जिजीविषा: कुछ बनने की दौड़ में जीवन का एक भूला हुआ प्रश्न
जीवन में 'बनना' और 'होना' दो अलग दृष्टियां हैं। केवल उपलब्धियों की दौड़ व्यक्ति को असंतोष और थकान देती है। वास्तविक संतुलन तब आता है जब विकास के साथ वर्तमान को स्वीकारते हुए सजगता, अनुभव और आंतरिक शांति के साथ जीवन जिया जाए।
विस्तार
हम अपने जीवन का कितना समय “बनने” में बिताते हैं? बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि हमें कुछ बनना है: एक सफल पेशेवर, एक प्रतिष्ठित व्यक्ति, एक बेहतर संस्करण, एक ऐसी पहचान जो समाज में मान्यता प्राप्त करे। स्कूल में पूछा जाता है कि बड़े होकर क्या बनोगे, नौकरी में पूछा जाता है कि आगे क्या बनना चाहते हो, और जीवन के हर चरण में ऐसा लगता है जैसे वर्तमान कभी पर्याप्त नहीं है और हमें हमेशा किसी अगले रूप की ओर बढ़ना है। धीरे-धीरे यह भावना इतनी सामान्य हो जाती है कि हम यह प्रश्न ही भूल जाते हैं कि क्या जीवन केवल बनने की यात्रा है, या कभी-कभी केवल होने की भी आवश्यकता होती है।
“बनना” और “होना” दो अलग-अलग जीवन दृष्टियाँ हैं। बनने की मानसिकता में व्यक्ति स्वयं को एक परियोजना की तरह देखता है जैसे वो कुछ अधूरा सा है, जिसे लगातार सुधारना है, आगे बढ़ाना है, और किसी लक्ष्य तक पहुँचाना है। इसके विपरीत “होना” उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ व्यक्ति अपने अस्तित्व को वर्तमान में अनुभव करता है, बिना यह महसूस किए कि उसे अभी किसी और रूप में बदलना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं कि विकास या प्रयास अनावश्यक हैं, बल्कि यह समझना है कि जीवन का मूल्य केवल भविष्य की उपलब्धियों में नहीं, बल्कि वर्तमान अनुभव में भी निहित है।
मनोविज्ञान में इस अंतर को कई तरीकों से समझाया गया है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक कार्ल रॉजर्स ने कहा था कि मनुष्य का स्वाभाविक विकास तब होता है जब वह स्वयं को स्वीकार करता है, न कि तब जब वह लगातार स्वयं को अस्वीकार करते हुए बदलने की कोशिश करता है। इसी तरह सकारात्मक मनोविज्ञान के कई अध्ययन यह बताते हैं कि अत्यधिक लक्ष्य-केंद्रित जीवन अक्सर चिंता और थकान को जन्म देता है, क्योंकि व्यक्ति हमेशा यह महसूस करता रहता है कि वह अभी पर्याप्त नहीं है। जब जीवन केवल उपलब्धियों की सूची बन जाता है, तब व्यक्ति वर्तमान क्षण का अनुभव खो देता है। इसके विपरीत जब व्यक्ति “होने” की अवस्था में होता है, तो वह अनुभव, संबंध और आंतरिक संतुलन को अधिक गहराई से महसूस कर पाता है।
आध्यात्मिक परंपराएँ भी इसी अंतर को लंबे समय से समझाती रही हैं। भारतीय दर्शन में उपनिषद और गीता भी इस बात की ओर संकेत करते हैं कि मनुष्य का मूल स्वरूप पहले से ही पूर्ण है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि व्यक्ति का कर्तव्य कर्म करना है, परंतु अपने अस्तित्व का मूल्य केवल परिणामों से नहीं जोड़ना चाहिए। योग और ध्यान की परंपराएँ भी इसी विचार को प्रकट करती हैं कि साधना केवल किसी उपलब्धि तक पहुँचने का साधन नहीं, बल्कि अपने भीतर उपस्थित होने की प्रक्रिया है।
यह दृष्टि केवल भारत तक सीमित नहीं है।
प्राचीन यूनानी दार्शनिकों ने भी इस विषय पर विचार किया था। उदाहरण के लिए, अरस्तू ने “यूडैमोनिया” की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसका अर्थ है ऐसा जीवन जिसमें व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार जीता है और अपने अस्तित्व की संभावनाओं को संतुलन के साथ विकसित करता है। बौद्ध दर्शन में भी “साक्षीभाव” या जागरूकता का विचार यही बताता है कि व्यक्ति को अपने अनुभवों को देखने और समझने की क्षमता विकसित करनी चाहिए, न कि हर क्षण स्वयं को बदलने की बेचैनी में जीना चाहिए।
चेतना की गुणवत्ता को समझना
इतिहास में कई संस्कृतियों ने “होने” की इस अवस्था को महत्व दिया है। भारत में ऋषि-मुनियों की परंपरा, जापान में ज़ेन बौद्ध साधना, और चीन में ताओ दर्शन – इन सबमें जीवन को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा गया है जिसमें संतुलन, सरलता और आंतरिक शांति का महत्व है। इन परंपराओं में व्यक्ति को यह सिखाया जाता है कि जीवन का उद्देश्य केवल उपलब्धियाँ जोड़ना नहीं, बल्कि चेतना की गुणवत्ता को समझना है।
आज की दुनिया में यह विचार और भी महत्वपूर्ण हो गया है। आधुनिक जीवन की गति इतनी तेज हो चुकी है कि हम अक्सर स्वयं को लगातार बेहतर बनाने की दौड़ में लगे रहते हैं: नई कौशल सीखना, बेहतर प्रदर्शन करना, अधिक सफल होना। यह प्रयास आवश्यक भी है, लेकिन जब यह जीवन का एकमात्र केंद्र बन जाता है, तब व्यक्ति धीरे-धीरे अपने भीतर की शांति खो देता है। इसी कारण आज ध्यान, योग और आत्म-चिंतन जैसे अभ्यास फिर से लोकप्रिय हो रहे हैं, क्योंकि वे व्यक्ति को यह अनुभव कराते हैं कि जीवन केवल भविष्य की उपलब्धियों का इंतजार नहीं है, बल्कि वर्तमान में भी एक गहराई और अर्थ मौजूद है।
कितनी सजगता से जी पा रहे हैं
बनना और होना विरोधी नहीं हैं, वे जीवन के दो आवश्यक आयाम हैं। मनुष्य स्वाभाविक रूप से विकसित होना चाहता है, नई क्षमताएँ सीखना चाहता है और अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहता है। परंतु यदि यह प्रक्रिया लगातार असंतोष और अधूरेपन की भावना से संचालित हो, तो वह थकान का कारण बन सकती है। इसके विपरीत यदि विकास के साथ-साथ व्यक्ति अपने अस्तित्व की वर्तमान अवस्था को भी स्वीकार कर सके, तो जीवन में संतुलन संभव हो जाता है। शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि हमें क्या बनना है, बल्कि यह है कि हम अभी जो हैं, उसे कितनी सजगता से जी पा रहे हैं। जब हम इस प्रश्न को समझने लगते हैं, तब जीवन केवल एक लक्ष्य तक पहुँचने की दौड़ नहीं रह जाता; वह एक ऐसी यात्रा बन जाता है जिसमें हर क्षण अपने-आप में पूर्ण हो सकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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