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अक्षय तृतीया विशेष: आस्था का सैलाब और हिमालय का संकट

Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Mon, 20 Apr 2026 10:01 AM IST
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सार

इसी दबाव के आगे नतमस्तक राज्य सरकार ने 2022 में यात्रियों की तय सीमा का 2023 में स्वयं ही समाप्त कर दिया था।

akshaya tritiya: A surge of faith and the Himalayan crisis
केदारनाथ के कपाट खुले - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार

अक्षय तृतीया के शुभ मुहूर्त से उत्तराखण्ड की चारधाम यात्रा ग्रीष्मकाल के लिये शुरू हो चुकी है और अब तक देश विदेश के लाखों श्रद्धालु ऑन लाइन यात्रा के लिये पंजीकरण कर चुके हैं। लेकिन यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि हिमालय की अति संवेदनशील पर्यावरणीय संवेदनशीलता को देखते हुये आखिर कितने तीर्थयात्री बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और युमनोत्री की एक साथ एक ही दिन में यात्रा कर सकते हैं।

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भारत का चिन्तित हरित प्राधिकारण (एनजीटी) भी बार-बार उत्तराखण्ड सरकार पर जोर डाल रहा है कि वह चारों धामों की कैरीइंग कपैसिटी (धारण क्षमता) का वैज्ञानिक अध्ययन करा कर रिपोर्ट पेश करे ताकि कानून आगंतुकों की संख्या तय की जा सके।
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राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक पशोपेश

लेकिन पशोपेश में फंसी उत्तराखण्ड सरकार पर होटल, ढाबा, पुजारियों और अन्य स्टेक होल्डरों का इतना दबाव कि उनकी नाराजगी सीधे राजनीतिक संभावनाओं पर आधात करने के साथ ही श्रद्धालुओं को दर्शन लभ से वंचित करने का पाप भी मुंह बायें खड़ा है।

इसी दबाव के आगे नतमस्तक राज्य सरकार ने 2022 में यात्रियों की तय सीमा का 2023 में स्वयं ही समाप्त कर दिया था। लेकिन अब एनजीटी और पर्यावरणवादी पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार पहले से ही बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के संकट से घिरे इस क्षेत्र पर आफतों की संख्या और आवृतियों में वृद्धि होती जा है।

चूंकि हिमालय ऐशिया का जलस्तंभ होने के साथ ही इस उप महाद्वीप के मौसम नियंत्रक भी है, इसलिये हिमालय के संकट को केवल स्थानिक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।

यात्रियों और वाहनों की संख्या में अप्रत्याशित उछाल

पिछले 25 वर्षों में वास्तव में उत्तराखण्ड स्थित चारों हिमालयी धामों में यात्रियों के साथ ही वाहनो की संख्या में कई गुना वृद्धि होती जा रही है। अभी तो यात्रियों की संख्या 50 लाख पार कर रही है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2000 में चारों धामों में आने वाले कुल यात्रियों की संख्या मात्र 12,92,411 थी जो कि 2025 तक 51,09,848 तक पहुंच गयी। यात्रियों की संख्या के साथ ही वाहनों की संख्या में भी अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है।

पिछले साल यात्रियों को ढोने वाले विभिन्न प्रकार के वाहनों की संख्या 5,13,2027 थी जबकि वर्ष 2000 में यात्रा पर आने वाले वाहनों की संख्या 50 हजार से भी कम थी।

प्रदूषण का जानलेवा उत्सर्जन और ग्लेशियरों पर खतरा

वाहनों से जो प्रदूषणकारी उत्सर्जन होता है उसमें कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, फोटोकैमिकल ऑक्सीडेंट, वायु विष, अर्थात् बेंजीन, एल्डिहाइड, ब्यूटाडीन, सीसा, पार्टिकुलेट मैटर, हाइड्रोकार्बन, सल्फर के ऑक्साइड और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन शामिल होते हैं।

पर्यावरणविदों के लिये एक और चिन्ता का विषय ब्लैक कार्बन है जो कि जलवायु परिवर्तन करने के साथ ही ग्लेशियरों को भी पिघला रहा है।

न्यायिक आदेश और वहन क्षमता का विवाद

चिन्तित राष्ट्रीय हरित प्राधिकारण ने उत्तराखण्ड सरकार को आगामी 21 जुलाई से पहले चारों धामों में भीड़ की दृष्टि से धारण या वहन क्षमता को लेकर विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट पेश करने का आदेश जारी किया है। वास्तव में हिमालयी क्षेत्र में भीड़ नियंत्रण की कवायद हमेशा से ही विवादों और दबावों के घेरे में रही है।

राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2022 में एक साहसिक निर्णय लेते हुए प्रतिदिन यात्रियों की संख्या निर्धारित की गई थी, जिसमें बद्रीनाथ के लिए 15 हजार और केदारनाथ के लिए 12 हजार जैसी सीमाएं तय थीं। विशेषज्ञों ने इसे सुरक्षा की दिशा में एक मानक कदम माना था।

