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सियासत: ‘आप’ सांसदों के झाडू़ छोड़ कमल थामने के मायने!

Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Sat, 25 Apr 2026 03:22 PM IST
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सार

 शुक्रवार को आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों द्वारा अचानक पार्टी के नेता राघव चड्ढा की अगुवाई में आप को अलविदा कहकर भाजपा में शामिल हो जाने की खबर ने नया राजनीतिक तूफान ला दिया है। इस बड़े दलबदल के कई सियासी सवाल उठ रहे हैं।

Raghav Chadha along with other Aam Aadmi Party Rajya Sabha MP quit party
राघव चड्ढा के साथ आप से भाजपा में शामिल होने वाले राज्यसभा सांसद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

आप आदमी पार्टी (आप) के 7 राज्यसभा सांसदों का अचानक झाड़ू छोड़ कमल थामने को राजनीतिक धमाके के साथ-साथ अब पंजाब में ‘ऑपरेशन लोटस’ की पूर्वपीठिका के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि पंजाब  के पानी में कमल मुश्किल से ही खिल पाता है, लेकिन आप की झाड़ू से मोटी सींके निकाल लेने का राज्य में 10 माह बाद होने वाले विस चुनाव में आप की जमावट पर असर पड़ सकता है। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि कमल के आगे झाड़ू मुरझा ही जाएगी।

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कुछ राजनीतिक प्रेक्षक इसे पश्चिम बंगाल में अपनी जीत के प्रति सौ फीसदी आश्वस्ति न होने के चलते भाजपा का माइंड डायवर्शन गेम भी मान रहे हैं। बहरहाल इससे भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के खाते में कामयाबी का पहला तमगा जरूर माना जा सकता है।
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दरअसल शुक्रवार को आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों द्वारा अचानक पार्टी के नेता राघव चड्ढा की अगुवाई में आप को अलविदा कहकर भाजपा में शामिल हो जाने की खबर ने नया राजनीतिक तूफान ला दिया है। 

इस बड़े दलबदल के कई सियासी सवाल उठ रहे हैं। मसलन, क्या यह बंगाल के चुनाव परिणाम अनुकूल न रहने पर नतीजों के पहले राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की नया सियासी नरेटिव गढ़ने की चाल है या फिर कभी देश में व्यवस्थागत परिवर्तन लाने के दावे के साथ सत्ता में आई चौदह साल पुरानी आम आदमी पार्टी में बिखराव का यह एक और बड़ा एपिसोड है? इस सामूहिक दलबदल अथवा पार्टी मर्जर से भाजपा को पंजाब में कुछ फायदा मिलेगा या फिर यह केवल मौका साधकर फेंकी गई राजनीतिक गुगली है, जिसका तात्कालिक लक्ष्य आप कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ना है?

आप नेता कह रहे हैं कि पंजाब की जनता इन गद्दार नेताओं को सबक सिखाएगी, इसमें कितनी सच्चाई है? जाने वाले आप सांसदों का पंजाब से का क्या सम्बन्ध है और क्या इससे राज्य में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में आप की वापसी की कोशिशों पर असर पड़ेगा? और यह भी कि क्या इस तगड़े झटके के बाद आम सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल की कार्यशैली में कोई अंतर आएगा या पार्टी जैसी चल रही है, वैसी ही चलती रहेगी? साथ ही इस दलबदल का दांव का देश की बाकी विपक्षी पार्टियों पर क्या असर होगा? 

भारत की राजनीतिक पार्टियां

भारत में मुख्य रूप से चार तरह की राजनीतिक पार्टियां हैं। ये हैं वैचारिक, जातिवादी,  वंशवादी और व्यक्ति केन्द्रित पार्टियां। व्यक्तिवादी पार्टी किसी एक बड़े नेता से शुरू होकर उसी पर खतम हो जाती है।

‘आम आदमी पार्टी’ का जन्म ही भ्रष्टाचार के खिलाफ और  वैकल्पिक राजनीति की कोख से हुआ था, लेकिन बाद में वह व्यक्ति केन्द्रित यानी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल आधारित पार्टी में तब्दील हो गई। खुद केजरीवाल भ्रष्टाचार के आरोपो में घिर गए। पार्टी के सारे फैसले अरविंद केजरीवाल की मनमर्जी, राजी नाराजी और स्वार्थों के आधार पर होने लगे।

हालांकि आप देश की ऐसी पहली सियासी पार्टी है, जिसने अपने जन्म के मात्र दस साल में दो राज्यों में सरकार बना ली। लेकिन दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल की निरंकुश कार्यशैली के चलते आप के जन्मदाता नेता एक-एक कर पार्टी से दूर होते गए। उसी श्रृंखला में राघव चड्ढा तथा संदीप पाठक का जाना आप के लिए बड़ा झटका है।

यह तो साफ है कि आप में असंतोष की आग भीतर ही भीतर सुलग रही थी, जिसने राघव चड्ढा को केजरीवाल द्वारा राज्यसभा के दलीय उपनेता के पद से हटाने के बाद लपट का रूप ले लिया। हैरानी की बात यह है कि पार्टी छोड़कर बीजेपी में जाने वालों में वो अशोक मित्तल भी हैं, जिन्हें पिछले महीने ही राज्यसभा में दल का नया उपनेता बनाया गया था। 

भाजपा का षड्यंत्र या नेताओं की गद्दारी?

