गैस संकट ने शहर के कैटरिंग और वेडिंग इंडस्ट्री की कमर तोड़ दी है। शादियों के सीजन के बीच गैस की किल्लत ने कैटरर्स के सामने करो या मरो की स्थिति पैदा कर दी है। कैटरर्स और वेडिंग प्लानर्स का कहना है कि जब ईंधन ही नहीं पकवान कैसे तैयार होंगे। हालत यह है कि पिछले एक महीने में शादियों और बड़े आयोजनों से होने वाला व्यापार 50 फीसदी तक गिर गया है।
LPG Crisis: चंडीगढ़ में बिगड़े हालात, शादियों पर संकट; कैटरिंग-वेडिंग इंडस्ट्री का व्यापार 50% तक गिरा
चंडीगढ़ में गैस की कालाबाजारी चरम पर है। हालात यह हैं कि 923 रुपये में मिलने वाला सिलिंडर अब ढाई से तीन हजार रुपये में मिल रहा है। वहीं, कॉमर्शियल सिलिंडर के रेट्स करीब चार हजार रुपये तक पहुंच चुके हैं।
सिलिंडर की कालाबाजारी, तीन हजार रुपये में मिल रही गैस
चंडीगढ़ में गैस की कालाबाजारी चरम पर है। हालात यह हैं कि 923 रुपये में मिलने वाला सिलिंडर अब ढाई से तीन हजार रुपये में मिल रहा है। वहीं, कॉमर्शियल सिलिंडर के रेट्स करीब चार हजार रुपये तक पहुंच चुके हैं। चंडीगढ़ के एक उपभोक्ता राजिंदर कुमार ने इस मामले में चंडीगढ़ की गैस एजेंसियों की जांच करने की मांग की है। जिसमें स्पष्ट किया गया है कि न सिर्फ ग्राहकों से डिलीवरी चार्ज वसूले जा रहे हैं बल्कि पर्ची न होने की सूरत में उनको पच्चीस सौ से तीन हजार रुपये में सिलिंडर उपलब्ध करवाया जा रहा है। उन्होंने प्रशासक के नाम लिखे गए पत्र में ऐसी गैस एजेंसियों की विजिलेंस से जांच करवाने की मांग की है।
गैस की किल्लत: लकड़ी और उपले पर खाना बनना शुरू
गैस सिलिंडर की परेशानी के कारण लोग लकड़ी और उपले पर खाना बनाना शुरू कर दिया है। गांव कैंबवाला के एक परिवार के पास अमर उजाला पहुंची। शाम में पोते पोतियों के साथ बैठकर किचन में खाना तैयार कर रही निर्मला देवी ने कहा कि जब गैस की किल्लत है तो उपले और लकड़ी पर खाना बनाना शुरू कर दी हूं। घर में बेटा, बहु पोते पोतियां मिलाकर 12 सदस्य हैं। महीना में करीब 2 सिलिंडर की खपत होती है। अब जब गैस की किल्लत बढ़ी तो लकड़ी और उपले पर खाना बनाना शुरू कर दी हूं। गैस सिलिंडर का बचाव कर रही हूं ताकि संकट के समय यह काम आए।
निर्मला देवी का कहना है कि पहले पशुओं के गोबर खेतों में डालते थे लेकिन गैस की समस्या आई तो अब उसका उपला बनाना शुरू कर दिया। सर्दियों में तो मक्की रोटी और सरसों का साग लकड़ी और उपले पर ही तैयार करते थे। ठंड से बचाव था। अब गैस बचाने के लिए यह गरमी में करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि पशुबाड़ा में ही उपले बनाते हैं। जरूरत के अनुसार घर में लाते हैं। खेतों में पेड़ लगे हैं उसकी टहनियों से खाना बनाने का काम होता है।
क्लाउड किचन का काम मंदा, डिलीवरी ब्वाय की दिहाड़ी कम
सिटी ब्यूटीफुल का फूड बिजनेस कभी आधी रात तक गुलजार रहता था। गैस की किल्लत और सिलेंडर की कालाबाजारी की वजह से मंदा हो गया है। सेक्टर-26, 35 और आईटी पार्क के क्लाउड किचन जो ऑनलाइन डिलीवरी पर निर्भर थे अब ऑफलाइन होने की कगार पर हैं। इसका ज्यादा असर डिलीवरी ब्वाय पर पड़ा है। जिनकी दिहाड़ी अब आधी रह गी है।
गैस सप्लाई चेन टूटने से शहर के करीब सौ से ज्यादा क्लाउड किचन प्रभावित हुए हैं। कॉमर्शियल सिलेंडर न मिलने से छोटे स्टार्टअप्स और होम-शेफ्स ने जोमैटो-स्विगी पर अपनी मौजूदगी कम कर दी है। ऐसे में जो किचन दिन भर में 100 ऑर्डर निकालते थे वहां बमुश्किल 15-20 ऑर्डर आ रहे हैं।
15,000 वाली नौकरी 5,000 पर सिमटी
मंडी और रेस्टोरेंट्स में काम करने वाले हेल्पर, कुक और सफाई कर्मचारियों की हालत सबसे ज्यादा दयनीय है। रेस्टोरेंट मालिकों ने काम कम होने के कारण स्टाफ भी कम कर दिया है। पहले जो कारीगर अपना काम करके महीने के 15,000 से 18,000 रुपये तक कमा लेते थे वह अब गैस न मिलने के कारण आमदनी 5,000 से 6,000 रुपये तक रह गई है।
शहर के मुख्य बाजारों के रेस्टोरेंट अब पीक आवर्स में भी ऑफलाइन मोड में दिख रहे हैं। गैस बचाने के चक्कर में कई आउटलेट्स ने अपना मेन्यू छोटा कर दिया है। तवा और कड़ाही का काम बंद कर अब केवल तंदूर आधारित डिशेज पर जोर दिया जा रहा है, जिससे किचन में काम करने वाले आधे स्टाफ की जरूरत ही खत्म हो गई है।
बिगड़ा जायका, कैटरर्स बोले- गैस नहीं तो कैसे पकेगा खाना, शादी-ब्याह का कारोबार 50 फीसदी लुढ़क गया
गैस संकट ने शहर के कैटरिंग और वेडिंग इंडस्ट्री की कमर तोड़ दी है। शादियों के सीजन के बीच गैस की किल्लत ने कैटरर्स के सामने करो या मरो की स्थिति पैदा कर दी है। कैटरर्स और वेडिंग प्लानर्स का कहना है कि जब ईंधन ही नहीं पकवान कैसे तैयार होंगे। हालत यह है कि पिछले एक महीने में शादियों और बड़े आयोजनों से होने वाला व्यापार 50 फीसदी तक गिर गया है।
चंडीगढ़ में नियमों का हवाला देते हुए होटेलियर्स और रेस्टोरेंट मालिकों ने कहा कि अगर डीजल भट्टी या लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है तो पॉल्यूशन वाले पहुंच जाते हैं और पेनल्टी लगा देते हैं। इसलिए सीमित काम ही उठा रहे हैं जिससे ग्राहकों को सेवा तो दे सकें।
कैटरर्स का कहना है कि एक औसत शादी के फंक्शन के लिए कम से कम 5 से 8 कमर्शियल सिलेंडरों की जरूरत होती है। एजेंसी और सप्लायर्स की ओर से केवल 1 या 2 सिलेंडर ही मुहैया कराए जा रहे हैं। फिलहाल कैटरर्स को मजबूरी में चूल्हों और लकड़ियों का सहारा लेना पड़ रहा है। गैस न मिलने और बढ़ती लागत के कारण कई छोटे कैटरर्स ने पुरानी बुकिंग रद्द करना शुरू कर दिया है। कई कैटरर्स ने प्रति प्लेट का खर्च 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है।