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Chandigarh News: कुत्ते की भूख से मौत मामले में डॉग स्क्वॉड इंचार्ज को नहीं मिली राहत

Tue, 14 Jul 2026 02:26 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Tue, 14 Jul 2026 02:26 AM IST
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No relief for dog squad in-charge in case involving dog's death due to starvation.
चंडीगढ़। हरियाणा पुलिस के डॉग स्क्वॉड में तैनात एक पुलिस कुत्ते की वर्ष 2007 में लापरवाही के चलते हुई मौत के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने करीब दो दशक बाद भी तत्कालीन डॉग स्क्वॉड इंचार्ज को राहत देने से इन्कार कर दिया। अदालत ने विभागीय कार्रवाई के तहत दी गई चार वार्षिक वेतनवृद्धियां स्थायी रूप से रोकने की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि किसी कर्मचारी को उसके पद और जिम्मेदारी के अनुसार अलग दंड देना भेदभाव नहीं माना जा सकता।
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जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस अमरिंदर सिंह ग्रेवाल की खंडपीठ ने इंचार्ज के निधन के बाद उनके कानूनी प्रतिनिधियों की ओर से दायर अपील खारिज कर दी। अपील में वर्ष 2013 के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें एकल पीठ ने भी विभागीय सजा को सही ठहराया था।
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मामले के अनुसार, वर्ष 2007 में अपीलकर्ता हरियाणा पुलिस की स्टेट क्राइम ब्रांच, पंचकूला के डॉग स्क्वॉड के इंचार्ज थे। उस समय संबंधित पुलिस कुत्ते का नियमित हैंडलर छुट्टी पर था। ऐसे में उसकी देखभाल की जिम्मेदारी एक कांस्टेबल को सौंपी गई। विभागीय नियमों के मुताबिक सभी पुलिस कुत्तों का हर 15 दिन में स्वास्थ्य परीक्षण कराना, उनका वजन दर्ज करना और इसकी रिपोर्ट वरिष्ठ अधिकारियों को भेजना अनिवार्य था। 7 और 8 मई 2007 की रात पुलिस कुत्ते की मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि उसे लगातार तीन दिन तक भोजन नहीं मिला था। भूखे रहने के कारण उसके पेट में गैस भर गई जिससे कंजेस्टिव हार्ट फेल्योर हुआ और उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद इंचार्ज और कांस्टेबल के खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई। जांच में समय पर भोजन उपलब्ध नहीं कराने, नियमित स्वास्थ्य जांच नहीं कराने और वजन की निगरानी में लापरवाही के आरोप साबित हुए। इसके बाद दोनों की चार-चार वार्षिक वेतनवृद्धियां स्थायी रूप से रोकने की सजा दी गई।
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अपीलकर्ता ने दलील दी कि बाद में पुलिस महानिदेशक ने कांस्टेबल की सजा घटाकर दो वार्षिक वेतनवृद्धियां अस्थायी रूप से रोकने तक सीमित कर दी जबकि उसकी सजा में कोई राहत नहीं दी गई इसलिए उसके साथ भेदभाव हुआ है। हाईकोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की। अदालत ने कहा कि विभागीय मामलों में सजा तय करते समय कर्मचारी के पद, उसकी जिम्मेदारी और लापरवाही की गंभीरता को देखा जाता है। दोनों कर्मचारियों की जिम्मेदारियां अलग थीं, इसलिए उन्हें अलग-अलग दंड देना पूरी तरह उचित है।
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