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विधायकों का हस्ताक्षर विवाद: सत्ता की ठसक से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं ममता-अभिषेक
सार
कोलकाता पुलिस और सीआईडी मामले की जांच में जुटी हैं। रिपोर्ट आने और आगे की कार्रवाई शुरू होने के बाद यह विवाद अदालत तक पहुंच सकता है। अदालती प्रक्रिया और विधानसभा अध्यक्ष के संवैधानिक अधिकारों को देखते हुए इतना स्पष्ट है कि तृणमूल कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौतियों का दौर अभी समाप्त होता नहीं दिख रहा।
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ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
सत्ता जाने के बाद भी ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के व्यवहार में सत्ता की ठसक साफ दिखाई दे रही है। ममता बनर्जी आज भी सोशल मीडिया पर अपने नाम के साथ पूर्व मुख्यमंत्री लिखने को तैयार नहीं हैं। उनके फेसबुक और एक्स हैंडल पर अब भी 15वीं, 16वीं और 17वीं विधानसभा की मुख्यमंत्री लिखा हुआ है। इससे यही प्रतीत होता है कि वे विधानसभा चुनाव के परिणामों को सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रही हैं।
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दूसरी ओर, अभिषेक बनर्जी ने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष, उपनेता प्रतिपक्ष और मुख्य सचेतक की नियुक्ति संबंधी एक पत्र विधानसभा अध्यक्ष को भेजा। विधानसभा अध्यक्ष ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। जब तृणमूल कांग्रेस ने इस पर आपत्ति जताई, तो विधानसभा अध्यक्ष ने सवाल उठाया कि पार्टी के महासचिव किस अधिकार से यह प्रस्ताव भेज रहे हैं। उन्होंने पूछा कि जिन विधायकों ने इन नेताओं का चयन किया है, उनके हस्ताक्षर कहां हैं?
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इसके बाद नामित नेता प्रतिपक्ष शोभनदेव चट्टोपाध्याय, नामित उपनेता असीमा पात्रा व नयना बंदोपाध्याय, नामित मुख्य सचेतक फिरहाद हकीम और पार्टी के मुख्य प्रवक्ता कुणाल घोष कुछ विधायकों के साथ विधानसभा परिसर में डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के नीचे धरने पर बैठ गए और नारेबाजी करने लगे। वे विधानसभा अध्यक्ष से मिलने की मांग करते हुए कई बार उनके कक्ष के बाहर भी पहुंचे, लेकिन उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा।
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जब विधानसभा अध्यक्ष ने विधायकों के हस्ताक्षरयुक्त प्रस्ताव की मांग की, तब 6 मई की उसी चिट्ठी को दोबारा भेजा गया, जिस पर बाद में 19 मई को विधायकों के हस्ताक्षर कराए गए।
आरोप यह भी है कि इस पत्र पर कुछ ऐसे विधायकों के हस्ताक्षर मौजूद हैं, जो 6 मई की बैठक में शामिल ही नहीं थे। जैसे, कैनिंग पूर्व विधानसभा सीट से विधायक मोहम्मद बहरुल इस्लाम। ऐसे कई विधायक हैं जो 6 मई की बैठक में नहीं थे लेकिन उनके हस्ताक्षर पत्र में हैं।
पूरी घटना को सिलसिलेवार समझते हैं। 4 मई को मतगणना होती है व ममता बनर्जी की सत्ता का अंत होता है। 6 मई को टीएमसी विधायक दल की बैठक होती है, ममता बनर्जी स्वयं पार्टी का नेता, उप नेता और मुख्य सचेतक चुन देती हैं। अभिषेक बनर्जी उसके बाद इससे सम्बंधित पत्र विधानसभा अध्यक्ष कार्यालय को भेज देते हैं।
सीआईडी तक पहुंच गया मामला
