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Chandigarh News: थर्मल की राख से बनी ढाल से रडार भी खा जाएगा चकमा
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चंडीगढ़। थर्मल पावर प्लांटों से निकलने वाली राख (फ्लाई ऐश) जिसे अब तक बेकार कचरा माना जाता था, अब देश की सुरक्षा मजबूत करने में काम आ सकती है। चंडीगढ़ के सीएसआईआर-सीएसआईओ के वैज्ञानिकों ने इस राख से ऐसा खास मैटेरियल तैयार किया है जो रडार की तरंगों को काफी हद तक अपने अंदर सोख लेता है। इससे विमान, सैन्य वाहन या अन्य रक्षा उपकरणों का पता लगाना मुश्किल हो सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में इस तकनीक का उपयोग स्टेल्थ विमान, सैन्य वाहनों, रक्षा उपकरणों, उपग्रहों, 5जी नेटवर्क और संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों में किया जा सकता है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल एमआरएस एडवांस में प्रकाशित हुआ है।
इस शोध को सीएसआईआर-सीएसआईओ के वैज्ञानिक डॉ. सचिन त्यागी और जर्मनी की रुहर यूनिवर्सिटी बोखुम के शोधकर्ता डॉ. गौतम बलहारा ने संयुक्त रूप से किया है। वैज्ञानिकों ने बिजलीघरों से निकलने वाली फ्लाई ऐश को निकेल-कोबाल्ट ऑक्साइड नैनोमैटेरियल के साथ मिलाकर विशेष कंपोजिट तैयार किया। विभिन्न वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद 75 प्रतिशत निकेल-कोबाल्ट ऑक्साइड और 25 प्रतिशत फ्लाई ऐश वाला मिश्रण सबसे प्रभावी पाया गया। इसने 10.02 गीगाहर्ट्ज़ पर -19.17 डेसिबल रिफ्लेक्शन लॉस दर्ज किया, यानी यह माइक्रोवेव ऊर्जा का बड़ा हिस्सा अपने भीतर सोख लेता है और बहुत कम ऊर्जा वापस लौटाता है। रडार तकनीक माइक्रोवेव तरंगों के लौटने के सिद्धांत पर काम करती है। जब तरंगें किसी वस्तु से टकराकर वापस लौटती हैं, तभी उसकी स्थिति का पता चलता है। नया मैटेरियल इन तरंगों को लौटाने के बजाय अपने भीतर अवशोषित कर लेता है। यही विशेषता इसे भविष्य की रडार-अवशोषक तकनीक के लिए उपयोगी बनाती है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका उपयोग केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। 5जी संचार, मोबाइल नेटवर्क, मेडिकल उपकरण, एयरोस्पेस सिस्टम और संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में होने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरफेरेंस को कम करने में भी यह मददगार हो सकता है। इससे उपकरणों की कार्यक्षमता और विश्वसनीयता दोनों बढ़ सकती हैं। रडार को कैसे देगा चकमा: रडार माइक्रोवेव तरंगें छोड़कर किसी वस्तु की पहचान करता है। सामान्य वस्तुएं तरंगों को वापस लौटा देती हैं। नया स्मार्ट मैटेरियल तरंगों को लौटाने के बजाय अपने भीतर अवशोषित कर लेता है। रडार तक बहुत कम सिग्नल लौटते हैं जिससे वस्तु का पता लगाना मुश्किल हो सकता है। यही तकनीक भविष्य की स्टेल्थ प्रणालियों की आधारशिला मानी जाती है।
इस शोध को सीएसआईआर-सीएसआईओ के वैज्ञानिक डॉ. सचिन त्यागी और जर्मनी की रुहर यूनिवर्सिटी बोखुम के शोधकर्ता डॉ. गौतम बलहारा ने संयुक्त रूप से किया है। वैज्ञानिकों ने बिजलीघरों से निकलने वाली फ्लाई ऐश को निकेल-कोबाल्ट ऑक्साइड नैनोमैटेरियल के साथ मिलाकर विशेष कंपोजिट तैयार किया। विभिन्न वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद 75 प्रतिशत निकेल-कोबाल्ट ऑक्साइड और 25 प्रतिशत फ्लाई ऐश वाला मिश्रण सबसे प्रभावी पाया गया। इसने 10.02 गीगाहर्ट्ज़ पर -19.17 डेसिबल रिफ्लेक्शन लॉस दर्ज किया, यानी यह माइक्रोवेव ऊर्जा का बड़ा हिस्सा अपने भीतर सोख लेता है और बहुत कम ऊर्जा वापस लौटाता है। रडार तकनीक माइक्रोवेव तरंगों के लौटने के सिद्धांत पर काम करती है। जब तरंगें किसी वस्तु से टकराकर वापस लौटती हैं, तभी उसकी स्थिति का पता चलता है। नया मैटेरियल इन तरंगों को लौटाने के बजाय अपने भीतर अवशोषित कर लेता है। यही विशेषता इसे भविष्य की रडार-अवशोषक तकनीक के लिए उपयोगी बनाती है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका उपयोग केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। 5जी संचार, मोबाइल नेटवर्क, मेडिकल उपकरण, एयरोस्पेस सिस्टम और संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में होने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरफेरेंस को कम करने में भी यह मददगार हो सकता है। इससे उपकरणों की कार्यक्षमता और विश्वसनीयता दोनों बढ़ सकती हैं। रडार को कैसे देगा चकमा: रडार माइक्रोवेव तरंगें छोड़कर किसी वस्तु की पहचान करता है। सामान्य वस्तुएं तरंगों को वापस लौटा देती हैं। नया स्मार्ट मैटेरियल तरंगों को लौटाने के बजाय अपने भीतर अवशोषित कर लेता है। रडार तक बहुत कम सिग्नल लौटते हैं जिससे वस्तु का पता लगाना मुश्किल हो सकता है। यही तकनीक भविष्य की स्टेल्थ प्रणालियों की आधारशिला मानी जाती है।
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