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जगदलपुर का रामपाल मंदिर: इस स्वयंभू शिवलिंग से जुड़ी हैं अनोखी मान्यताएं, जहां आज भी निभाई जाती है खास परंपरा

Mon, 17 Aug 2026 10:04 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जगदलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जगदलपुर Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 17 Aug 2026 10:04 AM IST
सार

5वीं शताब्दी से जुड़ी मान्यताओं वाला रामपाल मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए रहस्य और आस्था का संगम बना हुआ है। भगवान शिव के इस अनोखे मंदिर में शिवलिंग को कपड़ा पहनाया जाता है। मान्यता है कि शिवलिंग में भगवान शिव के साथ माता पार्वती का भी वास है।

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Jagdalpur: Rampal Temple’s Swayambhu Shivling, Unique Beliefs and a Special Tradition Still Followed
रामपाल स्थित शिव प्रतिमा

विस्तार

रामपाल मंदिर की सबसे खास बात यहां स्थापित शिवलिंग है। श्रद्धालुओं के अनुसार इसमें भगवान शिव के साथ माता पार्वती का भी वास माना जाता है, इसलिए शिवलिंग को वस्त्र पहनाने की परंपरा है। मुख्य पुजारी कैलाश ठाकुर के अनुसार उनके पूर्वजों को ध्वस्त मंदिर के नीचे शिवलिंग दिखाई दिया था। इसके बाद ग्रामीणों ने बावड़ी माता को इसकी जानकारी दी। 

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मान्यता के अनुसार बावड़ी माता ने शिवलिंग को निकालकर उनके मंदिर के सामने द्वारपाल के रूप में स्थापित करने की बात कही थी। ग्रामीणों ने शिवलिंग को बाहर निकालने के लिए करीब 32 फीट तक खुदाई की लेकिन वह जमीन के भीतर काफी गहराई तक जुड़ा होने के कारण बाहर नहीं निकाला जा सका। इसके बाद वहीं उसकी स्थापना कर दी गई। पुजारी के मुताबिक खुदाई के समय शिवलिंग की ऊंचाई करीब 18 इंच थी, जो वर्तमान में करीब एक मीटर यानी 3 फीट 3 इंच बताई जाती है।
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मुख्य पुजारी के अनुसार भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के अवसर पर बावड़ी माता हर साल मंदिर में आकर स्वयं पूजा करती हैं। इस परंपरा का निर्वहन उनके परिवार की पिछली छह पीढ़ियों से किया जा रहा है। स्थानीय मान्यता है कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने यहां रुककर पूजा-अर्चना की थी। हालांकि मंदिर से जुड़ी इन मान्यताओं का आधार स्थानीय धार्मिक परंपराएं और जनश्रुतियां हैं।
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लोगों का मानना है कि इस स्वयंभू शिवलिंग में भगवान शिव के साथ माता पार्वती का भी वास है। श्रद्धालुओं के अनुसार शिवलिंग के ऊपरी हिस्से में भगवान शिव और नीचे माता पार्वती का वास माना जाता है। इसी वजह से यहां शिवलिंग को वस्त्र पहनाने की अनूठी परंपरा है। मंदिर से जुड़े लोगों का दावा है कि छत्तीसगढ़ में इस तरह वस्त्र धारण कराया जाने वाला यह अनोखा शिवलिंग है।

वाणासुर से भी जुड़ी है मान्यता
रामपाल मंदिर से जुड़ी एक अन्य मान्यता वाणासुर से भी जुड़ी है। बताया जाता है कि कभी इस क्षेत्र के जंगल में वाणासुर का प्रभाव था। वह भगवान शिव का बड़ा भक्त था और लंबे समय तक जंगल में रहकर भगवान शिव की तपस्या और आराधना करता था।


लंदन की गवर्नर ने चढ़ाई थी घंटी
मंदिर परिसर से जुड़ी एक दिलचस्प बात पुरानी घंटी को लेकर भी सामने आती है। मंदिर की खुदाई के दौरान एक घंटी मिलने की बात कही जाती है जिस पर लंदन और 1806 अंकित होने का दावा किया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार लंदन की एक महिला गवर्नर यहां आई थीं और भगवान शिव की प्रतिमा के दर्शन के बाद उन्होंने श्रद्धा से यह घंटी चढ़ाई थी।

आज भी दिखाई देती हैं प्राचीन ईंटें
मुख्य पुजारी के अनुसार मंदिर के निर्माण में प्राचीन ईंटों का इस्तेमाल किया गया था और कुछ पुरानी ईंटें आज भी परिसर में दिखाई देती हैं। मंदिर की प्राचीनता, स्वयंभू शिवलिंग से जुड़ी मान्यताओं और यहां चली आ रही परंपराओं के कारण दूर-दूर से श्रद्धालु रामपाल मंदिर पहुंचते हैं और भगवान शिव के दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं।

 

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