राशि मिली और कोई घोटाला नहीं किया गया तो इतनी जमीनें कहां से निकल रही और ऐसे आलीशान भवन कहां से बन रहे! लालू जब सत्ता में थे तो पटना म्यूजियम के सामने व्हाइट हाउस अचानक बन गया था। तब राजद के लोग भी इसे लालू का महल बताते थे, लेकिन फिर चारा घोटाले की जांच शुरू हुई तो यह बेनामी निकला। जांच होती जाएगी तो ऐसे खुलासे होते रहेंगे।" 


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