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अपनी सोच एआई के हवाले न करें: जब हर जवाब तुरंत मिल जाए, तो नई खोजें कैसे जन्म लेंगी?
Sat, 11 Jul 2026 07:05 AM IST
Devesh Tripathi
ऐन-लॉर ले कनफ, द न्यूयॉर्क टाइम्स
ऐन-लॉर ले कनफ, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sat, 11 Jul 2026 07:05 AM IST
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सार
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विस्तार
कल्पना कीजिए कि आपने गूगल या किसी एआई टूल पर एक सवाल पूछा। कुछ ही सेकंड में पूरा जवाब सामने आ गया। न किसी लिंक पर क्लिक करने की जरूरत, न अलग-अलग वेबसाइटों पर भटकने की। काम आसान हो गया, समय बच गया। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि इस सुविधा की कीमत पर हम कुछ खोते भी जा रहे हैं?वर्तमान में अधिकतर गूगल सर्च में उपयोगकर्ता किसी भी वेबसाइट पर क्लिक ही नहीं करता। बस सवाल टाइप करता है, एआई से तैयार सारांश पढ़ता है और आगे बढ़ जाता है। यही तरीका कई अन्य एआई टूल्स भी अपना रहे हैं। पहले लोग जानकारी पाने के लिए अलग-अलग स््रोतों से पढ़ते थे। इस दौरान उन्हें कई नई और दिलचस्प बातें भी पता चल जाती थीं। अब यह खोजबीन धीरे-धीरे कम होती जा रही है। पर, क्या तेज जवाब मिलना हमेशा फायदेमंद होता है? जवाब है-नहीं। एआई टूल्स अब हर सवाल का जवाब तुरंत दे देते हैं। इससे नई बातें खोजने और जानने की हमारी जिज्ञासा धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
करीब दस साल पहले मैं गूगल में काम करती थी। उस समय हम कंटेंट की उपयोगिता का आकलन इस आधार पर करते थे कि लोग उस पर कितना समय बिताते हैं, कितने लिंक खोलते हैं और कितनी गहराई तक पढ़ते हैं। तब गूगल लोगों को ज्यादा खोजबीन करने के लिए प्रोत्साहित करता था। लेकिन, अब उसके एआई उत्पाद उसी खोजबीन की जरूरत को कम करने के लिए बनाए जा रहे हैं।
शोध बताते हैं कि जब किसी रोचक सवाल का जवाब मिलने में थोड़ा समय लगता है, तो उस दौरान मिली दूसरी जानकारी, उससे जुड़ी न होने वाली बातें भी हमें ज्यादा अच्छी तरह याद रहती हैं। दरअसल, जवाब का इंतजार करते समय दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम सक्रिय हो जाता है और हिप्पोकैंपस नई यादें बनाने के लिए अधिक तैयार रहता है। यानी, जिज्ञासा हमारे पूरे दिमाग को सीखने के लिए तैयार कर देती है। यह केवल उस सवाल का जवाब समझने में मदद नहीं करती, जिसे हम जानना चाहते हैं, बल्कि उससे जुड़ी दूसरी जानकारियों को भी बेहतर ढंग से ग्रहण करने में मदद करती है।
जिज्ञासा एक खुली खिड़की की तरह काम करती है। जब तक यह खिड़की खुली रहती है, सीखने की प्रक्रिया गहरी व व्यापक होती जाती है। पर, यदि एआई कुछ ही सेकंड में जवाब दे दे, तो यह खिड़की समय से पहले ही बंद हो जाती है। आपको जवाब तो मिल जाता है, पर वह अवसर खो जाता है, जब कोई दूसरा लेख, नया विचार या दो अवधारणाओं के बीच अप्रत्याशित संबंध सामने आ सकता था। शोधकर्ता इसे इंसीडेंटल लर्निंग, यानी अनजाने में होने वाली सीख कहते हैं। इतिहास की कई बड़ी खोजें इसी प्रक्रिया का परिणाम रही हैं। जब लोग किसी सवाल के पीछे अधिक समय तक लगे रहते हैं, तब उन्हें ऐसी बातें भी पता चलती हैं, जिनकी उन्होंने कल्पना तक नहीं की होती। इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण 1964 का है। भौतिक वैज्ञानिक अर्नो पेन्जियास और रॉबर्ट विल्सन ने अपने रेडियो एंटीना में एक अजीब-सी आवाज सुनी। वे उसे अनदेखा कर सकते थे, पर उन्होंने उसकी वजह तलाश की। इसी जिज्ञासा ने उन्हें बिग बैंग के बाद बची हुई कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड रेडिएशन की ऐतिहासिक खोज तक पहुंचा दिया।
आज की तकनीक सवाल-जवाब के बीच के समय को बेकार मानकर खत्म करना चाहती है, जबकि सीखने की प्रक्रिया इसी दौरान सबसे गहरी होती है। जब लोग कम खोजबीन करेंगे, तो धीरे-धीरे वे अपने दम पर नई खोज व नए विचार बनाने के बजाय तैयार जवाबों पर अधिक निर्भर हो जाएंगे। आज भी लोग इंटरनेट पर अलग-अलग वेबसाइट देख सकते हैं, लिंक से लिंक तक पहुंच सकते हैं और खोजते-खोजते नई जगहों और विचारों तक पहुंच सकते हैं। पर, एआई टूल्स का मौजूदा डिजाइन कुछ इस तरह है कि अब ऐसा होने की संभावना कम होती जा रही है। हालांकि, जो एआई कंपनियां अपने उपयोगकर्ताओं के हित को महत्व देती हैं, वे ऐसे सर्च इंजन विकसित कर सकती हैं, जिनका उद्देश्य केवल तेज जवाब देना नहीं, बल्कि नई जानकारियां खोजने और गहराई से समझने के लिए लोगों को प्रेरित करना हो। सवाल और जवाब के बीच का समय मूल्यवान होता है और डिजाइन के नाम पर उसे खत्म नहीं किया जाना चाहिए।
यदि हम ऐसी दुनिया बना देंगे, जहां हमें केवल वही मिले, जो हमने पूछा है, तो हम उन खोजों तक पहुंचने की क्षमता खो देंगे, जिनके बारे में हमें यह भी नहीं पता था कि उनसे जुड़े सवाल कभी पूछे जा सकते हैं।