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द्वारकाधीश मंदिर: भगवान और भक्त के बीच खड़ी अव्यवस्था की दीवारें!
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सार
द्वारिकाधीश मंदिर का इतिहास केवल एक धार्मिक स्थल का इतिहास नहीं है। यह संघर्ष, आस्था और पुनरुत्थान की कहानी भी है। एक प्रश्न आज भी मन में उठता है, जिस मंदिर ने विदेशी आक्रांताओं के सामने हार नहीं मानी, क्या वह आज अपनी ही व्यवस्था के सामने असहाय हो गया है?
द्वारिकाधीश मंदिर
- फोटो : Vinod Pathak
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विस्तार
भारत के पश्चिमी तट पर, अरब सागर की लहरों से टकराता द्वारिकाधीश मंदिर केवल पत्थरों और नक्काशी की भव्यता का प्रतीक नहीं है। यह उस सनातन चेतना का केंद्र है, जिसने हजारों वर्षों से भारतीय आस्था को दिशा दी है।
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आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार धामों में से एक, द्वारका को मोक्ष का द्वार कहा जाता है। लेकिन, जब कोई श्रद्धालु आज इस मंदिर की दहलीज पर खड़ा होता है तो उसके मन में एक असहज प्रश्न जन्म लेता है, क्या यह वही द्वारका है, जहां धर्म और न्याय के प्रतीक भगवान श्रीकृष्ण की लीला भूमि है?
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एक ओर भगवान श्रीकृष्ण का वह विराट स्वरूप है, जिसने महाभारत के रण में धर्म की स्थापना का संदेश दिया। दूसरी ओर, मंदिर की चारदीवारी के भीतर फैली प्रशासनिक शिथिलता, पुजारियों का कथित एकाधिकार और आम श्रद्धालुओं की उपेक्षा दिखाई देती है।
भगवान तक पहुंचने के 'मार्ग में कठिनाई'
हाल में होली के अवसर पर द्वारिकाधीश मंदिर में दर्शन करने का अवसर मिला। भगवान के दर्शन की उत्कंठा के साथ वहां पहुंचा हर भक्त यही सोचता है कि वह उस भूमि पर खड़ा है, जहां कभी भगवान श्रीकृष्ण ने राज्य किया था, लेकिन भगवान और भक्त के बीच खड़ी अव्यवस्था की दीवारें देखकर मन भारी हो जाता है। क्या सचमुच भगवान तक पहुंचने का मार्ग इतना कठिन होना चाहिए?
द्वारिकाधीश मंदिर का इतिहास केवल एक धार्मिक स्थल का इतिहास नहीं है। यह संघर्ष, आस्था और पुनरुत्थान की कहानी भी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने हरि गृह यानी भगवान के निजी निवास के ऊपर पहला मंदिर बनवाया था।
पुरातात्विक दृष्टि से भी यह भूमि अत्यंत प्राचीन है। यहां ईसा पूर्व के अवशेष मिलते हैं, जो यह प्रमाणित करते हैं कि यह स्थान सदियों से श्रद्धा का केंद्र रहा है। मध्यकाल में महमूद बेगड़ा जैसे आक्रांताओं ने मंदिर के भौतिक स्वरूप को नष्ट करने की कोशिश की, लेकिन वे यहां की जन-आस्था को नहीं डिगा सके।
आज जो भव्य मंदिर दिखाई देता है, वह 15वीं और 16वीं शताब्दी में चालुक्य शैली में निर्मित हुआ। पांच मंजिला संरचना और 72 स्तंभों पर खड़ा यह मंदिर भारत की स्थापत्य परंपरा और आस्था की दृढ़ता का प्रतीक है।
लेकिन, एक प्रश्न आज भी मन में उठता है, जिस मंदिर ने विदेशी आक्रांताओं के सामने हार नहीं मानी, क्या वह आज अपनी ही व्यवस्था के सामने असहाय हो गया है? मंदिर का प्रबंधन द्वारिकाधीश देवस्थान समिति के हाथों में है, जिसके पदेन अध्यक्ष देवभूमि द्वारका के जिला कलेक्टर होते हैं।
कागजों पर यह व्यवस्था आदर्श दिखाई देती है, जहां प्रशासन और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन होना चाहिए, लेकिन व्यवहार में तस्वीर कुछ और ही है। प्रशासन और मंदिर के सेवादारों यानी पंडा-पुजारियों के बीच एक प्रकार का अदृश्य सत्ता संघर्ष दिखाई देता है।
सरकारी निर्देशों का सही से पालन नहीं
सरकारी निर्देश अक्सर मंदिर के मुख्य द्वार पर आकर दम तोड़ देते हैं। जिला प्रशासन समय-समय पर स्वच्छता, सुरक्षा और समान दर्शन के निर्देश जारी करता है, लेकिन इन निर्देशों का पालन कराना आसान नहीं होता। जब प्रशासन व्यवस्था सुधारने की कोशिश करता है तो इसे धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप बताकर विरोध खड़ा कर दिया जाता है।
इस टकराव का सबसे बड़ा शिकार कौन बनता है? आम श्रद्धालु। वह श्रद्धालु, जो घंटों लाइन में खड़ा रहता है। वह श्रद्धालु, जो केवल अपने भगवान की एक झलक पाने के लिए हजारों किलोमीटर का सफर तय करता है।
दरअसल, द्वारका में गुग्गुली ब्राह्मणों और पुजारियों की एक लंबी परंपरा रही है। सदियों तक उन्होंने मंदिर की सेवा की है और आस्था की लौ को जीवित रखा है, लेकिन क्या आज वही परंपरा सवालों के घेरे में नहीं आ गई है?