उधर आप नेता इस पूरे कांड को भाजपा का षड्यंत्र बता रहे हैं। यह साफ है कि दलबदल करने वाले सभी भाजपा के संपर्क में थे और भाजपा ने तो केवल मौके को लपक लिया। चूंकि आप के राज्यसभा में 10 में से 7 यानी कि एक तिहाई सांसद एक साथ भाजपा में गए हैं, इसलिए उन पर दलबदल का कानून लागू नहीं होगा। उनकी सदस्यता बची रहेगी। राज्यसभा में भाजपा नीत एनडीए सांसदों  की संख्या बढ़कर 148 हो जाएगी।

उधर आप नेता इस दलबदल को सीधे-सीधे पार्टी से गद्दारी करार दे रहे हैं और कह रहे हैं कि ये लोग अपनी निजी मजबूरियों के कारण बीजेपी के आगे झुक गए। पंजाब की जनता कभी गद्दारों को माफ नहीं करती है। यह बात अलग है कि खुद पंजाब में लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की मौकापरस्ती और दलबदल का निरंतर इतिहास रहा है।  

जो सांसद आप से भाजपा में गए हैं, उनका पंजाब से रिश्ता यह है कि वो सभी पंजाब कोटे की सीट से राज्यसभा में गए हैं। रा.स. में आप के कुल 10 सांसद हैं, इनमें से 7 पंजाब तथा 3 दिल्ली कोटे से हैं। दिल्ली वाले अभी आप में ही हैं। लेकिन इस दलबदल के बाद अब पंजाब से ‘आप’ का कोई राज्य सभा सदस्य नहीं रहेगा।

हालांकि इन सदस्यों का कार्यकाल खत्म होने के बाद उनका राजनीतिक भविष्य क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। उधर ‘आप’ ने दलबदलू सांसदों की सदस्यता रद्द करने के लिए कानूनी कार्रवाई के लिए करने की बात कही है, लेकिन उसका कुछ खास मतलब नहीं है। 

पार्टी छोड़ने वाले नेताओं का जनाधार?

जिन सांसदों ने आप छोड़कर भाजपा का दामन थामा है, उनमें से संदीप पाठक अपनी संगठनात्मक क्षमता के लिए जाने जाते हैं, राघव चड्ढा भी पार्टी के रणनीतिकारों में रहे हैं। बाकी का कोई खास जनाधार नहीं है। ऐसे में इन सब के भाजपा में आने से पार्टी को पंजाब में कोई लाभ मिलने की संभावना क्षीण ही है, सिवाय आप में घमासान का नरेटिव गढने के। वैसे भी पंजाब में भाजपा हाशिए की और हिंदूवादी पार्टी मानी जाती है, बहुसंख्यक सिख उसे संदेह की नजर देखते हैं। 

पिछले विस चुनाव में भी भाजपा पंजाब में 73 सीटों पर लड़ी थी और केवल 2 सीटें जीत पाई थी। उसका शिरोमणि अकाली दल के साथ चला बरसों पुराना गठबंधन  भी टूट गया। जबकि  पंजाब के मतदाताओं ने राज्य में पूर्व में सत्तारूढ़ कांग्रेस की जगह आम आदमी पार्टी का  विकल्प चुन लिया।

अलबत्ता इस दलबदल से पंजाब के मतदाताओं में यह संदेश तो गया ही है कि सत्तारूढ़ पार्टी आप में भीतर घमासान मचा है। हालांकि इससे नरेटिव से वहां के मतदाता का मानस कितना बदलेगा, कहना मुश्किल है।

राजनीतिक जानकार इसे पंजाब में पार्टी को मजबूत करने की भाजपा की पहल के रूप में देख रहे हैं, जो परोक्ष रूप से कांग्रेस के लिए चुनौती भी है। हालांकि कांग्रेस वहां अगला विस चुनाव किस तरह लड़ेगी, यह काफी कुछ केरल विस चुनाव नतीजे पर भी निर्भर करेगा, जहां पार्टी सत्ता की मजबूत दावेदार है, लेकिन कुशल नेतृत्व और सामंजस्य के अभाव में अगर वहां भी वह कुर्सी पर काबिज होने में नाकाम रही तो उसका असर समूची कांग्रेस और उसके मनोबल पर दिखेगा, जिसमें पंजाब भी शामिल है।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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