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डॉलर पर खाड़ी की टेढ़ी नजर: जंग अगर बाजार की सांसें रोक दे तो देशों को करंसी का भरोसा चाहिए

Zahid Khan जाहिद खान
Updated Sat, 25 Apr 2026 07:22 PM IST
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सार

मामला सिर्फ इतना नहीं है कि ट्रंप ने यूएई के लिए करेंसी स्वैप की बात कर दी। असली बात यह है कि खाड़ी के एक बड़े तेल देश ने अमेरिका को यह एहसास करा दिया है कि अगर डॉलर की सप्लाई अटकी तो खेल दूसरी तरफ भी जा सकता है। यही वह बात है जो ऊपर से आर्थिक लगती है, लेकिन अंदर से बहुत बड़ा सियासी और रणनीतिक संदेश छिपाए बैठी है।

West Asia Tension Gulf Casts Wary Eye on US Dollar Stifles in Markets Nations Will Seek Currency Security
अमेरिका ईरान युद्ध (सांकेतिक) - फोटो : Amar Ujala Graphics
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विस्तार

बड़ी खबर यह नहीं है कि ट्रंप ने यूएई के साथ कोई नई मेहरबानी कर दी। बड़ी खबर यह है कि खाड़ी का एक बड़ा तेल देश ऐसे समय में डॉलर की बात कर रहा है, जब पूरा इलाका पहले ही तनाव में है। 21 अप्रैल 2026 को ट्रंप ने खुद कहा कि अमेरिका और यूएई के बीच करेंसी स्वैप पर विचार हो रहा है। उसी दौरान यूएई के केंद्रीय बैंक की तरफ से अमेरिकी ट्रेजरी और फेड के सामने डॉलर की उपलब्धता का सवाल भी उठा। दूसरी तरफ यूएई के राजदूत ने बाहर आकर यह कहा कि हमें किसी आर्थिक सहारे की जरूरत नहीं है यानी ऊपर से सब संभला हुआ दिखाया जा रहा है लेकिन अंदर मामला गंभीर है।

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अब इसे बहुत आसान तरीके से समझें। करेंसी स्वैप का मतलब यह होता है कि जरूरत पड़ने पर एक देश दूसरे देश की मुद्रा तक पहुंच बना सके ताकि बाजार में घबराहट न फैले और बैंकिंग सिस्टम हिले नहीं। फेड और यूरोपीय सेंट्रल बैंक दोनों यही समझाते हैं। सीधी बात यह है कि जब कोई देश डॉलर की लाइन पक्की करने लगे तो समझ लो उसे आगे की टेंशन दिख रही है। यह सिर्फ बैंक वालों का मामला नहीं होता, यह पूरे सिस्टम की सांस का मामला होता है।
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1. इस खबर की पहली बड़ी बात यह है कि यह तेल से ज्यादा भरोसे की खबर है। बरसों से तेल का बड़ा कारोबार डॉलर में होता आया है। इसी वजह से अमेरिका का नोट दुनिया भर में चलता है, लेकिन जब यूएई जैसा देश डॉलर की उपलब्धता को लेकर इतनी गंभीर बात करें तो समझो कि अब अमेरिका के अपने साथी भी बैकअप सोच रहे हैं। डॉलर अभी गिरा नहीं है, उसकी ताकत अभी भी बहुत बड़ी है, लेकिन कुर्सी हिलती भी ऐसे ही है, जब अपने ही लोग पूछना शुरू कर दें कि अगर कल रास्ता बंद हुआ तो क्या करेंगे।

2. दूसरी बड़ी बात यह है कि यूएई अब सिर्फ एक तरफ खड़े होकर खेलना नहीं चाहता। एक तरफ उसे अमेरिका से सुरक्षा चाहिए, पुराना रिश्ता चाहिए, बैंकिंग का भरोसा चाहिए। दूसरी तरफ वह यह भी चाहता है कि अगर वॉशिंगटन की जंग या फैसले से उसका बाजार हिले, तो उसके पास दूसरा रास्ता भी खुला रहे। यही वजह है कि एक तरफ डॉलर की बात अंदर हो रही है और दूसरी तरफ बाहर मजबूती दिखाई जा रही है। यानी दोस्ती भी रखो और अपना बचाव भी। यही नई खाड़ी चाल है।

