फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Aftereffects of Gen Z Protest: Education Minister’s Resignation Sparks Nationwide Political Turf War

प्रधान के इस्तीफे के बाद कई राज्यों में बढ़ा सियासी पारा; विपक्ष और सरकार के बीच छिड़ी 'क्रेडिट चोरी' की जंग

Thu, 30 Jul 2026 03:04 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Thu, 30 Jul 2026 03:04 PM IST
सार

Gen Z Protest Delhi: शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद जेन जी आंदोलन का फोकस राज्यों की ओर शिफ्ट हो गया है। दस राज्यों में मंत्रियों के इस्तीफे की मांग और 'क्रेडिट चोरी' के दावों के बीच 25 करोड़ युवा वोटर्स पर सियासत तेज है।

विज्ञापन
Aftereffects of Gen Z Protest: Education Minister’s Resignation Sparks Nationwide Political Turf War
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद क्रेडिट चोरी की जंग - फोटो : ANI

विस्तार

Dharmendra Pradhan Resignation: दिल्ली में पेपरलीक के खिलाफ जेन जी के आंदोलन की समाप्ति और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के आफ्टर इफेक्ट्स अब दिखने लगे हैं। आंदोलन का राजनीतिक फोकस अब राज्यों की तरफ शिफ्ट हो गया है, जहां दस राज्यों में पेपर लीक और परीक्षा भ्रष्टाचार के मामलों में सम्बन्धित विभागों के मंत्रियों के इस्तीफों की मांग की जा रही है और कोई राज्य सरकार इसे मानने को तैयार नहीं है। उधर जेन ज़ी आंदोलन के प्रणेता अभिजीत दिपके ने चेतावनी दी है कि अगर मोदी सरकार अपने वचनों से फिरी तो फिर से आंदोलन होगा।

विज्ञापन


दिल्ली में पैलेट गन का इस्तेमाल और अमित शाह से इस्तीफे की मांग
इधर राहुल गांधी ने आंदोलन के दौरान छात्रों पर पैलेट गन से हमले का आदेश किसने दिया और उनके साथ मारपीट करने का मुद्दा उठाते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर अपनी राजनीतिक पैलेट गन तानते हुए इस्तीफे की मांग कर दी है तो दूसरी तरफ सरकार और सत्तासीन भाजपा ने आंदोलन के दौरान किसी भी तरह से गोली चलने से इंकार करते हुए आरोप लगाया है कि जेन ज़ी आंदोलन की कामयाबी की क्रेडिट अपने खाते में लिखवाने में नाकाम रहे राहुल गांधी अब ‘क्रेडिट चोरी’ पर उतर आए हैं। हालांकि राहुल गांधी के इस राजनीतिक पैलेट गन का गृह मंत्री और मोदी सरकार पर खास असर होगा, इसकी संभावना नहीं के बराबर है। लेकिन राहुल की यह मांग जरूर जायज है कि सरकार यह तो बताए कि पैलेट गन चली किसके आदेश से और जिन्हें इसकी गोलियां लगीं वो कौन हैं, हैं भी या नहीं और हैं तो उनकी क्या हालत है। क्योंकि देश में पैलेट गन अमूमन केन्द्रीय सुरक्षा बलों या उन राज्यों की पुलिस के पास ही है, जो आतंकवाद और अलगाववाद से प्रभावित हैं। दिल्ली में इसका प्रयोग जरूर सवाल खड़े करता है। 
विज्ञापन


भारतीय राजनीति में 'जेहाद' और 'चोरी' जैसे नए जुमलों का दौर
बीते कुछ वर्षों में देश में ‘जेहाद’ और ‘चोरी’ प्रत्यय से बनने वाले नए-नए शब्दों की बाढ़- सी आ गई है। मामला ‘लव जेहाद’ से शुरू हुआ था और अब ‘कारपोरेट जेहाद’ तक के आन पहुंचा है। इसी तरह देश में चुनाव आयोग के मतदाता गहन पुनरीक्षण अभियान ने भी हिंदी शब्दकोश को समृद्ध करने का काम अलग तरीके से किया हैं, जिसकी वजह से वोट काटे जाने को ‘वोट चोरी’, सीट हारने को ‘सीट चोरी’ या फिर चढ़ावे में हाथ मारने के लिए ‘चढ़ावा चोरी’ आदि शब्द रूढ़ हुए। परस्पर राजनीतिक हमले के अब ये नए सामाजिक जुमले हैं। मीडिया ने इन्हें और लोकप्रिय बनाया। 
विज्ञापन
विज्ञापन


