Election Results : भाजपा की 'नवीन' नीति ने कैसे बदला पश्चिम बंगाल का गणित? बिहार ने अंदर से झोंकी थी ताकत
Election 2026 : आज पांच विधानसभा चुनावों का परिणाम आ रहा है, लेकिन देश की नजर पश्चिम बंगाल पर थी। देश ही नहीं, पड़ोसी- विदेशियों की भी। आज से करीब पांच महीने पहले भाजपा ने जो नवीन नीति लायी थी, इसे उसका परिणाम कहें तो गलत नहीं होगा। वजह समझिए।
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बिहार की कुर्सी के बाद अब पश्चिम बंगाल की चाबी। भारतीय जनता पार्टी की 'नवीन नीति' की दूसरी बड़ी सफलता सामने दिख रही है। बिहार में नीतीश कुमार को हटा पहली बार भाजपाई मुख्यमंत्री बनाने के पीछे नए-नए राष्ट्रीय अध्यक्ष बने नितिन नवीन की कितनी भूमिका थी, इसपर पार्टी में कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था और न होगा। लेकिन, जब बात पश्चिम बंगाल की होगी तो निश्चित तौर पर नितिन नवीन के खाते में इसे डालना पड़ेगा। भाजपा ने 14 दिसंबर को पटना के बांकीपुर सीट से तत्कालीन विधायक नितिन नवीन को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया, तभी से यह चर्चा चल निकली थी कि निशाना पश्चिम बंगाल है। 20 जनवरी को जब वह राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्विरोध बने, तब तक तस्वीर बहुत साफ हो रही थी। फिर बिहार में सत्ता हस्तांतरण और अब पश्चिम बंगाल में भूतो-न-भविष्यति जैसी जीत ने सबकुछ साफ कर दिया है। इस परिणाम के परिदृश्य में जानना रोचक है कि नितिन नवीन को ऐन वक्त पर लाने का मतलब क्या था?
वर्गों में बंटे वोटरों को जोड़ना लक्ष्य, बाकी चीजें होती गईं
पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत तक बताई जाती है। मतदाताओं के विशेष गहन पुनरीक्षण में बवाल बाद में आया, लेकिन अंदाजा भाजपा को पहले से था। मतदान के दौरान वोट प्रतिशत बढ़ने के पीछे भी यही वजह बताई जा रही थी कि मुस्लिम आबादी एकमुश्त एक तरफ जा रही है तो जवाब में हिंदू जातियों ने गुटबंदी की है। यह गुटबंदी चुनाव परिणाम के रूप में इस तरह सामने आएगी, यह एग्जिट पोल भी बता रहे थे। पहली बार पश्चिम बंगाल में इस तरह बांग्लादेशियों को अलगथलग करने और तुष्टिकरण का मुखर विरोध करने के साथ वर्गों में बंटे हिदुओं को एकजुट करने के लिए भाजपा ने चक्रव्यूह की रचना की थी।
कायस्थ को कमान, फिर नितिन का चक्रव्यूह आया काम
भाजपा ने देखा कि बंगाल में बिहार से जाकर स्थायी तौर पर बसे लोगों की संख्या ठीकठाक है। इसके साथ ही यह भी कि अगड़ी जाति, खासकर ब्राह्मण और कायस्थ ठीकठाक हैं। ऐसे में कायस्थ जाति के नितिन नवीन को भाजपा ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। इसके बाद चक्रव्यूह की रचना नितिन नवीन ने काफी हद तक खुद की। नितिन ने पश्चिम बंगाल से सटे अपने राज्य बिहार से भाजपा के हर स्तर के नेता को पश्चिम बंगाल में करीब 90 दिनों के लिए शिफ्ट कर दिया। इसमें पश्चिम बंगाल के वोटरों की जाति का ख्याल रखते हुए अनुसूचित जाति के नेताओं को तो भेजा ही गया, ब्राह्मण, कायस्थ और राजपूतों को भी ठीकठाक संख्या में लगाया गया। वैसे, अनुसूचित जाति के बाद चूंकि पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रभाव है तो नितिन नवीन ने ओबीसी नेताओं की भी बड़ी खेप बंगाल में दूर-सुदूर तक भेज दी। खास बात यह भी रही कि इस बार भाजपा ने भारी संख्या में अपनी नेत्रियों को भी पश्चिम बंगाल में जमाए रखा। कई तो लगातार महीनाभर वहीं रहीं। देश के अन्य राज्यों के मुकाबले बिहार की भाजपा नेत्रियां वहां ज्यादा घूमती नजर आईं।
मेलजोल और अंदर-अंदर नेटवर्क पर फोकस
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के खाते में पश्चिम बंगाल का यह करिश्मा आ रहा है तो इसके पीछे पार्टी की सोच भी है। पार्टी ने बांग्लादेशियों को अलगथलग करने के साथ ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ पूरा प्लान तैयार किया था। नितिन नवीन की पूरी टीम इस प्लान के तहत काम करती रही। हर पॉकेट में उससे जुड़े लोगों को भेजा गया, ताकि वह अंदर-अंदर मेलजोल बढ़ाकर अपने बनाए नेटवर्क के बीच भाजपा की नीति को प्रसारित करे। पश्चिम बंगाल से लौटे भाजपा नेताओं ने 'अमर उजाला' से बातचीत में कहा कि "हमें पार्टी की नीतियों पर जीत के लिए काम करना था। हम राष्ट्रवाद की बात करते हुए पश्चिम बंगाल की मौजूदा परिस्थितियों से लोगों को अवगत करा रहे थे। हमें जहां की जिम्मेदारी दी गई थी, उस बारे में पार्टी ने होमवर्क कर रखा था। हम स्थानीय परिस्थितियों और बाकी देश से अलग दिख रहे पश्चिम बंगाल के कारणों के बारे में लोगों से बात की। बताया कि कैसे पश्चिम बंगाल में देश से अलग माहौल और परिस्थिति है। लोग समझ रहे थे, इसलिए डरने की जगह मुखर हो रहे थे। यह मुखर होना वक्त की मांग थी, वरना पश्चिम बंगाल में घुसपैठ का अंत संभव नहीं होता।"
