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Highcourt: 27 साल की सेवा को नजरअंदाज कर बर्खास्तगी अत्यधिक कठोर सजा, मृतक सिपाही की पत्नी को दें पेंशन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Tue, 03 Mar 2026 07:56 AM IST
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सार
जस्टिस जगमोहन बंसल ने आदेश में कहा कि 27 वर्ष की सेवा और पेंशन के वैधानिक अधिकार पर विचार किए बिना दी गई बर्खास्तगी असंगत है।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की बर्खास्तगी जैसी कठोर सजा केवल गंभीर या अक्षम्य आचरण के मामलों में ही दी जानी चाहिए। झज्जर के एक मृतक सिपाही की बर्खास्तगी को संशोधित कर हाईकोर्ट ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया और उसकी विधवा को 1 मार्च से पेंशन देने का आदेश दिया है।
जस्टिस जगमोहन बंसल ने आदेश में कहा कि 27 वर्ष की सेवा और पेंशन के वैधानिक अधिकार पर विचार किए बिना दी गई बर्खास्तगी असंगत है। याचिकाकर्ता के पति ने 31 अगस्त 1992 को सिपाही के रूप में पुलिस बल जॉइन किया था।
वर्ष 2018 में 212 दिनों तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहने पर सिपाही को सेवा से बर्खास्त कर दिया था। बाद में डीजीपी के समक्ष पुनरीक्षण के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। अक्तूबर 2020 में डीजीपी ने भी पुनरीक्षण खारिज कर दिया। इसके बाद विधवा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
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जस्टिस जगमोहन बंसल ने आदेश में कहा कि 27 वर्ष की सेवा और पेंशन के वैधानिक अधिकार पर विचार किए बिना दी गई बर्खास्तगी असंगत है। याचिकाकर्ता के पति ने 31 अगस्त 1992 को सिपाही के रूप में पुलिस बल जॉइन किया था।
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वर्ष 2018 में 212 दिनों तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहने पर सिपाही को सेवा से बर्खास्त कर दिया था। बाद में डीजीपी के समक्ष पुनरीक्षण के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। अक्तूबर 2020 में डीजीपी ने भी पुनरीक्षण खारिज कर दिया। इसके बाद विधवा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।