फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   deo ki diary political satire on government system in india

देव की डायरी: नो वाइन, नो शाइन बस यहां एक ही नियम है कि कोई नियम नहीं..!

देव प्रकाश चौधरी देव प्रकाश चौधरी
Updated Fri, 10 Jul 2026 07:47 PM IST
सार

घटना बहुत छोटी है। ड्यूटी खत्म हो चुकी थी। कुछ बिजली कर्मी ठेके पर पहुंचे। इच्छा थी कि दिन का समापन एक प्याले के साथ हो। सेल्समैन ने घड़ी देखी और कहा, “समय निकल गया है। अब बिक्री नहीं होगी। नियम यही है।” यहां से कहानी समाप्त हो जानी चाहिए थी। लेकिन भारत में नियम कभी कहानी का अंत नहीं करते। वे केवल अगला अध्याय शुरू करते हैं। अगले अध्याय का शीर्षक था-“जब सुरूर पर रोक होगी, तो उजाले पर भी विचार किया जाएगा।”

विज्ञापन
deo ki diary political satire on government system in india
नो वाइन, नो शाइन - फोटो : Amarujala.com/AI

विस्तार

सरकारी नौकरी केवल वेतन नहीं देती। वह आदमी को कुछ ऐसे अधिकार भी देती है, जिनका जिक्र किसी सेवा नियमावली में नहीं मिलता। इन अधिकारों की खोज कर्मचारी धीरे-धीरे करता है। सहारनपुर के कुछ बिजली कर्मियों ने तो इस अदृश्य संविधान का प्रायोगिक प्रदर्शन कर ही दिया। उन्होंने साबित किया कि सरकारी कटर केवल तार नहीं काटता, कभी-कभी लोकतंत्र की बची-खुची लाज भी काट देता है। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि सत्ता केवल संसद, सचिवालय और मंत्रालयों में नहीं रहती। उसका एक छोटा सा शाखा कार्यालय हर उस आदमी के भीतर खुल जाता है, जिसके पास किसी दूसरे आदमी का काम रोक देने की ताकत होती है। कुर्सी छोटी हो सकती है, अधिकार नहीं।

विज्ञापन


घटना बहुत छोटी है। ड्यूटी खत्म हो चुकी थी। कुछ बिजली कर्मी ठेके पर पहुंचे। इच्छा थी कि दिन का समापन एक प्याले के साथ हो। सेल्समैन ने घड़ी देखी और कहा, “समय निकल गया है। अब बिक्री नहीं होगी। नियम यही है।”
विज्ञापन


नियम शुरू करते हैं नया अध्याय

यहां से कहानी समाप्त हो जानी चाहिए थी। लेकिन भारत में नियम कभी कहानी का अंत नहीं करते। वे केवल अगला अध्याय शुरू करते हैं। बेचारा सेल्समैन नहीं जानता था कि सरकारी आदमी के सामने नियम का नाम लेना वैसा ही है, जैसे पुजारी को मंत्र सिखाना। नियम सरकारी दफ्तरों में पूजा की वस्तु है। सुबह सलाम किया जाता है और शाम तक किसी फाइल के नीचे दबा दिया जाता है। बाहर का आदमी यदि नियम याद दिला दे, तो उसे अधिकार क्षेत्र में घुसपैठ माना जाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


इस अपमान का बदला तत्काल नहीं लिया गया। सरकारी व्यवस्था में बदला भी प्रक्रिया से गुजरता है। कर्मचारी घर गए, विचार हुआ। सीढ़ी का इंतजाम हुआ। दो मोटरसाइकिलें तैयार हुईं। फिर रात के अंधेरे में लोकतंत्र पूरी तैयारी के साथ खंभे पर चढ़ गया। ठेके की बिजली काट दी गई।

संदेश साफ था- “जब सुरूर पर रोक होगी, तो उजाले पर भी विचार किया जाएगा।''

