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SBI Report: देश में कैश और डिजिटल भुगतान दोनों जरूरी, रिपोर्ट का दावा- संकट के दौर में बढ़ा नकदी रखने का रुझान
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Riya Dubey
Updated Fri, 24 Apr 2026 10:20 AM IST
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सार
एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में नकद और डिजिटल भुगतान दोनों समान रूप से जरूरी हैं। छोटे लेनदेन के लिए यूपीआई का इस्तेमाल बढ़ा है, जबकि आपात स्थिति और अनिश्चितता के कारण लोग नकदी भी अपने पास रख रहे हैं।
नकद और डिजिटल भुगतान
- फोटो : Adobestock
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विस्तार
एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था में नकद और डिजिटल भुगतान दोनों की अपनी-अपनी अहम भूमिका है। रिपोर्ट के मुताबिक, नकदी और डिजिटल माध्यम एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि पूरक हैं। लोग रोजमर्रा के छोटे भुगतान, खरीदारी और रिटेल ट्रांजैक्शन के लिए यूपीआई का इस्तेमाल तेजी से कर रहे हैं, लेकिन आपात स्थिति, बचत और अनौपचारिक लेनदेन के लिए अब भी नकदी अपने पास रखना पसंद करते हैं।
रिपोर्ट में एटीएम निकासी और नकदी भंडारण के आंकड़ों पर भी जोर दिया गया है। इसमें कहा गया कि प्रति व्यक्ति चलन में नकदी और एटीएम से निकाली गई नकदी के बीच अंतर वित्त वर्ष 2024 में 1,804 रुपये था, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 9,127 रुपये हो गया। यानी दो वर्षों में यह अंतर पांच गुना बढ़ा है। एसबीआई रिसर्च का मानना है कि यह बढ़ोतरी लोगों द्वारा एहतियातन नकदी जमा रखने की प्रवृत्ति को दर्शाती है।
रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा वैश्विक तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण लोग अतिरिक्त नकदी रखना पसंद कर रहे हैं। इसी तरह का रुझान रुस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी देखा गया था।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मार्च 2026 तक 100 रुपये के नोटों की हिस्सेदारी 6.2 प्रतिशत से बढ़कर 8.2 प्रतिशत हो गई है, जबकि 500 रुपये के नोटों की हिस्सेदारी करीब 86 प्रतिशत पर स्थिर बनी हुई है। इससे संकेत मिलता है कि छोटे मूल्यवर्ग के नोटों की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में कुछ सुधार हुआ है।
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ई-रुपये को लेकर क्या कहते हैं?
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने ई-रुपया यानी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) लॉन्च कर दी है, लेकिन इसका प्रसार अभी बेहद सीमित है। मार्च 2025 तक ई-रुपये का कुल प्रचलन सिर्फ 1,016 करोड़ रुपये रहा। रिपोर्ट के अनुसार, इसके व्यापक इस्तेमाल के लिए लोगों में जागरूकता बढ़ाने, उपयोग को आसान बनाने और फिनटेक प्लेटफॉर्म्स के साथ रणनीतिक साझेदारी करने की जरूरत है।
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प्रति व्यक्ति आय से जुड़ी दिलचस्प बातें
अध्ययन में प्रति व्यक्ति आय और नकदी के उपयोग से जुड़े दिलचस्प आंकड़े भी सामने आए हैं। वित्त वर्ष 2012 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 71,609 रुपये थी, जो वित्त वर्ष 2026 तक बढ़कर 2,51,393 रुपये हो गई। इस दौरान इसकी चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) 9.4 प्रतिशत रही। वहीं, प्रति व्यक्ति चलन में नकदी 8,762 रुपये से बढ़कर 29,324 रुपये पहुंच गई, जिसकी CAGR 9.0 प्रतिशत रही। रिपोर्ट में कहा गया कि जीडीपी और नकदी वृद्धि दर के बीच 0.4 प्रतिशत का अंतर लगभग प्रति व्यक्ति यूपीआई लेनदेन के बराबर है, जो वित्त वर्ष 2026 में 1,301 रुपये रहा।एटीएम निकासी और नकदी भंडारण के आंकड़ों पर भी जोर
हालांकि रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रति व्यक्ति यूपीआई लेनदेन की तुलना सीधे नकदी से नहीं की जा सकती, क्योंकि एक व्यक्ति सुविधा के कारण कई बार यूपीआई ट्रांजैक्शन कर सकता है, जबकि नकदी लंबे समय तक पास रखी जा सकती है।रिपोर्ट में एटीएम निकासी और नकदी भंडारण के आंकड़ों पर भी जोर दिया गया है। इसमें कहा गया कि प्रति व्यक्ति चलन में नकदी और एटीएम से निकाली गई नकदी के बीच अंतर वित्त वर्ष 2024 में 1,804 रुपये था, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 9,127 रुपये हो गया। यानी दो वर्षों में यह अंतर पांच गुना बढ़ा है। एसबीआई रिसर्च का मानना है कि यह बढ़ोतरी लोगों द्वारा एहतियातन नकदी जमा रखने की प्रवृत्ति को दर्शाती है।
रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा वैश्विक तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण लोग अतिरिक्त नकदी रखना पसंद कर रहे हैं। इसी तरह का रुझान रुस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी देखा गया था।
500 रुपये के नोटों का है दबदबा
नोटों के प्रचलन पर रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में मूल्य के हिसाब से 500 रुपये के नोटों का दबदबा बना हुआ है। मार्च 2025 तक कुल चलन में नकदी मूल्य का 86 प्रतिशत हिस्सा 500 रुपये के नोटों का था, जो मार्च 2023 में 77 प्रतिशत था। इस असंतुलन को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों और व्हाइट लेबल एटीएम ऑपरेटरों को निर्देश दिया है कि वे एटीएम में नियमित रूप से 100 और 200 रुपये के नोट उपलब्ध कराएं।रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मार्च 2026 तक 100 रुपये के नोटों की हिस्सेदारी 6.2 प्रतिशत से बढ़कर 8.2 प्रतिशत हो गई है, जबकि 500 रुपये के नोटों की हिस्सेदारी करीब 86 प्रतिशत पर स्थिर बनी हुई है। इससे संकेत मिलता है कि छोटे मूल्यवर्ग के नोटों की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में कुछ सुधार हुआ है।
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