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Chandigarh News: संघर्ष को बनाया ताकत... समाज को राह दिखा रहीं महिलाएं
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चंडीगढ़। इस फोटो में मौजूद हर महिला के जीवन में संघर्ष की अपनी एक अलग कहानी है। ऐसी कहानियां जो हर किसी को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। किसी के माता-पिता पाकिस्तान से आए थे और नई जमीन पर अपनी जिंदगी को संभालने के लिए संघर्ष कर रहे थे। किसी की कम उम्र में शादी हो गई थी जहां उसे परिवार के साथ सामंजस्य बिठाते हुए बच्चों की परवरिश के साथ-साथ अपना कॅरिअर भी बनाना था। समय ने करवट ली और इन सभी महिलाओं ने संघर्ष को ताकत बनाकर जीवन में मुकाम हासिल किया। आज ये महिलाएं समाज में बड़े पदों पर रहकर न केवल अपनी पहचान बना रही हैं बल्कि समाज को नई दिशा देने का काम भी कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर शनिवार को अमर उजाला कार्यालय में अपराजिता कार्यक्रम में अलग-अलग क्षेत्र की महिलाएं शामिल हुई। यहां उन्होंने अपनी कहानियां सांझा कीं।
पिता के भरोसे का रखा मान
सेक्टर-26 के एसजीजीएस कॉलेज की डॉ. कमलजीत कौर ने कहा कि पिता ने सभी से लड़कर पढ़ने के लिए घर से बाहर भेजा और कहा कि मेरी पग का मान रखना। उनके भरोसे को कमलजीत ने हमेशा दिमाग में रखा। पीएचडी पूरी की और पूरे परिवार में पहली महिला बनी जिनके नाम के साथ डॉक्टर लगा। पिता की ही पसंद से उनकी शादी हुई और वह कॉलेज में प्रोफेसर हैं।
शिक्षक को देखकर अपना सपना पूरा किया
लेखिका विमला गुगलानी ने कहा कि उनका परिवार पाकिस्तान से आया था। जब पापा ने 10वीं पास की, तब मेरा स्कूल शुरू हुआ। पिता की नौकरी बैंक में लग गई। इसलिए पिता ने मुझे भी पढ़ाया। टीचर को देखकर सपना देखा और मेहनत की। उसके बाद पंजाब सरकार में मेरी टीचर की नौकरी लगी। पढ़ने लिखने का बचपन से शौक था, इसलिए रिटायरमेंट के बाद 11 किताबें लिख डाली।
कैंसर को दी मात, सास की परेशानी में भी मदद
कैंसर को हराने वाली अलका जग्गी और शारदा जग्गी भी पहुंची। अलका ने बताया कि पहले उन्हें कैंसर हुआ था तब उनकी बेटी 7 साल की थी। कैंसर के कारण उन्हें मुंबई में ट्रीटमेंट के चलते जॉब भी छोड़नी पड़ी। उन्होंने कहा कि हर 18 दिन के बाद वह मुंबई में अकेले ट्रैवल करती थी, क्योंकि उनके पति को जॉब पर जाना होता था। उनके ठीक होने के बाद सास भी कैंसर से ग्रस्त हुई लेकिन उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं आई, क्योंकि अलका ने उन्हें कैंसर से लड़ने में मदद की।
बेटियों को खेलों में डालें... अनुशासन सिखाता है
इंटरनेशनल बैडमिंटन प्लेयर सरगुन अरोड़ा ने कहा कि यहां तक पहुंचाने के लिए उन्हें परिवार के साथ समय बिताने, फेस्टिवल और खाने पीने की चीजों का त्याग करना पड़ा। उन्होंने कहा कि संघर्ष हर महिला के साथ चलता है लेकिन उससे लड़ने की जरूरत है। उन्होंने सभी से अपनी बेटियों को खेलों में डालने का आह्वान किया क्योंकि खेल लड़कियों को गिरकर उठना और अनुशासन में रहना सिखाते हैं। पति की मौत के बाद तनाव में होते हुए भी वह 55 की उम्र में इंडिया के लिए मेडल लाई।
... तो चुनौती अवसर के रूप में दिखाई देगी
एसडी कॉलेज की डॉ. प्रिया चड्ढा ने कहा कि यदि हम मानसिक रूप से स्वस्थ रहकर टाइम मैनेजमेंट सीख जाएं तो हमें कोई भी चुनौती अवसर के रूप में दिखाई देगी क्योंकि हर एक चैलेंज हमें चमकाने के लिए होता है।
पैरेंट्स और कोच के सहयोग बनी गोल्ड मेडलिस्ट
इंटरनेशनल प्लेयर अक्षिता शर्मा ने कहा कि 12वीं कक्षा के दौरान उनकी एक गेम थी तभी उनकी नाक की हड्डी टूट गई और उनके ऊपर पढ़ाई के साथ गेम की प्रैक्टिस का भी दबाव था, लेकिन उनके कोच और माता-पिता के सहयोग ने उन्हें गोल्ड मेडलिस्ट बना दिया।
बचपन से ही हर किसी का दर्द महसूस करती थी
राखी शर्मा ने कहा कि वह बचपन से ही हर किसी का दर्द महसूस करती थी। इसलिए उन्होंने भारत विकास परिषद के साथ हरासमेंट के 18 केस सॉल्व किए हैं। वह कीर्तन करके पैसा कमाकर गरीब बच्चों की पढ़ाई में सहायता करती हैं। इसके अलावा वह महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी कार्य कर रही है।
कामयाबी के पीछे बड़े भाई और पति का बड़ा हाथ