राजनीति अब यहीं से करवट लेती दिख रही है। चुनावी पराजय के बाद जहां तृणमूल कांग्रेस विद्रोह और पलायन की समस्या से जूझ रही थी, वहीं अब वह हस्ताक्षर विवाद के संकट में फंसती नजर आ रही है। कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों में असमानता की शिकायत मिलने के बाद विधानसभा की ओर से कोलकाता के हेयर स्ट्रीट थाने में शिकायत दर्ज कराई गई। इसके बाद पुलिस ने सीआईडी की मदद से जांच शुरू कर दी है।
हस्ताक्षरों की सत्यता परखने के लिए सीआईडी की टीम हस्ताक्षर विशेषज्ञ (हैंडराइटिंग एक्सपर्ट) और वीडियोग्राफर के साथ कई टीएमसी विधायकों के घर पहुंची। टीम ने चौरंगी की विधायक नयना बंदोपाध्याय, बेलेघाटा के विधायक कुणाल घोष, कैनिंग पूर्व के विधायक मोहम्मद बहरुल इस्लाम और डोमजूर के विधायक तापस माइती से पूछताछ की। बोलपुर के विधायक चंद्रनाथ सिन्हा के घर भी टीम पहुंची, हालांकि इसकी स्पष्ट वजह सामने नहीं आई।
दरअसल, तृणमूल कांग्रेस के एक प्रस्ताव पर 80 में से 70 विधायकों के हस्ताक्षर होने का दावा किया गया है। अब उन्हीं हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। जब कुछ तृणमूल कांग्रेस के विधायक स्वयं कह रहे हैं कि उन्होंने उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं किए, तो फिर सवाल उठता है कि वे हस्ताक्षर किसने किए?
विवाद की शुरुआत कैनिंग पूर्व के विधायक मोहम्मद बहरुल इस्लाम के हस्ताक्षर को लेकर हुई। उन्होंने कहा कि जांच पूरी होने तक वह इस मामले पर अधिक टिप्पणी नहीं करेंगे। उनके अनुसार जांच अधिकारियों ने उनसे पूछा कि 6 मई को वह कहां थे। उन्होंने बताया कि उस दिन वह अपने घर भांगड़ में थे।
उन्हें एक बैठक से संबंधित हस्ताक्षर दिखाया गया, जबकि उनका कहना है कि वह उस दिन किसी बैठक में शामिल नहीं हुए थे और चुनाव बाद हुई हिंसा के कारण घर पर ही थे।
सीआईडी की टीम चौरंगी की विधायक और नामित उपनेता नयना बंदोपाध्याय के घर भी काफी देर तक रही। नयना बंदोपाध्याय ने बताया कि पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई है। उनका कहना था कि यह कोई विधानसभा का दस्तावेज नहीं, बल्कि पार्टी का दस्तावेज है। उनके अनुसार पार्टी ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया था और उन्होंने उस कागज पर हस्ताक्षर नहीं किए थे क्योंकि वहां पर्याप्त जगह नहीं थी।
वहीं, नामित नेता प्रतिपक्ष और बालीगंज के विधायक शोभनदेब चटर्जी ने आरोप लगाया कि विधायकों को अनावश्यक रूप से परेशान और भयभीत किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि नयना बंदोपाध्याय ने हस्ताक्षर किए थे, बावजूद इसके उनसे कहा गया कि हस्ताक्षर उनके नहीं हैं। जांच अधिकारी उनका पैन कार्ड का फोटो भी लेकर गए।
हस्ताक्षरों में समानता न होना खड़े करता है सवाल
दिलचस्प बात यह है कि नयना बंदोपाध्याय द्वारा विधायक पद की शपथ लेने के बाद किए गए आधिकारिक हस्ताक्षर और विवादित प्रस्ताव पर मौजूद हस्ताक्षर में समानता नहीं पाई जा रही है। ऐसे में अब सबकी नजर हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट पर टिकी है, जो इस विवाद की दिशा तय कर सकती है।
फिलहाल कोलकाता पुलिस और सीआईडी मामले की जांच में जुटी हैं। रिपोर्ट आने और आगे की कार्रवाई शुरू होने के बाद यह विवाद अदालत तक पहुंच सकता है। अदालती प्रक्रिया और विधानसभा अध्यक्ष के संवैधानिक अधिकारों को देखते हुए इतना स्पष्ट है कि तृणमूल कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौतियों का दौर अभी समाप्त होता नहीं दिख रहा।
संकेत साफ हैं कि तृणमूल कांग्रेस के लिए राजनीतिक संकट की यह कहानी अभी लंबी चलने वाली है।
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