राहुल गांधी पर संबित पात्रा का 'क्रेडिट चोरी' का पलटवार
इन सबके पीछे निशाना मुख्य रूप से मोदी सरकार ही रही है, लेकिन अब इसी ट्रेंड के पलटवार के रूप में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. संबित पात्रा ने कहा कि जेन जी आंदोलन के मामले में नेता प्रतिपक्ष और वरिष्ठ कांग्रेस नेता राहुल गांधी का रवैया भी बिना कुछ खास किए, जेन ज़ी आंदोलन की क्रेडिट को चुराकर अपने खाते में जमा करने का है। क्योंकि कांग्रेस इस आंदोलन से शुरू में यह मानकर दूर ही रही थी कि यह उस आम आदमी पार्टी द्वारा प्रायोजित है, जो पंजाब में कांग्रेस की राजनीतिक दुश्मन नंबर वन है। हालांकि नीट पेपर लीक का मुद्दा वो अपने ढंग से अलग मंचों पर उठा रहे थे। 

सीजेपी से समझौता और विपक्षी दलों को हाशिए पर धकेलने की रणनीति
आंदोलन पकने पर जरूर राहुल गांधी ने आंदोलनकारी छात्रों के दमन के विरोध और केन्द्रीय मंत्री प्रधान के इस्तीफे के समर्थन में पीएम आवास पर धरना देकर उसे नई धार देने की कोशिश तो की। लेकिन उधर सरकार ने पहले ही आमरण अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक से समझौता कर उन्हें आंदोलन से अलग किया और बाद में आंदोलन की जनक कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से सीधा समझौता कर कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों को हाशिए पर डाल दिया। आंदोलन के समर्थकों ने इसे मोदी सरकार की पहली करारी राजनीतिक हार माना तो मोदी समर्थकों की निगाह में यह ‘दो कदम आगे बढ़ने के लिए यह एक कदम पीछे खींचने’ की रणनीति का हिस्सा है, जिसके नतीजे आगामी चुनावों में दिखाई देंगे। ( वैसे इसकी पहली परीक्षा दतिया सहित तीन विस उपचुनावों में ही हो जाएगी)। 

सरकार की सोची-समझी रणनीति और आगामी चुनावों पर इसकी परीक्षा
यह भी सही है कि शुरू में सरकार ने इस आंदोलन को बढ़ने दिया। बाद में तमाम युवा सड़कों पर उतर आए तो आंदोलन बेकाबू और हिंसक होने के डर से सरकार ने प्रधान का इस्तीफा करवा कर उस पर पानी डाल दिया। बीजेपी का मानना है कि राहुल गांधी का अमित शाह पर हमला, संसद में नहीं बोलने देने तथा आंदोलनकारी छात्रों का बर्बर दमन जैसे आरोप सप्रेटा दूध से मलाई निकालने की कोशिश ज्यादा है, क्योंकि आंदोलन की मुख्य घटक सीजेपी भी उनके साथ खड़ी दिखाई नहीं दे रही है। ऐसे में कांग्रेस इस आंदोलन का कितना राजनीतिक लाभ उठा पाएगी और मोदी विरोधी माहौल कितना पक पाएगा, यह बड़ा सवाल है।

