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होमी जहांगीर भाभा की भविष्यवाणी क्या ब्रिटेन में सच साबित होने जा रही है?

Thu, 07 Jan 2021 02:11 PM IST
योगेश जोशी फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश जोशी Updated Thu, 07 Jan 2021 02:11 PM IST
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scientist homi jagir bhabha researches nuclear fusion experiment reactor britain
होमी जहांगीर भाभा - फोटो : अमर उजाला

ब्रिटेन ने 2040 तक फ्यूजन रिएक्टर वाला व्यावसायिक बिजलीघर बनाने का एलान किया है। क्या यह मुमकिन है? न्यूक्लियर फ्यूजन (संलयन) का विज्ञान 1930 के दशक से ही मालूम है जब प्रयोगशाला में हाइड्रोजन आइसोटोप के परमाणुओं का फ्यूजन कराया गया था।हम रोजाना इसे घटित होते देखते हैं। सूरज एक विशाल आत्मनिर्भर फ्यूजन रिएक्टर की तरह काम करता है। इसी तरह दूसरे तारे भी। तारों में फ्यूजन उनके विशाल गुरुत्वाकर्षण बल से संचालित होता है जो परमाणुओं को एक-दूसरे में मिलाकर भारी परमाणु में बदल देता है। इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। धरती पर फ्यूजन रिएक्टर बनाकर इस प्रक्रिया को दुहराना जटिल काम है। इसमें इंजीनियरिंग की चुनौतियां सामने आती हैं।



कई मायनों में फ्यूजन की खूबियां कीमिया (रसायन विज्ञान) से मिलती-जुलती हैं। प्राचीन फारस के कीमियागर (रसायनशास्त्री) अपनी जिंदगी के कई दशक दूसरे धातुओं से सोना बनाने में खपा देते थे। फ्यूजन उसी तरह की प्रक्रिया है जिसमें हल्के परमाणुओं के नाभिक एक-दूसरे से जुड़कर भारी नाभिक में बदल जाते हैं और एक अलग रासायनिक तत्व का निर्माण होता है।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पिक्साबे
  • बिजली बन सकती है, सोना नहीं

कीमियागरों को यह बात मालूम थी कि चूंकि सोना उनकी आंखों के सामने मौजूद है, वह किसी न किसी तरीके से बनाया गया होगा। उनको इस बात का अहसास नहीं था कि भारी तत्व, जैसे सोना, असल में फ्यूजन से बने हैं। मरते हुए तारों में विस्फोट से ऐसे धातु अंतरिक्ष में बिखर गए हैं। परमाणुओं के बीच फ्यूजन शुरू कराने के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसलिए धरती पर हल्के तत्वों का फ्यूजन ही कामयाब हो सकता है, जिसमें सोना नहीं बन सकता।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

फ्यूजन रिएक्टर में हाइड्रोजन आइसोटोप को डेढ़ करोड़ डिग्री सेंटीग्रेट तापमान पर गर्म किया जाता है जो सूरज की गर्मी के बराबर है। इससे प्लाज्मा बनता है जो पदार्थ की चौथी अवस्था है।प्लाज्मा को चुंबकीय ताकत से दबाया जाता है, जिससे हाइड्रोजन के आइसोटोप जुड़कर हीलियम में बदल जाते हैं और तीव्र गति वाले न्यूट्रॉन बाहर निकलते हैं। इस प्रतिक्रिया से 17.6 मेगा इलेक्ट्रॉन वोल्ट ऊर्जा मुक्त होती है जो सामान्य रासायनिक दहन से मिलने वाली ऊर्जा से एक करोड़ गुणा ज़्यादा है।

न्यूक्लियर फिशन (विखंडन) में भारी परमाणु टूटकर हल्के परमाणुओं में बदलते हैं। इसके उलट न्यूक्लियर फ्यूजन में हल्के परमाणु जुड़कर भारी परमाणु में बदलते हैं। इसका मतलब है फ्यूजन में हानिकारक अपशिष्ट कम निकलते हैं। न्यूट्रॉन की बमबारी से फ्यूजन प्लांट थोड़ा रेडियोधर्मी हो जाता है लेकिन ये रेडियोधर्मी उत्पाद अल्पकालिक होते हैं। फ्यूजन से प्रदूषण-रहित, जलवायु-अनुकूल ऊर्जा पैदा की जा सकती है. इसमें रेडियोधर्मी कचरा निकलने का खतरा भी नहीं है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
  • डिजाइन की चुनौती

परीक्षण रिएक्टरों, जैसे इंग्लैंड में कल्हम के जॉइंट यूरोपियन टोरस (JET) ने साबित किया है कि फ्यूजन मुमकिन है, भले ही थोड़े समय के लिए। चुनौती यह है कि इन परीक्षण रिएक्टरों को लगातार काम करने वाले बिजलीघरों में कैसे बदला जाए जो व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक भी हो। इसके लिए जरूरी है कि फ्यूजन रिएक्टर चलाने में जितनी बिजली लगे उससे अधिक बिजली पैदा की जाए।

दशकों तक हमसे वादा किया गया कि व्यावसायिक फ्यूजन बिजलीघर अगले 30 साल में हकीकत बन जाएंगे। 1955 में भौतिक विज्ञानी होमी जहांगीर भाभा ने दावा किया था कि दो दशक के अंदर हमें फ्यूजन से बिजली मिलने लगेगी। यह दावा और इसके बाद किए गए कई दावे पूरे नहीं हो पाए। हमेशा यही लगता रहा कि फ्यूजन बस थोड़ी दूर है।हमें मालूम है कि आदर्श स्थितियों में फ्यूजन कैसे काम करता है। दुर्भाग्य से, वास्तविकता शायद ही कभी आदर्श होती है। फ्यूजन इंजीनियरिंग की चुनौती है, वैज्ञानिक चुनौती नहीं। ब्रिटेन के न्यूक्लियर एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग रिसर्च सेंटर के मुख्य कार्यकारी एंड्रयू स्टोरर कहते हैं, "चुनौती विज्ञान को लेकर नहीं है। वैज्ञानिकों को अब व्यावहारिक तौर पर काम करने वाली चीज तैयार करनी है।"

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
  • हालात बदल रहे हैं

2019 में ब्रिटिश सरकार ने 2040 तक पूरी तरह से काम करने वाले फ्यूजन रिएक्टर तैयार करने की योजना का ऐलान किया था। इसका पहला चरण फ्यूजन रिएक्टर में बिजली उत्पादन के लिए गोलाकार टोकामैक (STEP) का मास्टरप्लान विकसित करना है। यह डिजाइन ब्रिटिश फ्यूजन रिसर्च के लिए खास है। अब ब्रिटेन में STEP रिएक्टर के लिए सही जगह ढूंढ़ी जा रही है।

मगर 20 साल में पूरी तरह के सुचारू व्यावसायिक रूप से सफल फ्यूजन रिएक्टर बनाना बड़ा काम है। तुलना के लिए, हिंकले पॉइंट सी न्यूक्लियर फिशन रिएक्टर के 2025 तक तैयार हो जाने की उम्मीद है। प्रस्ताव से लेकर निर्माण तक इसमें 15 साल लग रहे हैं जबकि इसमें 1950 के दशक से चली आ रही फिशन तकनीक का इस्तेमाल होने वाला है।

इस बीच, फ्रांस में ITER फ्यूजन रिएक्टर 70 फीसदी बन चुका है। उम्मीद है कि 2025 में यहां प्लाज्मा तैयार हो जाएगा। यहां से 500 मेगावॉट बिजली मिलेगी, जो लिवरपूल के आकार के शहर के लिए पर्याप्त होगी। यूके एटॉमिक एनर्जी अथॉरिटी के मुख्य कार्यकारी इयान चैपमैन कहते हैं, "ITER के बारे में बहुत कुछ ऐसा है जो विज्ञान गल्प की तरह लगता है।"

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