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India Time Zone: भारत में दो टाइम जोन क्यों है जरूरी, क्यों पूर्व में घड़ियों का सूरज से नहीं है तालमेल? समझें

हिमांशु राय, निदेशक, IIM इंदौर Published by: Jyoti Mehra Updated Fri, 13 Mar 2026 04:02 PM IST
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सार

India Time Zone: भारत लगभग 30 डिग्री देशांतर में फैला हुआ है। स्वाभाविक रूप से इतने बड़े क्षेत्र में सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग-अलग होता है। लेकिन प्रशासनिक रूप से पूरे देश में एक ही समय लागू किया गया है, जबकि अब इसे ठीक करने की जरूरत महसूस होने लगी है।

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क्या भारत को चाहिए दो टाइम जोन? - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

Why India Needs Two Time Zones: उज्जैन को प्राचीन काल में भारत में समय निर्धारण का केंद्र माना जाता था। उज्जैन के बेहद करीब, इंदौर में रहते हुए मुझे हर दिन यह एहसास होता है कि हमारी सभ्यता में समय केवल घड़ी की सुइयों से तय नहीं होता था। यह हमेशा प्रकृति से जुड़ा रहा है, सूरज और धरती के संबंध से, और इंसानी जीवन की गतिविधियों से। लेकिन जब मैं देश के अलग-अलग हिस्सों, खासकर पूर्वी भारत की यात्रा करता हूं, तो मुझे सूरज और घड़ी के बीच एक साफ अंतर दिखाई देता है। यह अंतर अब इतना सामान्य हो चुका है कि हम इसे नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि अब इसे ठीक करने की जरूरत महसूस होने लगी है।

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भारत लगभग 30 डिग्री देशांतर में फैला हुआ है। स्वाभाविक रूप से इतने बड़े क्षेत्र में सूर्योदय और सूर्यास्त का समय अलग-अलग होता है। पूर्वी हिस्सों में सूरज जल्दी निकलता है और पश्चिम में देर से ढलता है। लेकिन प्रशासनिक रूप से पूरे देश में एक ही समय लागू किया गया है, भारतीय मानक समय (IST), जो 82.5° पूर्व देशांतर पर आधारित है। कागज पर यह व्यवस्था सरल लगती है, लेकिन व्यवहार में यह कई परेशानियां पैदा करती है।
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इन क्षेत्रों पर पड़ता है बड़ा प्रभाव
यह समस्या सबसे ज्यादा पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में दिखाई देती है। असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में गर्मियों के दौरान सूरज सुबह चार बजे के आसपास ही निकल आता है। लेकिन स्कूल, दफ्तर और संस्थान सामान्य समय पर ही खुलते हैं, तब तक दिन की कई कीमती घंटे की रोशनी बेकार चली जाती है। वहीं शाम जल्दी हो जाती है, जिससे सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के लिए समय कम बचता है।

इस असंतुलन का असर सिर्फ दिनचर्या तक सीमित नहीं है। शाम जल्दी होने से बिजली की खपत बढ़ जाती है और बिजली व्यवस्था पर दबाव पड़ता है। वहीं प्राकृतिक रोशनी और अंधेरे के अनुसार बनने वाली हमारी जैविक घड़ी (सर्केडियन रिदम) भी प्रभावित होती है। इससे छात्रों की पढ़ाई, कामकाज की उत्पादकता और लोगों की नींद पर भी असर पड़ता है। जल्दी अंधेरा होने से सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं भी बढ़ती हैं, खासकर महिलाओं और बुजुर्गों के लिए।

टी गार्डन टाइम 
दिलचस्प बात यह है कि लोगों ने अपने स्तर पर इसका हल भी खोज लिया है। असम के चाय बागानों में कई दशकों से “टी गार्डन टाइम” का पालन किया जाता है, जो भारतीय मानक समय से लगभग एक घंटा आगे होता है। यह समाज का यह स्वीकार करना है कि घड़ियों को सूरज के अनुसार चलना चाहिए, न कि सूरज को घड़ी के अनुसार।

