कबीरधाम: कवर्धा वनमंडल में आईएफएस प्रोबेशनर्स का प्रशिक्षण, मृदा-जल संरक्षण और वाटरशेड प्रबंधन की सीख
देहरादून स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी के 2025-27 बैच के 33 भारतीय वन सेवा प्रोबेशनर्स अधिकारियों का दो दिवसीय प्रशिक्षण। जहां वे मृदा एवं जल संरक्षण तथा वाटरशेड मैनेजमेंट पर ‘रीज टू वैली’ मॉडल के तहत चेक डेम, गेबियन स्ट्रक्चर, कंटूर ट्रेंच जैसी संरचनाओं का व्यावहारिक अध्ययन और परियोजना रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं।
विस्तार
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, देहरादून के भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के 33 परिवीक्षाधीन अधिकारियों का दो दिवसीय प्रशिक्षण भ्रमण कवर्धा वनमंडल में शुरू हुआ। अधिकारी 12 मार्च तक यहां मृदा एवं जल संरक्षण तथा जलागम प्रबंधन विषय पर व्यावहारिक प्रशिक्षण ले रहे हैं।
प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों को चिह्नित चार नालों के आधार पर चार समूहों में बांटा गया है। प्रत्येक समूह संबंधित क्षेत्र में जाकर स्थल निरीक्षण, जमीनी सत्यापन और परियोजना रिपोर्ट तैयार करने का अभ्यास कर रहा है। प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन अभियंता और कवर्धा वनमंडल के तकनीकी सहायकों की टीम मार्गदर्शन दे रही है।

बुधवार को कवर्धा वनमंडल के सभागार में आयोजित सत्र में आईएफएस अधिकारी अजीता लॉगजम, वनमंडलाधिकारी निखिल अग्रवाल, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन अभियंता नवनीत नायक और भौगोलिक सूचना प्रणाली विशेषज्ञ सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे। इस दौरान अधिकारियों को गूगल अर्थ व क्यूजीआईएस सॉफ्टवेयर के माध्यम से परियोजना तैयार करने की तकनीकी जानकारी दी गई। प्रशिक्षण के बाद सभी परिवीक्षाधीन अधिकारियों ने समूहवार चयनित नालों का मैदानी निरीक्षण कर वास्तविक परिस्थितियों का अध्ययन किया। आज गुरुवार को उन्हें क्षेत्र में ले जाकर व्यावहारिक अभ्यास कराया जाएगा, जिसके आधार पर अधिकारी अपनी परियोजना रिपोर्ट बनाएंगे।
प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य वन क्षेत्रों में मृदा एवं जल संरक्षण के कार्यों को समझना है। इसका लक्ष्य जलागम प्रबंधन की प्रभावी योजना बनाना भी है। इसमें 'रीज टू वैली' अवधारणा के तहत जल संरक्षण, भू-जल पुनर्भरण और मृदा संरक्षण के उपायों की जानकारी दी जा रही है। ब्रशवुड चेक, बोल्डर चेक डैम, गेबियन संरचना, कंटूर ट्रेंच, स्टॉप डैम, चेक डैम, मिट्टी बांध और गली प्लग जैसी संरचनाओं का उपयोग सिखाया जा रहा है। वन विभाग के अनुसार, इस प्रशिक्षण से भावी वन अधिकारी वन क्षेत्रों में जल संरक्षण और जलागम प्रबंधन की योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू करने में सक्षम होंगे।