विडंबना यह रही कि वर्ष 2023 के आते-आते स्थानीय व्यावसायिक हितों और हितधारकों के आर्थिक दबाव के आगे यह सीमा हटा ली गई। होटल व्यवसायियों और परिवहन संचालकों की अल्पकालिक आर्थिक चिंताओं ने दीर्घकालिक सुरक्षा जोखिमों को पीछे धकेल दिया।

भूगर्भीय संवेदनशीलता और ढलानों का संकट

वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) और आईआईटी रुड़की जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के शोध इस ओर इशारा करते हैं कि हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों की अपनी एक भौतिक सीमा है। वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि प्रत्येक धाम की भौगोलिक बनावट, ढलानों की स्थिरता और वहां उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन भिन्न हैं।

आईआईटी रुड़की के आपदा विशेषज्ञों के अनुसार, उच्च हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक मानवीय गतिविधियों और भारी निर्माण कार्य से ढलानों की ‘‘इंटरनल बाइंडिंग’’ कमजोर होती है, जिससे भूस्खलन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

वैसे भी भूस्खलन की दृष्टि से उत्तराखण्ड शीर्ष पर है। जब इन अस्थिर ढलानों पर हजारों वाहनों और लाखों लोगों का अतिरिक्त भार पड़ता है, तो यह किसी बड़े भूगर्भीय असंतुलन का ट्रिगर बन सकता है। वहन क्षमता केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि यह उस नाजुक तंत्र को बचाने की कोशिश है जो एक निश्चित सीमा के बाद ढह सकता है।

पारिस्थितिकी और जल स्रोतों पर दुष्प्रभाव

भीड़ का प्रभाव केवल सड़कों पर दिखने वाले जाम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके वैज्ञानिक दुष्परिणाम कहीं अधिक गहरे हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी के शोध बताते हैं कि अचानक बढ़ने वाली जनसंख्या से हिमालयी जल स्रोतों और स्प्रिंग्स (नौलेधारों) पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जिससे स्थानीय जल चक्र प्रभावित होता है।

इसके अतिरिक्त, कचरा प्रबंधन एक विकराल चुनौती बनकर उभरा है। एक अनुमान के अनुसार, प्रत्येक यात्री द्वारा छोड़ा गया प्लास्टिक और जैविक कचरा संवेदनशील ग्लेशियरों के समीप एकत्र होकर वहां के तापमान और पारिस्थितिकी को प्रभावित कर रहा है।

कचरे का यह ढेर अंततः अलकनंदा और भागीरथी जैसी पवित्र नदियों की जल गुणवत्ता को प्रदूषित कर रहा है, जिसका प्रभाव पहाड़ों से लेकर गंगा के मैदानी इलाकों तक देखा जा सकता है।

भीड़ विज्ञान और सुरक्षा के मानक

सुरक्षा की दृष्टि से ‘‘भीड़ विज्ञान’’ के सिद्धांत चारधाम के संदर्भ में और भी डरावने हो जाते हैं। विश्व प्रसिद्ध भीड़ वैज्ञानिक डिर्क हेल्बिंग के अनुसार, जब किसी सीमित स्थान पर घनत्व चार व्यक्ति प्रति वर्ग मीटर से अधिक हो जाता है, तो वहां ‘क्राउड टर्बुलेंस’ की स्थिति पैदा होती है। ऐसे में व्यक्ति की अपनी गति समाप्त हो जाती है और वह भीड़ के दबाव में एक तरल पदार्थ की तरह बहने लगता है।

चारधाम के संकरे मंदिर परिसरों और खड़ी चढ़ाई वाले रास्तों पर ऐसी स्थिति किसी भी क्षण बड़ी भगदड़ या जनहानि का कारण बन सकती है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे प्राकृतिक आपदा के समय अत्यधिक भीड़ राहत और बचाव कार्यों में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है।

विकास और विश्वास के बीच संतुलन की आवश्यकता

आज शासन और समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस धारणा को बदलने की है कि यात्रियों की संख्या सीमित करना आस्था पर प्रहार है। वास्तव में, यह आस्था को सुरक्षित करने का ही एक उपक्रम है।

हिमालय की संवेदनशीलता को देखते हुए अब डिजिटल पंजीकरण, स्लॉट आधारित दर्शन और ‘एंट्री-एग्जिट’ नियंत्रण जैसे आधुनिक प्रबंधनों को बिना किसी राजनीतिक या व्यावसायिक दबाव के लागू करना होगा। स्थानीय समुदायों को भी यह समझना होगा कि यदि हिमालय सुरक्षित नहीं रहा, तो उनकी आजीविका का यह आधार ही सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।

विकास और विश्वास के इस सफर में विज्ञान की अनदेखी आत्मघाती सिद्ध हो सकती है। अंततः, हिमालय की पवित्रता और सुरक्षा की रक्षा करना ही सबसे बड़ी सेवा है, क्योंकि प्रकृति के कोप के आगे मानवीय हठ और नीतियां दोनों ही असहाय सिद्ध होती हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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