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Bihar News: 103 साल पुरानी परंपरा के साथ छपरा में माता की विदाई, जमकर खेल गया सिंदूर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छपरा
Published by: आशुतोष प्रताप सिंह
Updated Thu, 02 Oct 2025 02:52 PM IST
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सार
सारण जिले के छपरा शहर स्थित कालीबाड़ी मंदिर में बंगाली समुदाय की परंपरा के अनुसार माता की विदाई और सिंदूर खेला का आयोजन किया गया। सबसे बुजुर्ग महिला ने माता को सिंदूर लगाकर और खोईचा देकर विदा किया, जिसके बाद अन्य महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाया।
छपरा कालीबाड़ी में बंगाली परंपरा के अनुसार हुई माता की विदाई
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बिहार के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जिले सारण के मुख्यालय छपरा शहर स्थित कालीबाड़ी मंदिर में आज बंगाली समुदाय की परंपरा के अनुसार माता की विदाई की गई। इस अवसर पर पहले माता का पूजन, हवन और पुष्पांजलि बंगाली रीति रिवाज के अनुसार संपन्न किया गया। विदाई की परंपरा के अनुसार सबसे बुजुर्ग महिला ने माता को सिंदूर लगाकर और खोईचा देकर विदा किया। इसके बाद अन्य महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सिंदूर खेला का आयोजन किया।
बंगाली समुदाय की निवेदिता सरकार ने बताया कि बंगाली समाज की महिलाओं के लिए यह दिन काफी अहम माना जाता है। इस दिन खुशी के साथ सभी महिलाओं को सिंदूर लगाया जाता है। इसके साथ ही महिलाएं अपने मुंह से एक विशेष प्रकार की मंगल ध्वनि निकालती हैं, जिसे उलू देना कहा जाता है। माता के जयकारे के बीच श्रद्धालु अगले साल फिर आने की कामना के साथ माता को विदा करते हैं।
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मालूम हो कि छपरा स्थित कालीबाड़ी मंदिर बिहार के प्राचीन कालीबाड़ी में से एक है। यहां लगभग 103 साल पूर्व यानी वर्ष 1922 से माता की स्थापना होती आ रही है। बंगाली रीति रिवाज के अनुसार विधिवत पूजा होती है और प्रत्येक शाम ढाक और ढोल की थाप पर विशेष आरती का आयोजन किया जाता है। इस कार्यक्रम को देखने के लिए सैकड़ों की संख्या में स्थानीय लोग उमड़ते हैं।
मंदिर में होने वाली माता की आरती में हजारों श्रद्धालु आते हैं। बंगाली रीति रिवाज के अनुसार षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी और नवमी को ढाक की थाप पर आरती होती है, जिसे बजाने वाले कलाकार पश्चिम बंगाल से आते हैं। सुबह में माता को पुष्पांजलि अर्पित की जाती है और प्रतिदिन माता को भोग लगाया जाता है, जिसका प्रसाद श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है। प्रत्येक शाम आरती के बाद अष्टमी और नवमी को संधी पूजा होती है।
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बंगाली समुदाय की निवेदिता सरकार ने बताया कि बंगाली समाज की महिलाओं के लिए यह दिन काफी अहम माना जाता है। इस दिन खुशी के साथ सभी महिलाओं को सिंदूर लगाया जाता है। इसके साथ ही महिलाएं अपने मुंह से एक विशेष प्रकार की मंगल ध्वनि निकालती हैं, जिसे उलू देना कहा जाता है। माता के जयकारे के बीच श्रद्धालु अगले साल फिर आने की कामना के साथ माता को विदा करते हैं।
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मंदिर में होने वाली माता की आरती में हजारों श्रद्धालु आते हैं। बंगाली रीति रिवाज के अनुसार षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी और नवमी को ढाक की थाप पर आरती होती है, जिसे बजाने वाले कलाकार पश्चिम बंगाल से आते हैं। सुबह में माता को पुष्पांजलि अर्पित की जाती है और प्रतिदिन माता को भोग लगाया जाता है, जिसका प्रसाद श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है। प्रत्येक शाम आरती के बाद अष्टमी और नवमी को संधी पूजा होती है।