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दूसरा पहलू: जहां बिना पानी के होता है प्रकाश संश्लेषण; यहां पौधे, शैवाल तोड़ देते हैं दम; लेकिन जीवन थमता नहीं

रे हॉलैंड Published by: Pavan Updated Thu, 19 Mar 2026 07:54 AM IST
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सार

अंटार्कटिका के सूक्ष्म जीव (माइक्रोब्स) माइनस 20 डिग्री सेल्सियस की ठंड में भी हवा से ऊर्जा बना सकते हैं। ये सूक्ष्मजीव खास एंजाइमों के जरिये हवा में मौजूद हाइड्रोजन व कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसों को बेहद कम मात्रा में भी पहचान लेते हैं। अंटार्कटिका में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में एरोट्रॉफी ही प्राथमिक उत्पादक की भूमिका निभाती है। इसमें तरल पानी की जरूरत नहीं पड़ती, जबकि प्रकाश संश्लेषण के लिए यह जरूरी है।

Where photosynthesis occurs without water; plants and algae die here; but life does not stop
अंटार्कटिका - फोटो : ANI
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विस्तार

अंटार्कटिका का तापमान हमेशा शून्य से काफी नीचे बना रहता है। अधिकतर इलाकों में कई महीनों तक सूर्य दिखाई ही नहीं देता। बिना धूप के, प्रकाश संश्लेषण करने वाले पौधे, काई व शैवाल दम तोड़ देते हैं। पर इसका अर्थ यह नहीं है कि यहां जीवन पूरी तरह थम जाता है।
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द आईएसएमई जर्नल के एक शोध के अनुसार, अंटार्कटिका के सूक्ष्मजीव (माइक्रोब्स)  माइनस 20 डिग्री सेल्सियस की ठंड में भी हवा से ऊर्जा बना सकते हैं। यह खोज बताती है कि इतनी चरम ठंड में भी जीवन कैसे संभव है और जलवायु परिवर्तन इस प्रक्रिया को कैसे प्रभावित कर सकता है। 2017 में वैज्ञानिकों ने पहली बार दिखाया था कि अंटार्कटिक सूक्ष्मजीव वायुमंडल में मौजूद गैसों की बेहद मामूली मात्रा से भी ऊर्जा खींच सकते हैं। इस प्रक्रिया को एयरोट्रॉफी कहा जाता है। ये सूक्ष्मजीव अपने खास एंजाइमों के जरिये हवा में मौजूद हाइड्रोजन व कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसों को बेहद कम मात्रा में भी पहचान लेते हैं। पर बड़ा सवाल यह था कि क्या यह प्रक्रिया कड़कड़ाती ठंड में भी काम करती है?
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पूर्वी अंटार्कटिका के विभिन्न हिस्सों के मिट्टी के नमूनों के डीएनए की जांच की गई, ताकि पता चल सके कि वहां कौन-कौन से सूक्ष्म जीव मौजूद हैं, उनके पास कौन से जीन हैं और वे ऊर्जा पाने के लिए किन स्रोतों का उपयोग कर सकते हैं। नतीजे चौंकाने वाले थे। ये सूक्ष्मजीव साल भर हाइड्रोजन व कार्बन मोनोऑक्साइड को भोजन के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे। इनमें से कई बैक्टीरिया सीधे वायुमंडल से कार्बन सोखने की क्षमता भी रखते हैं। वास्तव में, ये ‘एयरोट्रोफ्स’ अंटार्कटिका के प्राथमिक उत्पादक हैं, जो किसी पौधे की तरह मिट्टी से नहीं, बल्कि हवा से नया बायोमास तैयार कर रहे हैं। अंटार्कटिका में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बेहद दुर्लभ है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यहां एरोट्रॉफी ही प्राथमिक उत्पादक की भूमिका निभाती है। इसका एक और बड़ा फायदा यह है कि इसमें तरल पानी की जरूरत नहीं पड़ती, जबकि प्रकाश संश्लेषण के लिए यह जरूरी है।

एक सवाल यह भी था कि ग्लोबल वार्मिंग इस प्रक्रिया को कैसे प्रभावित करेगी? अनुमान बताते हैं कि यदि उत्सर्जन कम रहा, तो इन सूक्ष्मजीवों द्वारा हाइड्रोजन उपयोग करने की गति में चार फीसदी की वृद्धि होगी, जो उत्सर्जन अधिक रहने पर 35 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। कार्बन मोनोऑक्साइड के मामले में भी लगभग ऐसा ही है। हाइड्रोजन खुद एक ग्रीनहाउस गैस नहीं है, लेकिन यह वातावरण में मीथेन जैसी खतरनाक गैसों के टिके रहने की अवधि को जरूर प्रभावित करती है। यह अध्ययन अंटार्कटिका के अनोखे सूक्ष्मजीवी तंत्रों की सहनशक्ति को समझने में विज्ञान के लिए मील का पत्थर साबित होगा। -द कन्वर्सेशन से
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