मंदिर परिसर में कई ऐसे गुप्त मार्ग या गैलरियां हैं, जिनके जरिए प्रभावशाली लोगों को भीड़ से बचाकर सीधे गर्भगृह तक ले जाया जाता है, जबकि आम भक्त धूप में तपते हुए घंटों कतार में खड़े रहते हैं। क्या भगवान के सामने भी वीआईपी और सामान्य भक्त का अंतर होना चाहिए?
भगवान के पट खुलने और बंद होने का समय शास्त्रों में निर्धारित है, लेकिन अक्सर प्रभावशाली लोगों के लिए नियमों को ताक पर रखकर असमय दर्शन कराए जाने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। क्या यह मंदिर की आध्यात्मिक गरिमा के अनुरूप है?
द्वारका आने वाला हर भक्त केवल दर्शन करने नहीं आता। वह अपने साथ विश्वास, आस्था और उम्मीद लेकर आता है। लेकिन उसे क्या मिलता है? त्योहारों के समय भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि कई बार भगदड़ जैसी स्थिति बन जाती है। कतारों में पीने के पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती। बैठने की व्यवस्था भी नहीं। वृद्ध और दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं अक्सर केवल कागजों तक सीमित रह जाती हैं।
गोमती घाट से लेकर मंदिर के आसपास की गलियों तक गंदगी की स्थिति कई बार श्रद्धालुओं को निराश कर देती है। मोबाइल फोन और कैमरों पर प्रतिबंध के नाम पर भक्तों की सघन तलाशी ली जाती है, जो सुरक्षा के लिहाज से आवश्यक भी है, लेकिन वही नियम उन लोगों पर लागू नहीं होते, जो पुजारियों के साथ विशेष प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं। क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है?
मंदिर के बाहर मोबाइल जमा करने का एक अनौपचारिक बाजार खड़ा हो चुका है, जहां दुकानदार प्रति मोबाइल पांच रुपए वसूलते हैं। गर्भगृह के करीब तक प्रसाद बेचने वाले दुकानदारों की भीड़ रहती है। पंडा-पुजारी भक्तों से पैसे लेते हैं। कई बार सेवादारों का व्यवहार भी भक्तों के साथ कठोर हो जाता है। क्या यही वह अनुभव है, जिसके लिए श्रद्धालु हजारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं?
हालांकि, समाधान असंभव नहीं है। मंदिर में प्रवेश के लिए ऑनलाइन स्लॉट बुकिंग अनिवार्य की जा सकती है। हर टिकट पर क्यूआर कोड हो, जिसे स्कैन किए बिना कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, गर्भगृह में प्रवेश न कर सके।
देवस्थान समिति को पुजारियों और पंडा समाज के लिए स्पष्ट नियमावली बनानी चाहिए। यदि कोई पुजारी अनधिकृत तरीके से दर्शन कराता पकड़ा जाए तो उसकी सेवा पर रोक लगनी चाहिए। मंदिर के सीसीटीवी कैमरों की निगरानी केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राज्य मुख्यालय गांधीनगर से भी की जानी चाहिए। दान पेटी और मंदिर की आय का डिजिटल ऑडिट सार्वजनिक होना चाहिए।
मंदिर के भीतर हेल्पडेस्क केवल औपचारिकता न हों। वहां तैनात कर्मचारियों को अनियमितता पर तत्काल कार्रवाई करने का अधिकार होना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा, “यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।” क्या आज द्वारकाधीश मंदिर की व्यवस्था में वही ‘ग्लानि’ दिखाई नहीं दे रही?
यदि हां तो इसे सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है? प्रशासन की? पुजारी समाज की? या हम सबकी? द्वारका केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है। यह करोड़ों सनातनी हृदयों की आस्था का केंद्र है। इसकी पवित्रता को बनाए रखना केवल एक प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।
द्वारकाधीश मंदिर के पास संसाधनों की कमी नहीं है। कमी है तो केवल इच्छाशक्ति और जवाबदेही की। शायद यही वह प्रश्न है, जिसका उत्तर आज द्वारका को खोजना होगा।
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