चुनावी माहौल: क्या असम में जीत की हैट्रिक लगा पाएगी भाजपा?
भाजपा के सामने सवाल है कि क्या वह पूर्वोत्तर के प्रवेशद्वार कहे जाने वाले इस राज्य में जीत की हैट्रिक लगा पाएगी और क्या हिमंता बिस्वा सरमा लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने वाले भाजपा के पहले नेता होंगे?
विस्तार
अगले महीने देश के जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा और एकमात्र राज्य असम भी शामिल है। राज्य में विधानसभा की 126 सीटें हैं। बीते दो विधानसभा चुनावों में भाजपा यहां लगातार जीतती रही है। यह बात दीगर है कि पिछली बार दोनों कार्यकाल में मुख्यमंत्री की कुर्सी अलग-अलग नेताओं के पास रही है।
वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन को 75 और कांग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थी। तब बदरुद्दीन अजमल की पार्टी आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट भी कांग्रेस गठबंधन में शामिल थी। लेकिन इस बार वह अलग चुनाव लड़ रही है।
126 सदस्यीय विधानसभा में फिलहाल भाजपा के 64 और उसके सहयोगी दलों-असम गण परिषद के नौ, यूपीपीएल के सात और बोड़ो पीपुल्स फ्रंट के तीन विधायक हैं। दूसरी ओर, विपक्षी कांग्रेस के 26 विधायक हैं। उसके अलावा एआईयूडीएफ के 16 और सीपीएम के एक के अलावा एक निर्दलीय विधायक है।
अब चुनाव का सामना कर रही भाजपा के सामने सवाल है कि क्या वह पूर्वोत्तर के प्रवेशद्वार कहे जाने वाले इस राज्य में जीत की हैट्रिक लगा पाएगी और क्या हिमंता बिस्वा सरमा लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने वाले भाजपा के पहले नेता होंगे?
हिमंता ने अपने पहले कार्यकाल में बांग्लाभाषी मियां मुसलमानों के खिलाफ जिस बड़े पैमाने पर अभियान चलाया है उससे राज्य में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया काफी तेज हुई है। मुख्यमंत्री पिछले चुनाव के बाद लगातार कहते रहे हैं कि उनको इन मिया मुसलमांनो के समर्थन की जरूरत नहीं है। उनके नेतृत्व में सरकार ने कई ऐसे नए कानून बनाए हैं जिनके निशाने पर अल्पसंख्यक ही रहे हैं।
ममता बनर्जी और हिमंता सरमा
राजनीतिक विश्लषकों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की जो स्थिति है वहीं असम में हिमंता सरमा की है। यानी दोनों की स्थिति मजबूत नजर आती है। इसकी एक बड़ी वजह विपक्षी दलों का बिखराव और उनके पास इन दोनों को टक्कर देने वाले किसी चेहरे की कमी है।
असम में हिमंता को पार्टी के भीतर या बाहर से किसी मजबूत चुनौती का सामना नहीं करना पड़ रहा है। कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के पुत्र गौरव गोगोई ही फिलहाल विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा है। लेकिन हिमंता सरकार उन पर पाकिस्तान से संबंध होने के आरोप लगाते हुए कटघरे में खड़ा करती रही है।
कांग्रेस ने हालांकि अपनी दो सूचियां पहले ही जारी कर दी हैं। लेकिन पार्टी फिलहाल आंतरिक गुटबाजी की शिकार है। पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा बीते महीने ही भाजपा का दामन थाम चुके हैं। हिमंता ने दावा किया है कि गौरव गोगोई को छोड़ कर पूरी कांग्रेस खाली हो जाएगी।
असम में तीसरी बार भाजपा सरकार
उधर, भाजपा ने राज्य में लगातार तीसरी बार जीत का भरोसा जताया है। पार्टी के विधायक दिगंत कलिता ने पत्रकारों से बातचीत में दावा किया कि पार्टी के कार्यकर्ता चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार हैं। हम असम के विकास के लिए कृतसंकल्प हैं। इस बार एनडीए को पिछली बार के मुकाबले ज्यादा सीटें मिलेंगी।
