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सुप्रीम कोर्ट सख्त: जीआरडीआरसी के स्टे रद्द, प्रशासन को फटकार
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चंडीगढ़। स्ट्रीट वेंडरों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चंडीगढ़ प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए जीआरडीआरसी (ग्रीवेंस रिड्रेसल एंड डिस्प्यूट रेजोल्यूशन कमेटी) की ओर से वेंडरों को दिए जा रहे स्टे पर रोक लगा दी। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने प्रशासन से पूछा कि जब स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट के तहत अपीलीय प्राधिकरण मेयर हैं तो जीआरडीआरसी किस अधिकार से स्टे दे रही है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि मेयर ने अब तक लंबित अपीलों की सुनवाई क्यों नहीं की।
सुनवाई के दौरान प्रशासन की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने जवाब दाखिल करने के लिए एक माह का समय मांगा लेकिन अदालत ने स्पष्ट कहा कि इतने लंबे समय की अनुमति नहीं दी जा सकती। खंडपीठ ने जीआरडीआरसी की ओर से दिए गए स्टे प्रभावहीन करने के साथ प्रशासन से अपने पूर्व आदेशों के अनुपालन की रिपोर्ट भी तलब कर ली। एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता अनंत विजय पल्ली ने अदालत को बताया कि प्रशासन की ओर से गठित जीआरडीआरसी के चेयरमैन और सदस्य अब भी स्ट्रीट वेंडरों को स्टे दे रहे हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह पक्ष मुख्य रूप से गोरंग गोयल ने रखा, जबकि प्रशासन की ओर से अधिवक्ता श्रीकांत नीलप्पा ट्रेडल, शुभम भल्ला और अन्य ने पैरवी की।
खंडपीठ ने कहा कि वैध स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है लेकिन प्रशासन की जिम्मेदारी वेंडिंग जोन में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना और अदालत के आदेशों को लागू कराना भी है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक सड़कों और स्थानों पर अवैध अतिक्रमण किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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मनीमाजरा व्यापार मंडल के अध्यक्ष मलकीयत सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रशासन को धीमी कार्रवाई के लिए भी फटकार लगाई। अदालत ने दोहराया कि कोविड काल में जिन वेंडरों को ''''एसेंशियल सर्विस प्रोवाइडर'''' का दर्जा दिया गया था, उससे जुड़े संशोधन पहले ही निरस्त किए जा चुके हैं। ऐसे सभी वेंडरों को उनकी पूर्व स्थिति में रखते हुए निर्धारित स्थानों पर बैठाया जाए।
अदालत ने कहा कि शहर में सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर अवैध वेंडिंग हटाना प्रशासन की जिम्मेदारी है और उसके पूर्व आदेशों का पालन हर हाल में सुनिश्चित किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता मलकीयत सिंह का कहना है कि अभी तक कई आदेशों का पालन नहीं हुआ और न ही उन्हें सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि अगली सुनवाई में आदेशों के पालन की प्रगति का विस्तृत ब्यौरा मांगा जाएगा।
सुनवाई के दौरान प्रशासन की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने जवाब दाखिल करने के लिए एक माह का समय मांगा लेकिन अदालत ने स्पष्ट कहा कि इतने लंबे समय की अनुमति नहीं दी जा सकती। खंडपीठ ने जीआरडीआरसी की ओर से दिए गए स्टे प्रभावहीन करने के साथ प्रशासन से अपने पूर्व आदेशों के अनुपालन की रिपोर्ट भी तलब कर ली। एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता अनंत विजय पल्ली ने अदालत को बताया कि प्रशासन की ओर से गठित जीआरडीआरसी के चेयरमैन और सदस्य अब भी स्ट्रीट वेंडरों को स्टे दे रहे हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह पक्ष मुख्य रूप से गोरंग गोयल ने रखा, जबकि प्रशासन की ओर से अधिवक्ता श्रीकांत नीलप्पा ट्रेडल, शुभम भल्ला और अन्य ने पैरवी की।
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खंडपीठ ने कहा कि वैध स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है लेकिन प्रशासन की जिम्मेदारी वेंडिंग जोन में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना और अदालत के आदेशों को लागू कराना भी है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक सड़कों और स्थानों पर अवैध अतिक्रमण किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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मनीमाजरा व्यापार मंडल के अध्यक्ष मलकीयत सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रशासन को धीमी कार्रवाई के लिए भी फटकार लगाई। अदालत ने दोहराया कि कोविड काल में जिन वेंडरों को ''''एसेंशियल सर्विस प्रोवाइडर'''' का दर्जा दिया गया था, उससे जुड़े संशोधन पहले ही निरस्त किए जा चुके हैं। ऐसे सभी वेंडरों को उनकी पूर्व स्थिति में रखते हुए निर्धारित स्थानों पर बैठाया जाए।
अदालत ने कहा कि शहर में सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर अवैध वेंडिंग हटाना प्रशासन की जिम्मेदारी है और उसके पूर्व आदेशों का पालन हर हाल में सुनिश्चित किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता मलकीयत सिंह का कहना है कि अभी तक कई आदेशों का पालन नहीं हुआ और न ही उन्हें सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि अगली सुनवाई में आदेशों के पालन की प्रगति का विस्तृत ब्यौरा मांगा जाएगा।