3. तीसरी बात आम इंसान की जेब से जुड़ी है। बहुत लोग सोचते हैं कि डॉलर, फेड, स्वैप, केंद्रीय बैंक, ये सब ऊपर की बातें हैं, लेकिन असर नीचे आता है। अगर तेल वाले देशों को डॉलर की टेंशन होने लगे तो उसका असर तेल के सौदों, जहाजरानी, बीमा, आयात के बिल और आखिर में महंगाई तक जा सकता है। 22 अप्रैल 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका-ईरान सीजफायर को लेकर अनिश्चितता के बीच बाजार दबाव में आए और होर्मुज के रास्ते तेल सप्लाई पर खतरे की आशंका से कच्चा तेल करीब 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा यानी यह खबर कल पेट्रोल, भाड़ा और रोज के खर्च तक पहुंच सकती है।

4. चौथी बात सबसे अहम है। ट्रंप ने खुद “मनी स्वापिंग” जैसी बात छेड़ी। इसका मतलब यह है कि उन्हें भी समझ है कि जंग सिर्फ मिसाइलों से नहीं चल रही। असली जंग बैंकिंग के रास्तों में भी है, डॉलर की नसों में भी है, तेल की सप्लाई में भी है, बीमा और जहाजरानी में भी है। अगर अमेरिका यूएई जैसे साथी के लिए वित्तीय सुरक्षा की सोच रहा है तो इसका मतलब साफ है कि उसे डर है कहीं जंग का असर सीधे बाजार के पेट में न घुस जाए यानी बंदूक के पीछे बैंक भी खड़ा किया जा रहा है।

5. पांचवीं बात चीन की है। चीन को आज ही डॉलर हटाना नहीं है। उसे सिर्फ इतना चाहिए कि दुनिया यह सोचना शुरू कर दे कि हर सौदा डॉलर में ही क्यों हो? बड़े बदलाव एक दिन में नहीं आते। पहले बात शुरू होती है, फिर थोड़ा इस्तेमाल होता है, फिर बैकअप बनता है, फिर आदत बनती है। यूरोपीय सेंट्रल बैंक और चीन के केंद्रीय बैंक के बीच 2025 में स्वैप व्यवस्था का बढ़ना भी दिखाता है कि बड़ी ताकतें मुद्रा को सिर्फ नोट नहीं, हथियार की तरह भी देखती हैं इसलिए अगर कल तेल के कुछ सौदों में दूसरी मुद्रा की बात बढ़ती है तो चीन को बिना एक भी गोली चलाए फायदा मिल सकता है।

6. छठी बात सौदेबाजी की है। यह भी हो सकता है कि यूएई ने यह सब सिर्फ डर की वजह से नहीं किया हो बल्कि अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए भी किया हो। मतलब साफ है, अगर आपकी जंग हमारे बाजार की सांस रोक सकती है तो हमें सिर्फ बयान नहीं, भरोसा भी चाहिए। हमें यह यकीन चाहिए कि आपकी लड़ाई का बिल हम अपने सिर पर न उठाएं इसलिए इस खबर को सिर्फ आर्थिक मुश्किल समझना कम होगा। यह वॉशिंगटन को दिया गया एक सीधा संदेश भी है कि खाड़ी अब सिर्फ सुनने वाली जगह नहीं रही, अब वह शर्तें भी समझती है, डर भी समझती है और अपने विकल्प भी खुला रखती है।

7. अब सातवीं और सबसे जरूरी बात। अभी यह कहना जल्दी होगी कि यूएई ने खुलकर डॉलर छोड़ने की धमकी दे दी है। ऐसा सीधा सार्वजनिक बयान सामने नहीं है। जो साफ है वह यह कि ट्रंप ने स्वैप पर विचार की बात कही, यूएई की तरफ से डॉलर पहुंच का सवाल उठा और ऊपर से मजबूती का दावा भी किया गया लेकिन कई बार असली बात प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, इशारों में बोली जाती है इसलिए इस पूरी खबर को ऐसे समझो कि डॉलर अभी गिरा नहीं है लेकिन उसके नीचे पहली चरमराहट जरूर सुनाई दे रही है।

इसका सार यह है कि यूएई ने अमेरिका से भीख नहीं मांगी, उसने उसे याद दिलाया है कि दुनिया सिर्फ ताकत से नहीं चलती, पैसे के भरोसे से भी चलती है और जिस दिन तेल वाले देश यह सोचने लगें कि हर बिल डॉलर में ही क्यों बने, उसी दिन से अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत पर असली सवाल शुरू हो जाएगा। आज आवाज हल्की है, कल यही बहुत बड़ा शोर बन सकती है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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