मुझे सबसे अधिक संतोष इस बात का हुआ कि विभाग में अभी भी इतनी फुर्ती बची हुई है। लोग बरसों से शिकायत करते आए हैं कि सरकारी कर्मचारी देर से आते हैं, धीरे चलते हैं, फाइलें रेंगती हैं। यह घटना उस भ्रम का अंत करती है। मन लग जाए तो सरकारी आदमी रात में भी खंभे पर चढ़ जाता है। बस काम का चुनाव उसका अपना होना चाहिए।

ठेका संचालक हैरान था। वह कह रहा था कि बिजली का बिल पूरा जमा था। अरे भाई, बिल तो कागज का टुकड़ा है। असली बिल तो वह सद्भावना है, जो विभाग के साथ समय-समय पर जमा करनी पड़ती है। तुमने ‘अमृत’ देने से मना किया, उन्होंने ‘करंट’ रोक दिया। हिसाब बराबर।

पुलिस सीसीटीवी देखकर पता लगा रही थी कि तार काटने वाले सचमुच बिजली विभाग के ही थे या नहीं। मुझे पुलिस की मासूमियत पर दया आती है। अंधेरे में सही तार काटना कोई शौकिया कला नहीं है। यह वर्षों की विभागीय साधना से प्राप्त सिद्धि है। हर पेशे का अपना हस्ताक्षर होता है। उस्ताद तबला पहचानता है, सर्जन नस पहचानता है और बिजली वाला... वह अंधेरे में भी सही तार पहचान लेता है।

विभाग अभी शांत है। संभव है, वह इस घटना को अनुशासनहीनता नहीं, अतिरिक्त कार्यनिष्ठा मान रहा हो। आखिर कर्मचारी ड्यूटी खत्म होने के बाद भी विभागीय कौशल का प्रदर्शन कर रहे थे। आज के समय में इतनी लगन कहां मिलती है?

या फिर शायद वे इस बात पर मंथन कर रहे हों कि ‘नो वाइन, नो शाइन’ यानी ‘शराब नहीं, तो बिजली नहीं’ को विभाग की नई गाइडलाइन में शामिल किया जाए या नहीं।

इस पूरे प्रसंग में सबसे दुखी यदि कोई है, तो वह नियम है। बेचारा हर जगह अपमानित होता है। आम आदमी के सामने वह शेर बनकर खड़ा रहता है। लेकिन जैसे ही किसी अधिकार संपन्न व्यक्ति के सामने पहुंचता है, उसकी आवाज पतली हो जाती है। वह खुद किनारे हट जाता है, मानो कह रहा हो- “भाइयो, मुझे बीच में मत लाइए। मेरी इतनी हैसियत नहीं है।”

इस घटना ने देश को एक नया प्रशासनिक सूत्र दिया है। नियम और अधिकार में जब भी टकराव होगा, जीत नियम की नहीं, अधिकार की होगी, क्योंकि नियम के पास केवल किताब होती है। अधिकार के पास सीढ़ी, कटर और विभागीय पहचान।

अब मुझे लगता है कि दुकानों पर दो बोर्ड होने चाहिए।
 

  • पहला- “समय के बाद बिक्री बंद है।”
  • दूसरा- “यदि आप किसी विभाग से हैं, तो कृपया पहले अपना विभाग बताइए।”


वैसे यह किसी एक शहर की खबर नहीं है। यह उस व्यवस्था का चरित्र है, जहां अधिकार सरकारी होता है, लेकिन उसका उपयोग धीरे-धीरे निजी हो जाता है। नागरिक इसे दुर्घटना समझता है। विभाग इसे प्रक्रिया कहता है और हमारे यहां प्रक्रिया की उम्र हमेशा नागरिक से लंबी होती है। कुछ दिन बाद सब अपने-अपने काम पर लौट जाएंगे। ठेके पर फिर रोशनी होगी।

विभाग फिर जनता की सेवा करेगा। पुलिस फिर किसी दूसरे सीसीटीवी में सच खोजेगी। नागरिक फिर समय पर बिल भरेंगे और यह मानकर जीते रहेंगे कि इस बार शायद उनका उजाला सुरक्षित रहेगा।




-------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed