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दूसरा पहलू: सोशल मीडिया से बच्चों को दूर रखना क्यों जरूरी है?

Subhash Chandra Kushwaha सुभाष चंद्र कुशवाहा
Updated Wed, 18 Mar 2026 06:36 AM IST
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सार

विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2022-23 की रिपोर्ट के अनुसार, 11 से 15 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 10 से 13 प्रतिशत किशोरों में समस्या-जनक सोशल मीडिया उपयोग के लक्षण पाए गए, जो अवसाद, चिंता और नींद की कमी से जुड़े हैं। पिउ रिसर्च सेंटर के 2022 के सर्वेक्षण में 59 प्रतिशत अमेरिकी किशोरों ने स्वीकार किया कि सोशल मीडिया उनके आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

flip side Why it is important to keep children off social media in India laws
सोशल मीडिया का बच्चों पर प्रभाव - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार

हाल ही में, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भारत सहित अन्य देशों से अपील की कि वे बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर आयु-आधारित प्रतिबंध लागू करने पर गंभीरता से विचार करें। ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया की न्यूनतम आयु-सीमा तय करने की दिशा में ठोस पहल की है, जबकि फ्रांस में भी 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों को इन मंचों से दूर रखने के उपायों पर चर्चा चल रही है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2022-23 की रिपोर्ट के अनुसार, 11 से 15 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 10 से 13 प्रतिशत किशोरों में समस्या-जनक सोशल मीडिया उपयोग के लक्षण पाए गए, जो अवसाद, चिंता और नींद की कमी से जुड़े हैं। पिउ रिसर्च सेंटर के 2022 के सर्वेक्षण में 59 प्रतिशत अमेरिकी किशोरों ने स्वीकार किया कि सोशल मीडिया उनके आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। जर्नल ऑफ अडोलेसेंट हेल्थ में 2019 से 2023 के बीच प्रकाशित अध्ययनों में यह निष्कर्ष सामने आया कि प्रतिदिन तीन घंटे से अधिक सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले किशोरों में अवसाद के लक्षणों की संभावना लगभग 60 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम इस तरह बनाए जाते हैं कि वे ‘डोपामिन चक्र’ उत्पन्न करते हैं। लाइक, टिप्पणी और सूचनाएं बच्चों को बार-बार स्क्रीन की ओर आकर्षित करती हैं। यह निरंतर उत्तेजना मस्तिष्क के विकासशील भागों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है और किशोरों को वास्तविक जीवन से दूर कर सकती है।
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यूनिसेफ के अनुसार, विश्व स्तर पर प्रत्येक तीन में से एक बच्चा साइबर उत्पीड़न का अनुभव कर चुका है। भारत में चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) तथा अन्य संगठनों की रिपोर्टें बताती हैं कि फर्जी प्रोफाइल, ऑनलाइन धमकी और यौन शोषण की घटनाओं में वृद्धि हुई है। भारत के संदर्भ में यह बहस और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में किशोर तेजी से डिजिटल जगत से जुड़ रहे हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्मार्टफोन की उपलब्धता बढ़ी है, परंतु डिजिटल साक्षरता का स्तर समान रूप से विकसित नहीं हुआ। ऐसे में, नीति-निर्माताओं को स्पष्ट दिशा-निर्देश, आयु सत्यापन की प्रभावी व्यवस्था और बच्चों के लिए सुरक्षित तथा शैक्षणिक मंचों को प्रोत्साहन देना होगा। प्रतिबंध का उद्देश्य बच्चों को तकनीक से दूर करना नहीं, बल्कि उनके परिपक्व आयु तक पहुंचने से पूर्व अनियंत्रित और संभावित रूप से हानिकारक माहौल में पड़ने से बचाना होना चाहिए। बच्चों की सुरक्षा केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राज्य और समाज का भी सामूहिक उत्तरदायित्व है।
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