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Indo-China: चीनी कंपनियों के भारत आने से नहीं होगा भारतीय व्यापारियों को नुकसान, एमएसएमई सेक्टर को इस तरह बचाए

डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमित शर्मा Updated Thu, 15 Jan 2026 02:07 PM IST
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सार

केंद्र सरकार चीनी कंपनियों को भारतीय बाजार में सीधे निर्माण की अनुमति देने पर गंभीरता से विचार कर रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस रणनीतिक कदम से देश में पूंजी निवेश, रोजगार के नए अवसरों का सृजन और टैक्स राजस्व में वृद्धि हो सकती है, हालांकि घरेलू एमएसएमई सेक्टर और 'वोकल फॉर लोकल' अभियान पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर बहस भी जारी है। आइए इस बारे में विस्तार से जानें।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
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विस्तार
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केंद्र सरकार चीनी कंपनियों को भारतीय बाजार में सीधे निर्माण करने की अनुमति देने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यदि ऐसा होता है तो अब चीन की हजारों कंपनियां देश के विभिन्न क्षेत्रों में निर्माण करती हुई दिखाई दे सकती हैं। लेकिन इसी के साथ यह प्रश्न पूछा जाने लगा है कि क्या इससे भारतीय कंपनियों को नुकसान नहीं होगा? भारी पूंजी और सस्ते श्रम की बदौलत चीनी कंपनियों ने भारतीय कंपनियों के सामने तगड़ी चुनौती पेश की है। कई क्षेत्रों में भारतीय कंपनियां पूरी तरह चीनी कंपनियों के उत्पादों पर निर्भर हो गई हैं। ऐसे में क्या चीनी कंपनियों के भारतीय बाजार में सीधे आ जाने से भारत का एमएसएमई सेक्टर बुरी तरह प्रभावित नहीं होगा? 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं 'वोकल फॉर लोकल' की बात करते रहे हैं। उनकी अपील होती है कि लोग उन उत्पादों का उपयोग करें जो भारतीय कंपनियों के द्वारा भारत में निर्मित की गई हैं। इससे भारतीय कंपनियों को विदेशी कंपनियों के सामने मजबूती मिलेगी। लेकिन अब चीनी कंपनियों के सीधे भारतीय बाजारों में आने से देश की छोटी कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा? 
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आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी कंपनियों को भारतीय बाजार में सीधे प्रवेश देना कोई गलत निर्णय नहीं है। यह बहुत समझदारी भरा निर्णय है। इससे भारत में पूंजी निवेश होगा, नई नौकरियों का सृजन होगा और इन कंपनियों के द्वारा भारत से निर्यात किए जाने पर केंद्र सरकार को टैक्स के रूप में आय भी हासिल होगी। इस समय भी ऐपल, सैमसंग सहित दूसरी कंपनियों के भारत में निर्माण करने से केंद्र सरकार को अच्छी आय हो रही है। यही स्थिति चीन के मामले में भी हो सकती है। 

यह भी ध्यान दिए जाने के योग्य है कि चीनी कंपनियां सस्ता और उच्च गुणवत्ता का उत्पादन करने के मामले में लगातार आगे बढ़ रही हैं। यदि भारतीय कामगार इन कंपनियों में काम करते हैं तो इससे धीरे-धीरे भारतीय कंपनियों को भी उच्च गुणवत्ता के पदार्थ बनाने में महारथ हासिल होगी। यानी दूरगामी दृष्टि से यह निर्णय भारत के पक्ष में रहने वाला है। 

रणनीतिक क्षेत्रों में निवेश की अनुमति मिलने की संभावना नहीं

चीन को भारत में कितनी अनुमति मिलेगी, अभी यह पूरी तरह से साफ होना शेष है, लेकिन यह स्पष्ट है कि रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण सेक्टर में चीनी कंपनियों को निर्माण करने की अनुमति नहीं मिलेगी। लेकिन भारत उन सभी क्षेत्रों में चीन को निवेश-निर्माण की अनुमति दे सकता है, जिसमें भारत पिछड़ा हुआ है और इन क्षेत्रों में बड़े निवेश की आवश्यकता है।   

इन क्षेत्रों में निवेश होगा फायदेमंद

चीन खिलौने बनाने से लेकर मूर्तियां, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, मशीनों के निर्माण, सौर ऊर्जा उपकरणों को बनाने के क्षेत्र में बड़ी वैश्विक शक्ति बन चुका है, वह वाहन निर्माण के क्षेत्र में भी तेजी से दखल बढ़ा रहा है। कृषि के प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्माण और सस्ते निर्माण की सामग्रियों को बनाने में भी चीन बड़ी ताकत है। भारत की अपनी घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी आने वाले समय में इन सेक्टरों को मजबूत करने की आवश्यकता है। ऐसे में यदि चीन से इन क्षेत्रों में निवेश हासिल होता है तो यह भारत के लिए लाभ का सौदा साबित हो सकता है।

सोचा-समझा निर्णय- भाजपा 

आर्थिक मामलों के जानकार और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने अमर उजाला से कहा कि इस समय भी भारत कई क्षेत्रों में चीनी कंपनियों से मिलने वाले कच्चे माल पर निर्भर है। फार्मास्युटिकल सेक्टर, सौर ऊर्जा उपकरणों के साथ-साथ अनेक क्षेत्रों में चीन की लगभग मोनोपॉली है। भारतीय कंपनियां इन सेक्टर में उत्पादन के लिए चीन से ही कच्चा माल आयात करती हैं। इससे बड़ा लाभ चीन की कंपनियों को ही होता है। लेकिन यदि चीन की कंपनियां भारतीय बाजार में सीधे आकर निवेश करें और यहीं पर निर्माण करें तो इससे भारत में निवेश बढ़ेगा और नई नौकरियों का सृजन होगा।    

डॉ. गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि दुनिया के सभी देश दूसरे देशों से निवेश आकर्षित करने के लिए लगातार प्रयास करते हैं क्योंकि पूंजी आने से विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होता है, निवेश-रोजगार के अलावा तकनीकी हस्तांतरण से भी ऐसे देशों को लाभ होता है। भारत भी लंबे समय से इस राह पर चल रहा है और अमेरिका-रूस-जापान-जर्मनी सहित अनेक देशों से भारत निवेश प्राप्त करने का प्रयास करता रहता है। 

किस तरह होगी भारतीय सेक्टर की सुरक्षा

यदि भारतीय कंपनियां यहां निर्माण करेंगी तो छोटी भारतीय कंपनियों के हितों की सुरक्षा कैसे होगी? अमर उजाला के इस सवाल पर डॉ. गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार लगातार छोटे उद्यमियों को सशक्त करने के विभिन्न उपाय करती रही है। कर में छूट, सस्ता कर्ज देना और लाइसेंसिंग के विभिन्न चरणों को समाप्त कर सिंगल विंडो लाइसेंसिंग व्यवस्था कर इन्हें मजबूत किया जाता रहा है। आगामी बजट में भी केंद्र सरकार कई ऐसे उपायों की घोषणा कर सकती है जिससे भारत के एमएसएमई सेक्टर को मजबूत करने में सहायता मिल सके। 

उन्होंने कहा कि अभी यह देखना शेष है कि केंद्र सरकार चीन की किन कंपनियों को किस सेक्टर में किस स्तर का निवेश करने के लिए आमंत्रित कर रही है। लेकिन यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार अपने छोटे व्यापारियों, निवेशकों, कृषकों और कामगरों के हितों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित करने के बाद ही चीनी कंपनियों को निवेश की अनुमति देगी।

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