सेक्टर 36 देव समाज की डॉ. शिखा ने कहा कि शिक्षा ने उन्हें सम्मान दिलाया है। अपनी कामयाबी के पीछे वह अपने बड़े भाई और पति का बहुत बड़ा हाथ मानती हैं। उनके भाई ने विश्वास करके उन्हें अमृतसर में पढ़ने भेजा और पति के सहयोग ने उन्हें टीचर बना दिया।
सहयोग से हर चुनौती छोटी
एजीजीएस-26 की डॉ. गुरशिक कौर ने कहा कि उन्हें परिवार का पूरा सहयोग रहा। उन्होंने कहा कि परिवार का विश्वास और खुद पर विश्वास होना जरूरी है इससे हर चुनौती छोटी लगती है।
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पिता के भरोसे का रखा मान
सेक्टर-26 के एसजीजीएस कॉलेज की डॉ. कमलजीत कौर ने कहा कि पिता ने सभी से लड़कर पढ़ने के लिए घर से बाहर भेजा और कहा कि मेरी पग का मान रखना। उनके भरोसे को कमलजीत ने हमेशा दिमाग में रखा। पीएचडी पूरी की और पूरे परिवार में पहली महिला बनी जिनके नाम के साथ डॉक्टर लगा। पिता की ही पसंद से उनकी शादी हुई और वह कॉलेज में प्रोफेसर हैं।
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शिक्षक को देखकर अपना सपना पूरा किया
लेखिका विमला गुगलानी ने कहा कि उनका परिवार पाकिस्तान से आया था। जब पापा ने 10वीं पास की, तब मेरा स्कूल शुरू हुआ। पिता की नौकरी बैंक में लग गई। इसलिए पिता ने मुझे भी पढ़ाया। टीचर को देखकर सपना देखा और मेहनत की। उसके बाद पंजाब सरकार में मेरी टीचर की नौकरी लगी। पढ़ने लिखने का बचपन से शौक था, इसलिए रिटायरमेंट के बाद 11 किताबें लिख डाली।
कैंसर को दी मात, सास की परेशानी में भी मदद
कैंसर को हराने वाली अलका जग्गी और शारदा जग्गी भी पहुंची। अलका ने बताया कि पहले उन्हें कैंसर हुआ था तब उनकी बेटी 7 साल की थी। कैंसर के कारण उन्हें मुंबई में ट्रीटमेंट के चलते जॉब भी छोड़नी पड़ी। उन्होंने कहा कि हर 18 दिन के बाद वह मुंबई में अकेले ट्रैवल करती थी, क्योंकि उनके पति को जॉब पर जाना होता था। उनके ठीक होने के बाद सास भी कैंसर से ग्रस्त हुई लेकिन उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं आई, क्योंकि अलका ने उन्हें कैंसर से लड़ने में मदद की।
बेटियों को खेलों में डालें... अनुशासन सिखाता है
इंटरनेशनल बैडमिंटन प्लेयर सरगुन अरोड़ा ने कहा कि यहां तक पहुंचाने के लिए उन्हें परिवार के साथ समय बिताने, फेस्टिवल और खाने पीने की चीजों का त्याग करना पड़ा। उन्होंने कहा कि संघर्ष हर महिला के साथ चलता है लेकिन उससे लड़ने की जरूरत है। उन्होंने सभी से अपनी बेटियों को खेलों में डालने का आह्वान किया क्योंकि खेल लड़कियों को गिरकर उठना और अनुशासन में रहना सिखाते हैं। पति की मौत के बाद तनाव में होते हुए भी वह 55 की उम्र में इंडिया के लिए मेडल लाई।
... तो चुनौती अवसर के रूप में दिखाई देगी
एसडी कॉलेज की डॉ. प्रिया चड्ढा ने कहा कि यदि हम मानसिक रूप से स्वस्थ रहकर टाइम मैनेजमेंट सीख जाएं तो हमें कोई भी चुनौती अवसर के रूप में दिखाई देगी क्योंकि हर एक चैलेंज हमें चमकाने के लिए होता है।
पैरेंट्स और कोच के सहयोग बनी गोल्ड मेडलिस्ट
इंटरनेशनल प्लेयर अक्षिता शर्मा ने कहा कि 12वीं कक्षा के दौरान उनकी एक गेम थी तभी उनकी नाक की हड्डी टूट गई और उनके ऊपर पढ़ाई के साथ गेम की प्रैक्टिस का भी दबाव था, लेकिन उनके कोच और माता-पिता के सहयोग ने उन्हें गोल्ड मेडलिस्ट बना दिया।
बचपन से ही हर किसी का दर्द महसूस करती थी
राखी शर्मा ने कहा कि वह बचपन से ही हर किसी का दर्द महसूस करती थी। इसलिए उन्होंने भारत विकास परिषद के साथ हरासमेंट के 18 केस सॉल्व किए हैं। वह कीर्तन करके पैसा कमाकर गरीब बच्चों की पढ़ाई में सहायता करती हैं। इसके अलावा वह महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी कार्य कर रही है।
कामयाबी के पीछे बड़े भाई और पति का बड़ा हाथ
सेक्टर 36 देव समाज की डॉ. शिखा ने कहा कि शिक्षा ने उन्हें सम्मान दिलाया है। अपनी कामयाबी के पीछे वह अपने बड़े भाई और पति का बहुत बड़ा हाथ मानती हैं। उनके भाई ने विश्वास करके उन्हें अमृतसर में पढ़ने भेजा और पति के सहयोग ने उन्हें टीचर बना दिया।
सहयोग से हर चुनौती छोटी
एजीजीएस-26 की डॉ. गुरशिक कौर ने कहा कि उन्हें परिवार का पूरा सहयोग रहा। उन्होंने कहा कि परिवार का विश्वास और खुद पर विश्वास होना जरूरी है इससे हर चुनौती छोटी लगती है।