25 करोड़ जेन ज़ी वोटरों को साधने और नेताओं की सहानुभूति की होड़
सवाल यह भी है कि अगर सरकार ने सीजेपी को दिए सभी वादों को पूरी तरह नहीं निभाया तो क्या जेन ज़ी फिर से इकट्ठे होकर सड़कों पर उतरेंगे, क्या यह फिर से संभव है, इन सवालो का जवाब अभी देना मुश्किल है। सीजेपी आगे क्या करेगी, कैसे करेगी, यह सवाल भी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन दूसरी तरफ सीजेपी को अपने पाले में खींचने की राजनीतिक कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। जेन जी की मांगों के प्रति सहानुभूति जताने के पीछे यह भी बड़ा कारण है, क्योंकि देश में जेन ज़ी वोटरों की संख्या करीब 25 करोड़ है। यही कारण है कि महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडणवीस सरकार में मंत्री और शिंदे सेना के नेता संजय शिरसाट को अचानक अभिजीत दिपके के माता-पिता से अपने ‘पुराने रिश्तों’ की याद आई और आंदोलन समाप्त होते ही वो उनकी कुशल क्षेम पूछने घर जा पहुंचे। 

अभिजीत दिपके की नई घोषणा और बिहार में एंट्री का विरोध
खबर यहां तक उड़ी कि दिपके किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल होकर महाराष्ट्र की राजनीति में भूमिका अदा कर सकते हैं। हालांकि खुद दिपके ने ऐसी कोई बात अभी नहीं कही है। उन्होंने केवल बिहार जाने की घोषणा की है, जहां छात्र आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन दिपके के आने का वहां सभी स्तरों  पर विरोध शुरू हो गया है, क्योंकि दिपके महाराष्ट्र से जो हैं, और बिहारियों का मानना है कि महाराष्ट्र में बिहारियों के साथ भेदभाव हो रहा है। इस बीच धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की राजनीतिक गूंज अब अन्य राज्यों में भी सुनाई दे रही है। जिन दस राज्यों में यह मांग उठी है, उनमें  से पांच  भाजपा और एन एनडीए शासित और चार विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्य हैं। ये राज्य हैं, पंजाब, उत्तर प्रदेश, ओड़िशा, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और केरल। इनमें से तेलंगाना और झारखंड में तो शिक्षा मंत्रालय भी मुख्यमंत्री के पास ही है। लिहाजा इस्तीफा उन्हीं से मांगा जा रहा है। 

10 राज्यों में मंत्रियों के इस्तीफे की होड़ और राजनीतिक ब्लैकमेलिंग का खेल
मजे की बात यह है कि विपक्ष शासित राज्यों में यह मांग भाजपा कर रही है तो भाजपा शासित राज्यों में यह मांग विपक्षी पार्टियां कर रही है। लेकिन कोई भी इस्तीफे की मांग मानने के लिए तैयार नहीं है। धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफा दिलाने वाली भाजपा भी और उनसे इस्तीफा मांगने वाली विपक्षी सरकारें भी। क्योंकि सभी सरकारें इसे केवल राजनीतिक ब्लैकमेलिंग मान रही है। जबकि इन मामलों में आरोप लगभग वही हैं, जो पेपर लीक विरोधी आंदोलन में लगे थे।

दरअसल सरकारों के जनमत के आगे ‘संवदेनशील होकर झुकने’ और राजनीतिक दबाव में ‘ब्लैकमेल’ होने के बीच की लक्ष्मण रेखा बहुत धुंधली है। सरकारें जरूरत से ज्यादा झुकती हैं तो उनका इकबाल धूमिल होता है, नहीं झुकती हैं तो तानाशाह कहलाती हैं। ज्यादातर नागरिक न तो ‘अकड़ू सरकार’ चाहते हैं और न ही ‘कमजोर सरकार’ चाहते हैं। जेन जी आंदोलन ने इस विभाजन रेखा को काफी हद तक अधोरेखित किया है। बेशक सरकार को युवाओं की मांगों के प्रति संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए, लेकिन हर कोई धमकाकर सरकार को नमा दे, यह भी देश की राजनीतिक स्थिरता और आत्म विश्वास के लिए ठीक नहीं है।


------------

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed