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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कृत अर्घ्यकमल मित्रा

Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Tue, 21 Apr 2026 07:08 PM IST
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सार

राष्ट्रीय पुरस्कार के बावजूद अर्घ्यकमल मित्रा कलकत्ता में रह कर बांग्ला फिल्मों केलिए ही काम करना चाहते हैं। ऋतुपर्ण घोष के साथ उन्होंने एड फिल्म्स, वीडियो और फीचर फिल्म सब तरह के काम किए हैं।

history of world cinema Arghyakamal Mitra Indian film editor films and work
विश्व सिनेमा की दुनिया (फाइल) - फोटो : Freepik.com
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विस्तार

जैसा अमूमन भारतीय माता-पिता चाहते हैं अर्घ्यकमल के पिता भी चाहते थे, बेटा इंजीनियर बने। पर यह कदापि नहीं होना था। बेटा जानता था वह भले ही कुछ बने या न बने पर इंजीनियर कभी नहीं बनेगा। और हुआ भी यही। वह शांति निकेतन के कला भवन जा कर प्रशिक्षित होना चाहता था क्योंकि उसका रेखांकन, ड्रॉइंग, पेंटिंग सब अच्छी थी। यहां भी वह चूक गया। अप्लाई करने की अंतिम तिथि निकल चुकी थी।

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किसी को बता नहीं सकता , घर वाले सोच रहे थे वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है। उसने इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया हुआ था पर जाता नहीं था। वह पड़ोसी चित्रकार गणेश हैलोई के पास गया, गणेश ने कहा वह प्रशिक्षित नहीं कर सकते हैं लेकिन उसका काम देख कर सुझाव दे सकते हैं। होनी को कुछ और मंजूर था। वही हुआ।
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‘अबोहमान’ की एडिटिंग के लिए नेशनल पुरस्कार

अर्घ्यकमल मित्रा बन गए एडीटर और इतने अच्छे बने कि नेशनल पुरस्कार अपने नाम किया। यह राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें ऋतुपर्ण घोष की फिल्म ‘अबोहमान’ की एडिटिंग के लिए 2009 में प्राप्त हुआ। करीब 100 फिल्मों के एडीटर कमल का फिल्मों से परिचय अजीब तरह से हुआ। वह भी मूक फिल्म 1922 की ‘फूलिश वाइव्स’ द्वारा।

यह पिछली सदी के साठ का दशक था। मूक फिल्म फेस्टिवल चल रहा था। बच्चे को कहीं छोड़ने का उपाय न देख कमल के माता-पिता उसे संग लेकर फिल्म देखने गए।

चारों ओर वयस्क के बीच से सिर उचका-उचका कर बच्चा फिल्म देखने की कोशिश करे। फिल्म श्वेत-श्याम मूक फिल्म जिसमें तमाम बातें परदे पर लिखी दीख रही थी। बच्चा खुश की वह समझ रहा है क्योंकि वह ‘दि;, ‘आर’, ‘बट’ जैसे शब्द पढ़ पा रहा था। बाद में उसने मजेदार फिल्म ‘साउंड ऑफ म्यूजिक’ देखी, उसे बहुत मजा आया।

राष्ट्रीय पुरस्कार के बावजूद अर्घ्यकमल मित्रा कलकत्ता में रह कर बांग्ला फिल्मों केलिए ही काम करना चाहते हैं। ऋतुपर्ण घोष के साथ उन्होंने एड फिल्म्स, वीडियो और फीचर फिल्म सब तरह के काम किए हैं।

घोष की तकरीबन सब फिल्मों के एडिटर का इस विशिष्ट निर्देशक से 1992-1993 में हुआ जो ऋतुपर्ण के जीवित रहते बना रहा। उन्होंने घोष की ‘दहन’ (1997), ‘बाड़ीवाली’, (2000), ‘चोखेर बाली: ए पैशन प्ले’ (2003), ‘अंतरमहल’ (2005), ‘सब चरित्र काप्लनिक’ (2009), ‘सत्यान्वेषी’ (2013) की एडिटिंग की। ऋतुपर्ण घोष के अलावा उन्होंने अपर्णा सेन, अनिरुद्ध रॉय चौधुरी, अंजन दत्ता, सुमन मुखोपाध्याय, बुद्धायन मुखर्जी आदि निर्देशकों की फिल्म की एडिटिंग की है।

एडिटिंग प्रारंभ करने के पूर्व वे पूणे के फिल्म एंड टेलिविजन इंस्ट्यूट ऑफ इंडिया प्रशिक्षण (1982-86) ले चुके थे। इस संस्थान में जाने के पहले वे फिल्म संबंधित साहित्य पढ़ रहे थे, एडटिंग संबंधित किताबें उन्होंने पढ़ी हुई थीं। एडिटिंग के जादू की गिरफ्त में वे थे। वे इसे सीखने को उत्सुक थे। वैसे वास्तव में एडिटिंग क्या है यह वे नहीं जानते थे सो इसी रहस्य ने उन्हें इस विभाग में प्रवेश केलिए उकसाया। इस ड्रीमलैंड में उन्होंने इस दौरान बहुत कुछ सीखा, तमाम विशेषज्ञों के संपर्क में आए, दुनिया भर की फिल्में देखीं उनका विश्लेषण, काट-छांट करना सीखा।

आश्चर्य नहीं, प्रतिभाशाली सत्यजित राय उनकी प्रेरणा रहे हैं। न केवल उनकी फिल्में देखीं वरन उनका लेखन भी हजम किया। राय की तरह पश्चिमी संगीत में रूचि रखने वाले अर्घ्यकमल पश्चिमी क्लासिक, इंडियन क्लासिक और अमेरिकन लोक संगीत के जानकार हैं।

सब तरह की एडिटिंग में कुशल मित्रा निर्देशक ऋतुपर्ण के बारे में कहते हैं, पहले जब एडिटिंग करते समय ऋतुपर्ण आकर उनके संग बैठ जाते थे, हस्तक्शेप नहीं करते थे लेकिन देखते रहते ते। कभीकदा कोई सुझाव दे देते जिसे मित्रा ठीक समझते मान लेते न ठीक लगने पर उस सुझाव का उपयोग नहीं करते। बाद में एडिटिंग के समय निर्देशक कदाचित ही आता।

एडिटिंग कर डीवीडी में मित्रा ऋतुपर्ण के पास भेज देते अगर कोई विचार-विमर्श होता तो वे फोन पर कर लेते। ऋतुपर्ण घोश की अधिकांश फिल्में चैम्बर ड्रामा होती हैं जिसमें संवाद प्रमुख होते हैं अत: एडिटिंग का कमाल दिखाने की खास गुंजाइश नहीं होती हैं। इसीलिए वे मजाक करते हुए मित्रा से कहते, तुम्हें मेरी फिल्मों केलिए कभी पुरस्कार नहीं मिलेगा। मगर अर्घ्यकमल मित्रा को ऋतुपर्ण घोष की फिल्म केलिए पुरस्कार मिला।

मित्रा बताते हैं, घोष की फिल्मों की स्क्रिप्ट इतनी अच्छी होती थी कि एडिटिंग का काम बहुअत आसान होता था। वे ‘बाड़ीवाली’ फिल्म का उदाहरण देते हुए कहते हैं, इसकी एडीटिंग में उन्हें बहुत मजा आया, खासकर ड्रीम स्विक्वेंस जिसकी खूब प्रशंसा होती है, उसके लिए मित्रा को कुछ खास एडिटिंग नहीं करनी पड़ी थी। वे घोष की ओर्गैनिक स्क्रिप्ट की प्रशंसा करते हैं।

लेकिन ‘चोखेर बाली’ के लिए मित्रा को एडिटिंग में कई नई बातें करनी पड़ीं। घोष ने उन्हें बता दिया था कि फिल्म जिस बीते जमाने की है उसके अनुसार पात्र के क्रियाकलाप की गति दीमी होगी। साथ ही आधुनिकता को भी समाहित करना था।

बीसवीं सदी की कहानी के कथानक का फ्लो आज का होना था। इसी तरह ‘अबोहमान’ की एडिटिंग को मित्रा एवं घोष ने कई बार किया। फिल्म का दूसरा हिस्सा पहले भाग की अपेक्षाकृत सरल था। इस हिस्से की गति बढ़ाने केलिए मित्रा ने कई संरचनात्मक परिवर्तन किए। अर्घ्यकमल को ऋतुपर्ण की फिल्मों में से ‘रेनकोट’ में अपना एडटिंग का काम सबसे अदिक अच्छा लगता है। हालांकि इस फिल्म की एडिटिंग उनके लिए बहुत चुनौत भरी थी।

अक्सर एडीटर फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में उतर जाते हैं। अर्घ्यकमल मित्रा का कहना है, अगर मैं निर्देशक बना भी तो एडीटर रहना कभी नहीं छोड़ूंगा। यह होता है, अपने पेशे केलिए समर्पण, लगाव एवं जुनून जो मित्रा में भरपूर है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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