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वनांचल के बच्चों की पढ़ाई पर संकट: छत्तीसगढ़ में झोपड़ी बनाकर मजबूरन पढ़ रहे मासूम, हरदम मंडराता रहता है खतरा
Fri, 19 Sep 2025 04:19 PM IST
अमन कोशले
अमर उजाला नेटवर्क, धमतरी
अमर उजाला नेटवर्क, धमतरी
Published by: अमन कोशले
Updated Fri, 19 Sep 2025 04:19 PM IST
सार
पुराने स्कूल भवन जर्जर हो चुके थे, जिन्हें तोड़ दिया गया। इसके बाद से पहली से पांचवीं तक के बच्चे एक अस्थायी झोपड़ी में पढ़ाई कर रहे हैं। छत के नाम पर तिरपाल और खपरैल डाले गए हैं, जबकि दीवारों को कपड़े के परदे से ढक दिया गया है।
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छत्तीसगढ़ में झोपड़ी बनाकर मजबूरन पढ़ रहे बच्चे
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
देश जहां 5जी इंटरनेट की रफ्तार पकड़ चुका है और चांद तक पहुंचने की कामयाबी हासिल कर चुका है। वहीं छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के नक्सल प्रभावित नगरी विकासखंड के खल्लारी ग्राम पंचायत के चमेंदा और गाताबाहरा गांव आज भी बुनियादी शिक्षा की सुविधा से वंचित हैं। इन दोनों गांवों के बच्चों को पक्के स्कूल भवन न होने के कारण झोपड़ी नुमा अस्थायी स्कूल में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है।
ग्रामीणों के मुताबिक, पुराने स्कूल भवन जर्जर हो चुके थे, जिन्हें तोड़ दिया गया। इसके बाद से पहली से पांचवीं तक के बच्चे एक अस्थायी झोपड़ी में पढ़ाई कर रहे हैं। छत के नाम पर तिरपाल और खपरैल डाले गए हैं, जबकि दीवारों को कपड़े के परदे से ढक दिया गया है। ऐसे में बच्चों को पढ़ाई करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। बारिश के दिनों में तो हालात और बिगड़ जाते हैं, जिससे बच्चों को पढ़ाई बीच में छोड़कर घर लौटना पड़ता है।
जंगल का खतरा और पढ़ाई पर असर
यह गांव जंगल से घिरे हुए हैं, लिहाजा सांप-बिच्छू और अन्य जंगली जानवरों का खतरा हमेशा बना रहता है। अभिभावकों का कहना है कि वे कई बार शासन-प्रशासन से नए स्कूल भवन की मांग कर चुके हैं, लेकिन आज तक किसी ने बच्चों की परेशानी पर ध्यान नहीं दिया। मजबूरी में ग्रामीणों ने खुद अस्थायी झोपड़ी तैयार कर दी, ताकि बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह से बंद न हो।
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शिक्षक और ग्रामीणों की गुहार
स्कूल के शिक्षक का कहना है कि अस्थायी झोपड़ी में शिक्षण कार्य करना बेहद मुश्किल हो रहा है। बरसात या तेज हवाओं के दौरान बच्चों को पढ़ाना संभव नहीं होता। ग्रामीणों का कहना है कि देश का भविष्य कहलाने वाले बच्चे इस हालात में पढ़ाई करने को मजबूर हैं, जबकि जिम्मेदार जनप्रतिनिधि सिर्फ विकास की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।
प्रशासन का जवाब
इस मामले में विकासखंड शिक्षा अधिकारी ने स्वीकार किया है कि दोनों जगहों के स्कूल भवन जर्जर हो चुके हैं। शासन का निर्देश है कि जर्जर भवनों में बच्चों को नहीं बैठाना है। इसलिए एहतियातन बच्चों को अस्थायी व्यवस्था में पढ़ाया जा रहा है। अधिकारी ने कहा कि नए स्कूल भवन के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है और जल्द ही मंजूरी मिलने की उम्मीद है।
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ग्रामीणों के मुताबिक, पुराने स्कूल भवन जर्जर हो चुके थे, जिन्हें तोड़ दिया गया। इसके बाद से पहली से पांचवीं तक के बच्चे एक अस्थायी झोपड़ी में पढ़ाई कर रहे हैं। छत के नाम पर तिरपाल और खपरैल डाले गए हैं, जबकि दीवारों को कपड़े के परदे से ढक दिया गया है। ऐसे में बच्चों को पढ़ाई करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। बारिश के दिनों में तो हालात और बिगड़ जाते हैं, जिससे बच्चों को पढ़ाई बीच में छोड़कर घर लौटना पड़ता है।
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जंगल का खतरा और पढ़ाई पर असर
यह गांव जंगल से घिरे हुए हैं, लिहाजा सांप-बिच्छू और अन्य जंगली जानवरों का खतरा हमेशा बना रहता है। अभिभावकों का कहना है कि वे कई बार शासन-प्रशासन से नए स्कूल भवन की मांग कर चुके हैं, लेकिन आज तक किसी ने बच्चों की परेशानी पर ध्यान नहीं दिया। मजबूरी में ग्रामीणों ने खुद अस्थायी झोपड़ी तैयार कर दी, ताकि बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह से बंद न हो।
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शिक्षक और ग्रामीणों की गुहार
स्कूल के शिक्षक का कहना है कि अस्थायी झोपड़ी में शिक्षण कार्य करना बेहद मुश्किल हो रहा है। बरसात या तेज हवाओं के दौरान बच्चों को पढ़ाना संभव नहीं होता। ग्रामीणों का कहना है कि देश का भविष्य कहलाने वाले बच्चे इस हालात में पढ़ाई करने को मजबूर हैं, जबकि जिम्मेदार जनप्रतिनिधि सिर्फ विकास की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।
प्रशासन का जवाब
इस मामले में विकासखंड शिक्षा अधिकारी ने स्वीकार किया है कि दोनों जगहों के स्कूल भवन जर्जर हो चुके हैं। शासन का निर्देश है कि जर्जर भवनों में बच्चों को नहीं बैठाना है। इसलिए एहतियातन बच्चों को अस्थायी व्यवस्था में पढ़ाया जा रहा है। अधिकारी ने कहा कि नए स्कूल भवन के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है और जल्द ही मंजूरी मिलने की उम्मीद है।