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पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: न्यायपालिका से टकराव और ममता बनर्जी के तेवर, आखिर सियासत में क्या परिणाम होंगे?
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सार
पिछले विधानसभा चुनाव 2021 के बाद हुई हिंसा से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट और कलकत्ता हाई कोर्ट के कई न्यायाधीशों ने खुद को अलग कर लिया।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी
- फोटो : ANI
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विस्तार
आंदोलन के जरिये राजनीति में मुकाम हासिल की ममता बनर्जी, अपने पंद्रह साल के शासनकाल में न्यायपालिका से भी उसी तरह टकराईं जिस तरह विपक्ष के साथ साथ सरकारी व स्वतंत्र संस्थाओं से। या यूं कहें कि ममता बनर्जी ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच के रिश्ते को राजनीतिक टकराव के जरिये, कानून के राज पर एक सिस्टमैटिक हमले में बदल दिया।
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दरअसल, ममता बनर्जी द्वारा ज्यूडिशियल इंडिपेंडेंस को खत्म करके तानाशाही नियंत्रण बनाने की यह एक बेहद सोची-समझी मल्टी-डाइमेंशनल स्ट्रैटेजी कही जा सकती है।
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मीडिया कवरेज के अनुसार यदि हम सिर्फ आंकड़ों पर गौर करें तो ममता बनर्जी सरकार से जुड़े मामलों में सिर्फ कलकत्ता हाई कोर्ट में 13 ज्यूडिशियल रिक्यूसल (स्वयं हटना) हुए हैं, जो देश के किसी भी हाई कोर्ट के मुकाबले बहुत ज्यादा है। सुप्रीम कोर्ट में भी ऐसे 7 रिक्यूसल हुए हैं।
दो मामलों में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने ममता सरकार से जुड़े मामलों से खुद को अलग कर लिया। न्यायाधीश, पश्चिम बंगाल से जुड़े मामलों की सुनवाई करने से मना कर रहे हैं क्योंकि राजनीतिक माहौल इतना ज़हरीला हो गया है कि निष्पक्षता दिखना व दिखाना अब सम्भव नहीं रह गया है।
पिछले विधानसभा चुनाव 2021 के बाद हुई हिंसा से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट और कलकत्ता हाई कोर्ट के कई न्यायाधीशों ने खुद को अलग कर लिया। सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी जो कि बंगाल की रहने वाली हैं, ने निजी मजबूरियों का हवाला दिया और भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या की सीबीआई जांच की मांग वाले केस से खुद को अलग कर लिया।
न्यायाधीश कौशिक चंदा को ममता बनर्जी पर न्यायपालिका को गलत तरीके से दिखाने के लिए ₹5 लाख का जुर्माना लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा, इससे पहले कि वह चुनाव याचिका के केस से अलग हो जाएं।
एक न्यायाधीश को मुख्यमंत्री को यह मंजूरी देनी पड़ी, जबकि वह पीछे हट गए थे। यह एक तस्वीर पूरे संकट को दिखाती है। राज्य सरकार के मुखिया पर न्यायपालिका को बदनाम करने का आरोप है जबकि न्यायाधीश को लड़ाई के मैदान से हटने से पहले उन्हें सज़ा देनी चाहिए था।
न्यायाधीश शुभ्रा घोष ने टीएमसी के लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी के साथ तीखी बहस के बाद चुनाव के बाद हुई हिंसा में हत्याओं के आरोपी कोलकाता पुलिस अधिकारियों की ज़मानत याचिकाओं से खुद को अलग कर लिया।
पैटर्न से इनकार नहीं किया जा सकता, जब टीएमसी के वकील और नेता दलीलों से किसी केस को कंट्रोल नहीं कर पाते, तो वे इतना खराब माहौल बना देते हैं कि न्यायाधीश लगातार टकराव का सामना करने के बजाय हट जाना पसंद करते हैं।
टीएमसी ने उन के खिलाफ सीधे फिजिकल धमकाने का कैंपेन चलाया है जो सीबीआई जांच का आदेश देने या सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ फैसला देने की हिम्मत करते हैं। न्यायाधीश राजशेखर मंथा को उनके घर के पास बदनाम करने वाले पोस्टरों का सामना करना पड़ा, जिनमें उन्हें "ज्यूडिशियरी के लिए शर्म की बात" कहा गया था।
टीएमसी के समर्थक वकीलों ने उनके कोर्ट का बॉयकॉट किया और उनके कोर्टरूम में एंट्री को फिजिकली ब्लॉक कर दिया, क्योंकि उन्होंने एक भाजपा नेता को कई बार गलत एफआईआर से बचाया था।
न्यायाधीश अभिजीत गंगोपाध्याय (लोकसभा सांसद), जिन्होंने स्कूल रिक्रूटमेंट स्कैम में सीबीआई जांच का आदेश दिया था, उन पर टीएमसी नेताओं ने पर्सनल अटैक किए। उन्हें ज्यूडिशियरी पर धब्बा कहा गया और टीएमसी नेताओं ने उनसे कुर्सी छोड़कर पॉलिटिक्स में आने की अपील की।
