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पानीपत याद रहा कुंजपुरा भूल गए: जब अफगान सैनिक घास के तिनके मुंह में दबाकर गाय की तरह बोलने लगे
अमर उजाला, अमर उजाला
Published by: Nitin Gautam
Updated Wed, 22 Apr 2026 07:46 AM IST
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सार
कुंजपुरा की लड़ाई में मराठा वीरों ने अहमद शाह अब्दाली के 10 हजार से ज्यादा अफगान सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था।
पानीपत युद्ध
- फोटो : फ्रीपिक
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विस्तार
इतिहास को अतीत का आईना कहा जाता है, पर कई बार यह इतना धुंधला होता है कि इसके प्रतिबिंब में कई शौर्य गाथाएं गुम हो जाती हैं। इसी विडंबना का एक उदाहरण कुंजपुरा की लड़ाई है, जिसमें मराठा वीरों ने अहमद शाह अब्दाली के 10 हजार से ज्यादा अफगान सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था, लेकिन इतिहास में इस वीरता को पानीपत की तीसरी जंग की तरह तवज्जो नहीं मिली। यह बेरुखी इसलिए भी चौंकाती है, क्योंकि पानीपत और कुंजपुरा की लड़ाई में सीधा संबंध है। कुंजपुरा में अफगानों की हार ने ही पानीपत की जंग का रास्ता तैयार किया था।
कुंजपुरा के युद्ध के बारे में इतिहासकार राम मोहन राय बताते हैं कि अब्दाली की सेना यमुना के एक तरफ थी और मराठे दूसरी ओर। यमुना में बाढ़ आई हुई थी। कोई नदी को पार नहीं कर रहा था, पर मराठों ने 17 अक्तूबर, 1760 को कुंजपुरा में अफगानों को शिकस्त का ऐसा जख्म दिया कि अब्दाली तिलमिला उठा। इसी तिलमिलाहट में उसने 25 अक्तूबर, 1760 को बागपत के पास गौरीपुर में यमुना नदी पार की। 14 जनवरी, 1761 को दोनों सेनाओं के बीच पानीपत के उग्राखेड़ी गांव में भीषण संग्राम हुआ, जिसमें मराठों को हार का मुंह देखना पड़ा। युद्ध से चार माह पहले ही मराठों ने कुंजपुरा के किले पर चढ़ाई की थी। सरहिंद के सूबेदार अब्दुल समद खान के साथ मोमिन खान और कुतुब शाह जैसे जनरल मोर्चा संभाले हुए थे।
कुतुब शाह ने ही मराठा सरदार दत्ताजी शिंदे की हत्या की थी। मराठा तोपखाने के प्रमुख इब्राहिम खां गार्की ने तोप के गोलों से किले में रास्ता बनाया। मराठे नजाबत, समद, मोमिन और कुतुब शाह की सैन्य टुकडि़यों पर कहर बनकर टूटे और कुतुब शाह का सिर धड़ से अलग कर दत्ताजी शिंदे की हत्या का बदला लिया। कुंजपुरा के लोग तो यहां तक कहते हैं कि जो गिनती के अफगान सैनिक जीवित बचे थे, वे मुंह में घास के तिनके दबाकर गाय की तरह बोलने लगे, ताकि मराठे उनकी जान बख्श दें।
पानीपत से लौटते समय अब्दाली ने कुंजपुरा की रियासत नवाब के परिवार को सौंप दी। अटक के गोरघुष्टी गांव (अब पाकिस्तान में) से 1929 में कुंजपुरा आए नजाबत खान को यह रियासत और नवाब की उपाधि नादिर शाह ने 1939 में करनाल के युद्ध के बाद सौंपी थी। इस युद्ध में मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला की सेना को हराकर ही नादिर शाह लाल किले से मयूर सिंहासन और कोहिनूर हीरा ले गया था। - चंद्रमोहन शर्मा
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कुंजपुरा के युद्ध के बारे में इतिहासकार राम मोहन राय बताते हैं कि अब्दाली की सेना यमुना के एक तरफ थी और मराठे दूसरी ओर। यमुना में बाढ़ आई हुई थी। कोई नदी को पार नहीं कर रहा था, पर मराठों ने 17 अक्तूबर, 1760 को कुंजपुरा में अफगानों को शिकस्त का ऐसा जख्म दिया कि अब्दाली तिलमिला उठा। इसी तिलमिलाहट में उसने 25 अक्तूबर, 1760 को बागपत के पास गौरीपुर में यमुना नदी पार की। 14 जनवरी, 1761 को दोनों सेनाओं के बीच पानीपत के उग्राखेड़ी गांव में भीषण संग्राम हुआ, जिसमें मराठों को हार का मुंह देखना पड़ा। युद्ध से चार माह पहले ही मराठों ने कुंजपुरा के किले पर चढ़ाई की थी। सरहिंद के सूबेदार अब्दुल समद खान के साथ मोमिन खान और कुतुब शाह जैसे जनरल मोर्चा संभाले हुए थे।
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कुतुब शाह ने ही मराठा सरदार दत्ताजी शिंदे की हत्या की थी। मराठा तोपखाने के प्रमुख इब्राहिम खां गार्की ने तोप के गोलों से किले में रास्ता बनाया। मराठे नजाबत, समद, मोमिन और कुतुब शाह की सैन्य टुकडि़यों पर कहर बनकर टूटे और कुतुब शाह का सिर धड़ से अलग कर दत्ताजी शिंदे की हत्या का बदला लिया। कुंजपुरा के लोग तो यहां तक कहते हैं कि जो गिनती के अफगान सैनिक जीवित बचे थे, वे मुंह में घास के तिनके दबाकर गाय की तरह बोलने लगे, ताकि मराठे उनकी जान बख्श दें।
पानीपत से लौटते समय अब्दाली ने कुंजपुरा की रियासत नवाब के परिवार को सौंप दी। अटक के गोरघुष्टी गांव (अब पाकिस्तान में) से 1929 में कुंजपुरा आए नजाबत खान को यह रियासत और नवाब की उपाधि नादिर शाह ने 1939 में करनाल के युद्ध के बाद सौंपी थी। इस युद्ध में मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला की सेना को हराकर ही नादिर शाह लाल किले से मयूर सिंहासन और कोहिनूर हीरा ले गया था। - चंद्रमोहन शर्मा

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