सब्सक्राइब करें

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   bear jenny emotional story blog

मासूम जेनी की शरारतों में छिपी है दर्द की दास्तां

भूपेंद्र कुमार, अमर उजाला Published by: Nitin Gautam Updated Tue, 10 Mar 2026 07:39 AM IST
विज्ञापन
सार

एक साल की मादा भालू जेनी की प्यारी शरारतें देखकर आपको खुशनुमा-सा एहसास जरूर होगा। पर इसके पीछे दर्दनाक कहानी भी है।

bear jenny emotional story blog
जेनी की दर्द भरी दास्तां - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार

उसकी मासूम शरारतों को देखकर आप कभी नहीं जान पाएंगे कि उसने क्या खोया है। जिंदगी हर किसी पर मेहरबान नहीं होती। जेनी की कहानी भी ऐसी ही है। अपनी मां के साथ-साथ उसने वह सब खो दिया, जिसे बचपन कहते हैं। ...और वह बसेरा भी, जहां उसने जन्म लिया। आगरा के भालू संरक्षण केंद्र में एक साल की मादा स्लाॅथ भालू जेनी की प्यारी शरारतें देखकर आपको खुशनुमा-सा एहसास होगा। पर इस खुशी के पीछे के दर्द की कहानी से आपका दिल टूट जाएगा।
Trending Videos


मध्य प्रदेश के शहडोल के जंगलों में बड़ी तादाद में भालू रहते हैं। इन्हीं में से थी जेनी और उसकी मां। जेनी महज पांच माह की थी, जब उसकी मां उसे लेकर पास के गांव में खाने की तलाश में गई थी। पर, जेनी की मां पर गांववालों ने पत्थरों की बरसात कर दी। हमले में उसे  गंभीर चोटें लगीं। जब जंगल से किसी भालू के रोने की आवाज आई, तो कुछ ग्रामीणों ने वन विभाग को घटना से अवगत कराया। काफी प्रयासों के बाद भी जेनी की मां को बचाया नहीं जा सका। इस घटना को भुला दिया जाता, अगर नन्ही जेनी को बचाने के लिए वन विभाग ने स्वयंसेवी संगठन वाइल्डलाइफ एसओएस से संपर्क नहीं किया होता। जेनी की हालत खराब थी।
विज्ञापन
विज्ञापन


वन विभाग के अधिकारियों को एहसास था कि जेनी जंगल में नहीं बच सकेगी। सो, जेनी को वाइल्डलाइफ एसओएस द्वारा संचालित आगरा के कीठम स्थित भालू संरक्षण केंद्र भेजा गया। यहां धीरे-धीरे वह बेहतर होने लगी। इस भालू शावक का नाम प्रसिद्ध अभिनेत्री जेनिफर विंगेट के नाम पर रखा गया है, जो वन्य जीव संरक्षण से जुड़ी हैं। संस्था के सह-संस्थापक और सीईओ कार्तिक सत्यनारायण कहते हैं कि यह जेनी का दूसरा जीवन है। सह-संस्थापक व सचिव गीता शेषमणि कहती हैं कि हमारा प्रयास उसे वह सब कुछ देने का है, जो उसने खोया है।

जेनी को जून, 2025 में यहां लाया गया था। जंगल घटे, तो भालू खाने की तलाश में मानव बस्तियों की ओर रुख करने लगे। यहीं से मानव और वन्य जीवों का संघर्ष शुरू हुआ। आंकड़ों के अनुसार, देश भर में भालुओं की संख्या 15 से 20 हजार के आसपास है, जो कभी लाखों में थी। शिकार व तमाशे के लिए पकड़े जाने की वजह से इनकी संख्या में गिरावट आई। भालू की औसत उम्र 20 से 30 वर्ष होती है, पर कलंदरों या मदारियों के पास ये मुश्किल से 8-10 साल ही जी पाते हैं। ऐसे भालुओं के संरक्षण में वाइल्डलाइफ एसओएस ने बेहतरीन काम किया है। आखिर यहीं पर तो नन्ही जेनी का दूसरा जन्म भी हुआ है। 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed