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Punjab: पार्ट-टाइम लेक्चरर्स के बकाया पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार को छह हफ्ते में फैसला लेने का निर्देश
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Thu, 09 Apr 2026 03:14 PM IST
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सार
याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि राज्य के सरकारी कॉलेजों में कार्यरत ये पार्ट-टाइम लेक्चरर्स वर्ष 1996 से सेवाएं दे रहे हैं। उच्च शिक्षा प्रणाली में अहम योगदान के बावजूद इन्हें अब तक उनके वैध वित्तीय लाभों से वंचित रखा गया है।
पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब के सरकारी कॉलेजों में कार्यरत पार्ट टाइम लेक्चरर्स/असिस्टेंट प्रोफेसर्स के काफी समय से लंबित वित्तीय बकाये के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को न्यूनतम वेतनमान, महंगाई भत्ता और ग्रेड पे से जुड़े मुद्दों पर छह सप्ताह में अंतिम निर्णय लेने का आदेश दिया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि राज्य के सरकारी कॉलेजों में कार्यरत ये पार्ट-टाइम लेक्चरर्स वर्ष 1996 से सेवाएं दे रहे हैं। उच्च शिक्षा प्रणाली में अहम योगदान के बावजूद इन्हें अब तक उनके वैध वित्तीय लाभों से वंचित रखा गया है। छठे वेतन आयोग के दौरान भी इन शिक्षकों के एरियर का भुगतान अनावश्यक रूप से रोका गया था।
अदालत ने देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। इसके बाद 7 अगस्त 2024 को हाईकोर्ट ने देरी से एरियर भुगतान पर ब्याज देने के निर्देश दिए थे जिसे बाद में सरकार ने अदा किया। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि अब सातवें वेतन आयोग के तहत 1 जनवरी 2016 से लागू संशोधित वेतनमान का लाभ भी उन्हें समय पर नहीं दिया गया है जो पहले जैसी ही लापरवाही को दर्शाता है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने बताया कि मामला फिलहाल वित्त विभाग के विचाराधीन है और निर्णय के लिए समय मांगा। अदालत ने सरकार को छह सप्ताह की अंतिम मोहलत देते हुए निर्देश दिया कि इस अवधि में अंतिम फैसला लिया जाए।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की है कि छठे और सातवें वेतन आयोग के दौरान एरियर रोकने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और उनके खिलाफ कार्रवाई हो। मामले की अगली सुनवाई 26 मई को होगी।
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याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि राज्य के सरकारी कॉलेजों में कार्यरत ये पार्ट-टाइम लेक्चरर्स वर्ष 1996 से सेवाएं दे रहे हैं। उच्च शिक्षा प्रणाली में अहम योगदान के बावजूद इन्हें अब तक उनके वैध वित्तीय लाभों से वंचित रखा गया है। छठे वेतन आयोग के दौरान भी इन शिक्षकों के एरियर का भुगतान अनावश्यक रूप से रोका गया था।
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अदालत ने देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। इसके बाद 7 अगस्त 2024 को हाईकोर्ट ने देरी से एरियर भुगतान पर ब्याज देने के निर्देश दिए थे जिसे बाद में सरकार ने अदा किया। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि अब सातवें वेतन आयोग के तहत 1 जनवरी 2016 से लागू संशोधित वेतनमान का लाभ भी उन्हें समय पर नहीं दिया गया है जो पहले जैसी ही लापरवाही को दर्शाता है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने बताया कि मामला फिलहाल वित्त विभाग के विचाराधीन है और निर्णय के लिए समय मांगा। अदालत ने सरकार को छह सप्ताह की अंतिम मोहलत देते हुए निर्देश दिया कि इस अवधि में अंतिम फैसला लिया जाए।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की है कि छठे और सातवें वेतन आयोग के दौरान एरियर रोकने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और उनके खिलाफ कार्रवाई हो। मामले की अगली सुनवाई 26 मई को होगी।