कई देशों में है एक से ज्यादा टाइम जोन
दुनिया के कई बड़े देशों में, जो पूर्व से पश्चिम तक ज्यादा फैले हुए हैं, वहां एक से ज्यादा टाइम जोन होते हैं। भारत उन गिने-चुने बड़े देशों में से है, जहां अभी भी सिर्फ एक ही समय प्रणाली लागू है। ऐसे में एक घंटे के अंतर वाले दो टाइम जोन लागू करना कोई बहुत बड़ा या जटिल बदलाव नहीं होगा, बल्कि यह भौगोलिक और वैज्ञानिक वास्तविकताओं के अनुसार एक व्यावहारिक कदम होगा।
 

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अनेकता में एकता है भारत की पहचान - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
इसके कई फायदे भी होंगे
अगर कामकाज और स्कूल का समय सूरज की रोशनी के अनुसार तय किया जाए तो बिजली की बचत होगी। लोगों को शाम के समय ज्यादा उपयोगी रोशनी मिलेगी, जिससे जीवन की गुणवत्ता बेहतर होगी। खेती-किसानी को भी फायदा होगा, क्योंकि वह काफी हद तक सूरज की रोशनी पर निर्भर करती है। सबसे अहम बात यह है कि इससे पूर्वी भारत को लंबे समय से झेलनी पड़ रही असुविधा भी कम होगी।

इस व्यवस्था को लागू करना भी बहुत मुश्किल नहीं है। एक टाइम जोन मौजूदा भारतीय मानक समय के अनुसार रह सकता है, जिसमें गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, दिल्ली और दक्षिण भारत के अधिकांश राज्य शामिल हों। दूसरा टाइम जोन इससे एक घंटा आगे रखा जा सकता है, जिसमें पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, झारखंड, असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्य शामिल हों। आधुनिक रेल, विमानन सेवाएं, डिजिटल प्लेटफॉर्म और वित्तीय सिस्टम पहले से ही अलग-अलग समय के साथ आसानी से काम कर सकते हैं, इसलिए प्रशासनिक जटिलता का डर काफी हद तक बेवजह है।

भारत में समय की अवधारणा
भारत में समय की अवधारणा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सभ्यतागत भी रही है। उज्जैन, जहां महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है, सदियों से समय की गणना से जुड़ा रहा है। महाकाल को समय का स्वामी माना जाता है। ग्रीनविच के वैश्विक मानक बनने से बहुत पहले, भारत में खगोलीय गणनाओं के लिए उज्जैन को प्रमुख देशांतर रेखा माना जाता था।

ऐसे में अगर एक टाइम जोन का आधार उज्जैन रहे और पूर्वी हिस्से के लिए दूसरा टाइम जोन बनाया जाए, तो यह भारतीय परंपरा के भी अनुरूप होगा। भारतीय दर्शन में “ऋत” यानी ब्रह्मांडीय व्यवस्था की बात की गई है, जिसमें प्रकृति और मानव व्यवस्था के बीच संतुलन जरूरी माना जाता है। जब हम इतने बड़े भूभाग पर एक ही समय थोपते हैं, तो यह संतुलन बिगड़ता है, जबकि दो टाइम जोन इस संतुलन को फिर से स्थापित कर सकते हैं।

अनेकता में एकता है भारत की पहचान
कुछ लोगों को लगता है कि अलग-अलग टाइम जोन से राष्ट्रीय एकता प्रभावित हो सकती है, लेकिन भारत की एकता कभी भी समानता पर आधारित नहीं रही है। यहां अलग-अलग भाषाएं, संस्कृतियां और परंपराएं होते हुए भी देश एकजुट रहा है। भौगोलिक वास्तविकता को स्वीकार करना दरअसल नागरिकों और व्यवस्था के बीच विश्वास को मजबूत ही करेगा।

भारत को दिन में ज्यादा घंटों की जरूरत नहीं है। उसे सिर्फ इतनी समझ की जरूरत है कि वह अपनी दिनचर्या को सूरज की लय के साथ जोड़ सके। कई बार देश के बड़े बदलाव छोटी-छोटी व्यावहारिक समस्याओं को सुधारने से ही शुरू होते हैं, ऐसी समस्याएं, जो चुपचाप करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं।

हिमांशु राय, निदेशक, IIM इंदौर
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 




 
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