SC पहुंचा शिक्षकों का पेंशन मामला: सरकार की संभावित याचिका से पहले टीचर्स एसोसिएशन ने दाखिल की कैविएट
छग टीचर्स एसोसिएशन ने शिक्षकों से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी मामले में अपने पक्ष को मजबूती से रखने व किसी भी एकपक्षीय निर्णय को रोकने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल किया है।
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छग टीचर्स एसोसिएशन ने शिक्षकों से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी मामले में अपने पक्ष को मजबूती से रखने व किसी भी एकपक्षीय निर्णय को रोकने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल किया है। यह कैविएट एसोसिएशन के कोंडागांव जिलाध्यक्ष ऋषिदेव सिंह के नाम से एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड आशुतोष घड़े के माध्यम से दायर किया गया है। एसोसिएशन के कबीरधाम जिलाध्यक्ष डॉ. रमेश कुमार चन्द्रवंशी ने बताया कि यह मामला वर्ष 2021में छग हाई कोर्ट बिलासपुर द्वारा 17 फरवरी 2026 व 23 अप्रैल 2026 को पारित निर्णय से संबंधित है। चूंकि राज्य सरकार या अन्य पक्ष इन फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर कर सकते हैं, इसलिए एसोसिएशन ने पहले ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा दिया है।
कैविएट दायर होने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में शिक्षकों का पक्ष सुने बिना कोई भी स्थगन आदेश या विपरीत फैसला नहीं दे सकेगा। यदि राज्य सरकार या कोई अन्य पक्ष सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाता है, तो न्यायालय के लिए कैविएटर को नोटिस जारी करना और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होगा। शिक्षकों के न्यायसंगत अधिकारों व हाई कोर्ट से मिली जीत को बरकरार रखने के लिए यह कानूनी कदम उठाना गया है। टीचर्स एसोसिएशन शिक्षकों की सेवा शर्तों और कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए सड़क से लेकर सर्वोच्च अदालत तक तत्परता से खड़ा है। साथ ही सांगठनिक स्तर से भी संविलियन पूर्व प्रथम नियुक्ति तिथि से सेवा की गणना कर पूर्ण पेंशन के लिए सरकार से विभिन्न माध्यम से चर्चा कर प्रयास किया जाएगा।
हाई कोर्ट के निर्णय की प्रमुख बातें
हाई कोर्ट बिलासपुर ने रमेश कुमार चंद्रवंशी, ऋषिदेव सिंह समेत अन्य याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 23 जनवरी, 17 फरवरी, 3 मार्च व एक मई 2026 को दिए गए फैसले में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि शिक्षक एलबी संवर्ग के संविलियन से पहले की गई सेवा को अप्रासंगिक मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सेवा की निरंतरता, कार्य की प्रकृति, वेतन के स्रोत और प्रशासनिक नियंत्रण के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया है कि पेंशन कोई खैरात नहीं, बल्कि एक कल्याणकारी योजना है जिस पर कर्मचारियों का अधिकार है। इन सभी बातों को दृष्टिगत रखते हुए प्रदेश सरकार को निर्णय लेने का निर्देश दिया है।