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दूसरा पहलू: कबाड़ से जुगाड़ के उस्ताद अरविंद गुप्ता, विज्ञान सिखाने की राह बनी जीवन का मिशन
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अरविंद गुप्ता
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
सत्ता और सरकार से परे कुछ ऐसे प्रतिभावान लोग होते हैं, जो समाज के कारगर विकास में योगदान करते रहते हैं। पुणे में बसे अरविंद गुप्ता उनमें से एक हैं। जाने-माने खिलौना-निर्माता अरविंद गुप्ता केवल बेकार चीजों से खिलौने बनाकर विज्ञान सिखाते ही नहीं, बल्कि देश-दुनिया के बाल-साहित्य का हिंदी में अनुवाद कर उसे अपनी वेबसाइट पर मुफ्त उपलब्ध भी कराते हैं। ऐसा वह कई बरसों से कर रहे हैं। अरविंद गुप्ता ‘आईआईटी-कानपुर’ में पढ़े हैं। पेशे से इंजीनियर हैं, पर उनका मन वहां नहीं लगा। वह हमेशा कुछ सार्थक करने की तलाश में रहे और अंततः उन्हें विज्ञान को सरल और रोचक ढंग से लोगों तक पहुंचाने का रास्ता सबसे उपयुक्त लगा। उन्होंने कबाड़ यानी बेकार वस्तुओं से विज्ञान सिखाने की राह चुनी, जो आगे चलकर उनके जीवन का मिशन बन गई। ‘किशोर भारती’ से जुड़कर उन्होंने कई महत्वपूर्ण प्रयोग किए। वहां उन्होंने खेल-खेल में सीखने की विधि अपनाते हुए माचिस की तीलियों से गणित और साधारण बटन से घिरनी जैसे प्रयोग विकसित किए। उस समय ‘किशोर भारती’ में सीखने का सजीव माहौल था, जहां प्रोफेसर यशपाल और शिक्षाविद कृष्ण कुमार जैसे लोग भी जुड़े रहे।प्रसिद्ध वैज्ञानिक, शिक्षाविद डॉ. अनिल सद्गोपाल द्वारा स्थापित इस संस्था ने शिक्षा और ग्रामीण विकास में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। अरविंद गुप्ता ने यहां आकर सस्ती और सुलभ चीजों से विज्ञान सिखाने पर विशेष ध्यान दिया। माचिस की तीलियों और साइकिल के वाल्व ट्यूब से ज्यामितीय आकृतियां बनाकर उन्होंने बच्चों को गणित के सिद्धांत समझाए। बटन से बनी घिरनी के जरिये चक्के और लीवर के सिद्धांत भी सरलता से समझाए जा सकते थे। वह जहां भी रहे, साधारण वस्तुओं में संभावनाएं खोजते रहे। छत्तीसगढ़ के दल्ली-राजहरा में उन्होंने ट्रिपर-ट्रक का मॉडल माचिस से बनाया और बाद में उसे अपनी किताब में शामिल किया।
उन्होंने भारत ज्ञान विज्ञान समिति, नई दिल्ली के साथ मिलकर सौ से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन किया, जिनकी लाखों प्रतियां बिकीं। साथ ही नेशनल बुक ट्रस्ट के सलाहकार के रूप में भी काम किया। कुल मिलाकर, अरविंद गुप्ता का काम कई मायनों में उल्लेखनीय व प्रेरणादायक है। भारत सरकार ने उन्हें उनके कामों के लिए पद्मश्री (2018) से भी सम्मानित किया है। उनके काम न केवल सराहनीय हैं, बल्कि अनुकरणीय भी हैं। (सप्रेस)

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