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सत्य की खोज खुद से ही शुरू होती है: निरंतर आत्म-अनुशासन बनाए रखे

स्वामी विवेकानंद, अमर उजाला Published by: Nitin Gautam Updated Wed, 22 Apr 2026 07:38 AM IST
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सार

सत्य को केवल पुस्तकों या विचारों में नहीं पाया जा सकता। उसे तो स्वयं अनुभव करना पड़ता है। यही अनुभव मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर, बंधन से मुक्ति की ओर तथा सीमितता से अनंतता की ओर ले जाता है।
 

discovery of truth starts from self
सत्य की खोज - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

समस्त ज्ञान और शक्ति हमारे भीतर ही निहित है, किंतु मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अपने भीतर छिपी इस अनंत शक्ति पर विश्वास नहीं करता। जब व्यक्ति यह कहने का साहस करता है कि वह शक्तिशाली है, तभी आत्मविश्वास का उदय होता है। जब यह विश्वास जागृत होता है, तब मनुष्य यह समझने लगता है कि उसका मन ही उसके बंधन और मुक्ति, दोनों का कारण है। मन, जो चंचल और अस्थिर प्रतीत होता है, वास्तव में एक व्यापक और सार्वभौमिक चेतना का अंश है। इस सत्य का बोध होते ही साधक के भीतर यह प्रेरणा जन्म लेती है कि वह अपने मन को नियंत्रित करे, क्योंकि यही नियंत्रण जीवन को दिशा देने की वास्तविक कुंजी है। इस प्रक्रिया में एकाग्रता का महत्वपूर्ण स्थान है। जब मनुष्य अपने विचारों को एक बिंदु पर केंद्रित करना सीख जाता है, तब वह एकाग्रता की राह पर अग्रसर होने लगता है।
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एकाग्रता ही वह शक्ति है, जो बाहरी संसार के रहस्यों को समझने के साथ-साथ आंतरिक सत्य से भी पर्दा उठाती है। किंतु, यह एकाग्रता तभी संभव है, जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं और विकारों पर विजय प्राप्त कर सके। इच्छाएं असीमित होती हैं, और जब वे पूरी नहीं होतीं, तो दुख का कारण भी बनती हैं। इसलिए, जरूरी है कि इन्सान इच्छाओं के इस अंतहीन चक्र से ऊपर उठकर अपने भीतर स्थिरता व संतुलन का विकास करे, क्योंकि यही उसे वास्तविक शांति प्रदान करती है। जब व्यक्ति अपने ज्ञान को व्यवहार में उतारता है, तभी वह उसे अनुभव कर पाता है, और यही अनुभव उसके आत्मविश्वास को दृढ़ बनाता है। इस मार्ग में अनुशासन भी अत्यंत आवश्यक है। 
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जीवन के विभिन्न स्तरों पर संयम, संतुलन और सजगता अपनाते हुए मनुष्य धीरे-धीरे अपने भीतर के विकारों को शांत करता है और आत्मिक जागरण की ओर अग्रसर होता है। यह यात्रा बाहरी नियंत्रण से शुरू होकर अंततः आंतरिक शांति और एकाग्रता की अवस्था तक पहुंचती है, जहां मन पूर्णतः स्थिर हो जाता है। जब मनुष्य इस स्थिति को प्राप्त करता है, तब उसे यह अनुभव होने लगता है कि उसके भीतर एक दिव्य शक्ति विद्यमान है। यह दिव्यता कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि उसकी अपनी ही चेतना का उच्चतम स्वरूप है। अंततः यह स्पष्ट हो जाता है कि सत्य किसी बाहरी स्रोत में सीमित नहीं है। उसे न तो केवल पुस्तकों में पाया जा सकता है और न ही केवल विचारों में, बल्कि उसे स्वयं अनुभव करना पड़ता है। यही अनुभव मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर, बंधन से मुक्ति की ओर और सीमितता से अनंतता की ओर ले जाता है।

इस प्रकार इन्सान एकाग्रता और अभ्यास के माध्यम से अगर अपनी चेतना को जागृत करे, और निरंतर आत्म-अनुशासन बनाए रखे, तो वह न केवल अपने जीवन को रूपांतरित कर सकता है, बल्कि उस परम सत्य का साक्षात्कार भी कर सकता है, जो उसके अस्तित्व का वास्तविक आधार है।

अपनी दिव्यता पहचानें
इच्छाओं और विकारों से ऊपर उठकर संतुलन व स्थिरता विकसित करना ही सच्ची प्रगति का मार्ग है। अनुभव से प्राप्त ज्ञान आत्मविश्वास को दृढ़ बनाता है और हमें आत्मिक जागरण की ओर ले जाता है। जो अपने भीतर की दिव्यता को पहचान लेता है, वही अज्ञान से ज्ञान और बंधन से मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।
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