Jet Fuel Crisis: 2026 में क्यों महंगा होगा हवाई सफर? विमानन ईंधन संकट से 25% तक बढ़ सकता है किराया
मैकिन्जी की एक नई रिपोर्ट के अनुसार 2026 में विमानन ईंधन की कीमतों में भारी उछाल से देश में हवाई किराया 25 फीसदी तक बढ़ सकते हैं। आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।
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गर्मियों की छुट्टियों के सीजन में हवाई सफर की मांग बढ़ने के साथ ही यात्रियों की जेब पर भारी बोझ पड़ने के आसार हैं। भू-राजनीतिक तनाव और रिफाइनरियों में उत्पादन की कमी के कारण दुनियाभर में जेट फ्यूल (एविएशन टर्बाइन फ्यूल या एटीएफ) का संकट गहराने लगा है। कंसल्टिंग फर्म 'मैकिन्जी' की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस आपूर्ति संकट से एयरलाइंस की लागत तेजी से बढ़ रही है, जिसका सीधा असर टिकट के दामों पर पड़ेगा और हवाई किराया 25 फीसदी तक महंगा हो सकता है।
'क्रैक स्प्रेड' क्या है और यह कैसे बढ़ा रहा है खर्च?
हवाई ईंधन की कीमतों में यह उछाल मुख्य रूप से कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के ट्रेंड और 'क्रैक स्प्रेड' में वृद्धि के कारण आया है। आसान भाषा में समझें तो, कच्चे तेल और उससे रिफाइन होकर बनने वाले उत्पादों (जैसे जेट फ्यूल) की कीमत के बीच के अंतर को 'क्रैक स्प्रेड' कहा जाता है। ऐतिहासिक रूप से विमानन ईंधन का क्रैक स्प्रेड 20 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहता था, लेकिन 2026 में इसका औसत 50 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकता है।
दुनियाभर में हवाई ईंधन की सप्लाई क्यों घट रही है?
दुनिया की कुल 40 प्रतिशत जेट फ्यूल सप्लाई खाड़ी क्षेत्र और एशियाई देशों के निर्यातकों द्वारा की जाती है। मौजूदा समय में इन दोनों क्षेत्रों से सप्लाई बाधित हुई है:
- भू-राजनीतिक संघर्षों के बीच भारत, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े देशों ने अपने ईंधन निर्यात पर आंशिक प्रतिबंध लगा दिए हैं।
- दुनिया की कई रिफाइनरियां संकट से पहले ही अपनी अधिकतम क्षमता पर काम कर रही थीं, जिससे अब अतिरिक्त उत्पादन बढ़ाने की गुंजाइश लगभग खत्म हो गई है।
- आपूर्ति के इस बड़े अंतर को भरने के लिए फिलहाल मौजूदा स्टॉक का सहारा लिया जा रहा है, जो अब तेजी से घट रहा है।
हवाई यात्रियों की जेब पर कितना पड़ेगा सीधा असर?
किसी भी एयरलाइन के कुल खर्च में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ ईंधन का होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर जेट फ्यूल की लागत दोगुनी होती है और एयरलाइंस इस बढ़े हुए खर्च का बोझ सीधे ग्राहकों पर डालती हैं, तो हवाई टिकटों के दाम 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं। हालांकि रिफाइनरियों ने मुनाफे को देखते हुए उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन अन्य क्षेत्रों से मिलने वाली राहत भी मौजूदा कमी को पूरा करने के लिए नाकाफी है।
क्या भविष्य में किराए में कमी आने की कोई उम्मीद है?
मैकिन्जी की रिपोर्ट एक सकारात्मक संभावना जताती है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में टैंकरों की आवाजाही बढ़ती है, तो तत्काल प्रभाव से जेट फ्यूल की कीमतें नीचे आ सकती हैं। हालांकि, यह राहत लंबे समय तक नहीं टिकेगी। रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि देश अपने रणनीतिक भंडार को फिर से भरने और री-स्टॉकिंग में जुटे हैं, जिसकी वजह से सप्लाई चेन सामान्य होने के बाद भी अगले कई महीनों तक कीमतें उच्च स्तर पर ही बनी रहने की संभावना है।