टीएमसी में नम्बर दो की हैसियत रखने वाले अभिषेक बनर्जी के "1%" कमेंट ने इन हमलों को आइडियोलॉजिकल कवर दिया।
जब टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव ने आरोप लगाया कि ज्यूडिशियरी का एक छोटा सा हिस्सा केंद्र सरकार के निर्देशों के तहत काम करता है, तो उन्होंने ज्यूडिशियल क्रेडिबिलिटी पर इसके बाद के हमले के लिए जमीन तैयार कर दिया।
न्यायाधीश अमृता सिन्हा के पति की फाइल की गई कंप्लेंट ने हर सोची जा सकने वाली रेड लाइन पार कर दी। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य का क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (सीआईडी) उन्हें उनकी न्यायाधीश पत्नी के खिलाफ झूठे बयान निकलवाने के लिए धमका रहा था।
तृणमूल कांग्रेस सरकार सिर्फ न्यायाधीशों पर बोलकर हमला नहीं करती, बल्कि कोर्ट से मंज़ूर जांच को फिजिकली रोकती है। जब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने चुनावी संस्था आइपैक ऑफिस पर रेड मारी, तो ममता बनर्जी ने खुद कथित तौर पर दखल दिया और जांच से डॉक्यूमेंट्स और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस जबरन लेकर गईं। सुप्रीम कोर्ट को उन्हें याद दिलाना पड़ा कि कोर्ट कोई जंतर-मंतर नहीं है।
संदेशखाली में, राज्य सीआईडी ने टीएमसी लीडर शाहजहां शेख को सीबीआई को सौंपने से मना कर दिया, जबकि हाई कोर्ट ने सीधे शाम साढ़े चार बजे की डेडलाइन दी थी। हाई कोर्ट ने राज्य पुलिस को पूरी तरह से पक्षपाती बताते हुए उसकी आलोचना की, जो बहुत ज्यादा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति को बचाने के लिए लुका-छिपी खेल रही थी।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सीबीआई को उस समय के कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ करने से रोकने के लिए धरना दिया था। मुख्यमंत्री खुद कोर्ट से मंज़ूर जांच में रुकावट डाल रही थीं। राजीव कुमार अब राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के सांसद होंगे।
दारवित स्कूल मामले ने सबसे ऊंचे लेवल पर इंस्टीट्यूशनल अवज्ञा को उजागर किया। मई 2023 में जांच एनआईए को सौंपने के कोर्ट के आदेश के बावजूद, राज्य ने लगभग एक साल तक केस फाइलें ट्रांसफर नहीं की। नतीजा? चीफ सेक्रेटरी, होम सेक्रेटरी और एडीजी सीआईडी के खिलाफ कंटेम्प्ट की कार्रवाई।
बंगाल के टॉप ब्यूरोक्रेट्स को न्यायिक आदेशों के बजाय मुख्यमंत्री के राजनीतिक आदेशों का पालन करने के लिए कोर्ट की कार्रवाई का सामना करना पड़ा।
दरअसल, इस परिस्थिति की जड़ें 2012 में ही पनपने लगी थी जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य विधानसभा में आरोप लगाया था कि फैसले खरीदे जा सकते हैं और ज्यूडिशियरी का एक हिस्सा करप्ट है, ने इस टेम्पलेट को शुरू किया।
मौजूदा परिदृश्य देखें तो सुप्रीम कोर्ट को बंगाल में वोटर लिस्ट रिवीजन की देखरेख के लिए दूसरे राज्यों से ज्यूडिशियल ऑफिसर तैनात करने के लिए आर्टिकल 142 के तहत अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होना पड़ा। क्यों? क्योंकि कोर्ट ने औपचारिक तौर पर ममता सरकार और संवैधानिक अधिकारियों के बीच "भरोसे की कमी" पाई।
अभी भी यह काम पूरा नहीं हो पाया है और कब तक पूरा होगा? चुनाव आयोग तय तिथि बताने की स्थिति में असमर्थ है।
दरअसल, यह संकट इसलिये है, क्योंकि टीएमसी सरकार यह मानने से इनकार करती है कि कोर्ट डेमोक्रेसी में बराबर का पार्टनर है। कंटेम्प्ट की कार्रवाई जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने जिस भरोसे की कमी की पहचान की थी, उस पर अभी तक ध्यान नहीं दिया गया है।
हर गुजरते दिन के साथ, नबान्ना का मैसेज एक ही है, ममता बनर्जी के बंगाल में कानून सभी पर लागू होता है, सिवाय उन लोगों के जो तृणमूल कांग्रेस की सेवा करते हैं।
बहरहाल, जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें यह दर्ज होगा कि बंगाल के इंस्टीट्यूशन्स को सबसे बड़ा नुकसान किसी बाहरी ताकत से नहीं, बल्कि एक ऐसी सरकार से हुआ, जिसने अपनी पावर पर हर कॉन्स्टिट्यूशनल रोक को एक दुश्मन के तौर पर देखा जिसे हराना है।
फिलहाल न्यायपालिका जिस घेरे में है, बंगाल भी उसी घेरे में है और जब तक इस सरकार को जवाबदेह नहीं ठहराया जाता, किसी भी नागरिक के अधिकार सुरक्षित नहीं हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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