इस बार चुनाव में घुसपैठ के पारंपरिक मुद्दे के अलावा कई नए मुद्दों के छाए रहने की संभावना है। घुसपैठ का मुद्दा असम में दशकों पुराना है और असम आंदोलन के बाद लगभग हर चुनाव में यह प्रमुख मुद्दा रहा है।
इस बार विपक्षी दल भाजपा के खिलाफ भारतीय नागरिकों को विदेशी करार देकर जबरन सीमा पार धकेलने का मुद्दा उठा सकते हैं। इसके अलावा सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हटाने के लिए बड़े पैमाने पर चला अभियान भी अहम मुद्दे के तौर पर उभर सकता है। इस अभियान की चपेट में आने वाले ज्यादातर अल्पसंख्यक ही हैं।
हिमंता सरमा सरकार ने बीते कुछ साल के दौरान राज्य में बाल विवाह के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चलाया है। इस आरोप में हजारो लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी। भाजपा का दावा है कि सरकार ने इस सामाजिक बुराई को जड़ से खत्म करने के लिए ही यह अभियान चलाया है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि सरकार का यह अभियान अल्पसंख्यकों के खिलाफ है।
आधारभूत ढांचे के विकास का दावा
भाजपा अपनी सरकार की उपलब्धियों का भी प्रचार कर रही है। उसका दावा है कि बीते पांच साल में असम में शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य के साथ ही आधारभूत ढांचे के विकास की दिशा में दिशा में जितने काम हुए हैं उतने पहले कभी नहीं हुए थे।
महिलाओं के लिए शुरू की गई कल्याण योजनाओं के तहत राज्य की लाखों महिलाओं के खाते में हर महीने पैसे जमा किए जाते हैं और कम से कम सवा लाख युवाओं को रोजगार मिला है। कभी कांग्रेस के मजबूत वोट बैंक रहे चाय बागान मजदूरों को अपने पाले में खींचने के लिए भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने कई कल्याण योजनाएं शुरू की हैं। उसे चुनाव में इसका फायदा मिलने की उम्मीद है।
बीते साल सिंगापुर में राज्य के मशहूर गायक जुबीन गर्ग की रहस्यमय हालात में मौत भी इस बार विपक्ष का प्रमुख मुद्दा होगी। उसका आरोप है कि सरकार इस मामले में न्याय दिलाने की इच्छुक नहीं है। लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी का दावा है कि उसने इस मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन कर अभियुक्तों की गिरफ्तारी की है और यह मामला अब अदालत में है।
इस चुनाव में बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ भी अहम भूमिका निभा सकती है। इस बार वो कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ेगी। राज्य की आबादी में 35 फीसदी मुसलमान हैं और कई सीटों पर वो निर्णायक स्थिति में हैं।
एआईयूडीएफ ने राज्य की 30-32 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई है। पार्टी के विधायक रफीकुल इस्लाम का कहना है कि उनकी लड़ाई भाजपा से है। उनका कहना है कि पार्टी सभी 126 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। लेकिन इससे भाजपा को फायदा होगा। गठजोड़ के सवाल पर उनका कहना था कि एआईयूडीएफ भाजपा-विरोधी ताकतों का समर्थन करेगी और गैर-भाजपा सरकार बनने की स्थिति में उसे बिना शर्त समर्थन देगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि असम में इस बार मुकाबला दिलचस्प जरूर है। लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी बाकियों से आगे नजर आ रही है। चुनाव के एलान से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने लगातार दो दिन राज्य का दौरा कर हजारो करोड़ की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया है। भाजपा को इनका फायदा मिलने की उम्मीद है। चुनाव प्रचार के लिए समय कम होने के कारण तमाम पार्टियों ने अपना चुनाव अभियान शुरू कर दिया है। उम्मीदवारों की सूची जारी करने का सिलसिला भी अब तेज होने लगा है।
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